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पुण्यतिथि विशेष: दलित दूदाभाई का विरोध करने पर पत्नी कस्तूरबा को तलाक देना चाहते थे ''महात्मा गांधी''

Updated at : 30 Jan 2020 9:49 AM (IST)
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पुण्यतिथि विशेष: दलित दूदाभाई का विरोध करने पर पत्नी कस्तूरबा को तलाक देना चाहते थे ''महात्मा गांधी''

रांची: 30 जनवरी 1948. महात्मा गांधी दिल्ली स्थित बिरला हाउस की नियमित प्रार्थना सभा में जाने के लिये तैयार हो रहे थे. प्रार्थना सभा स्थल पर सैकड़ों की संख्या में लोग गांधीजी का इंतजार कर रहे थे. इसी भीड़ में एक नवयुवक हथियार के साथ आया था. जाहिर था कि उसके इरादे नेक नहीं थे. […]

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रांची: 30 जनवरी 1948. महात्मा गांधी दिल्ली स्थित बिरला हाउस की नियमित प्रार्थना सभा में जाने के लिये तैयार हो रहे थे. प्रार्थना सभा स्थल पर सैकड़ों की संख्या में लोग गांधीजी का इंतजार कर रहे थे. इसी भीड़ में एक नवयुवक हथियार के साथ आया था. जाहिर था कि उसके इरादे नेक नहीं थे. नाम था नाथूराम गोडसे. महात्मा गांधी आ गये. भीड़ के बीच से आवाजें आने लगीं. हथियार लिये हुए नाथूराम गोडसे आगे बढ़ा. भीड़ को चीरता हुआ के पास पहुंचा. उनको प्रणाम किया. तीन कदम पीछे हटा और तीन गोलियां महात्मा गांधी के सीने में दाग दीं. महात्मा गांधी हे राम, हे राम, हे राम कहते हुये गिर पड़े. साथ चल रहे सहयोगियों ने महात्मा गांधी को संभाला.

इसी के साथ भारत को आजादी की राह दिखाने वाला. सैकड़ों पारिवारिक और सामाजिक दुश्वारियां झेलने वाला और सत्य-अहिंसा का पुजारी सदा के लिये खामोश हो गया. इस दिन को तब से ही पुण्यतिथि के तौर पर मनाया जाता है………………

जानिए, दलितों के बारें में क्या थे गांधीजी के विचार

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर वैसे तो सरकार तथा संस्थाओं की तरफ से कई कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. उनके विचारों की बातें होती हैं लेकिन कितने लोग इसको आत्मसात करते हैं वो गंभीर चिंतन का विषय है. वैसे तो महात्मा गांधी का औपनिवेशिक भारत में अनगिनत सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक महत्व का योगदान है लेकिन आज बात करेंगे, अस्पृश्यता के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा किये गए कार्यों के बारे में…………….

महात्मा गांधी की आत्मकथा और लोगों के उनके विचारों से ये तो पता चलता है कि गांधीजी वर्ण या जाति व्यवस्था के विरोधी नहीं थे, बल्कि उनका विरोध, इस आधार पर समाज में बरती जाने वाली अस्पृश्यता को लेकर था. उनका मानना था कि सभी को अपनी जाति के हिसाब से तय किया गया काम करते हुये अपनी अजीविका तलाशनी चाहिए. उन्होंने कहा था कि एक मेहतर होना भी उतना ही अनमोल या महत्वपूर्ण है जितना वकील या इस देश का राष्ट्रपति होना. महात्मा गांधी हालांकि जाति या वर्ण के आधार पर छुआछुत या अस्पृश्यता का समर्थन नहीं करते थे.

बचपन से ही अस्पृश्यता के खिलाफ थे गांधीजी

अस्पृश्यता या जाति व्यवस्था से गांधीजी का पाला बचपन से ही पड़ गया था. दरअसल, उनके यहां शौचालय की सफाई के लिये जो आता था उसका नाम उकाबाई था. महात्मा गांधी की मां पुतलीबाई बार-बार कहतीं कि वो उनके पास ना जाया करें लेकिन महात्मा गांधी अपनी मां की हिदायत का विरोध करते हुये उनके हाथ से कुछ ना कुछ ले ही लेते थे. वो मां से तर्क भी कर बैठते कि इसमें अस्पृश्यता जैसा क्यों है. मां के पास उनका कोई जवाब नहीं होता था. यहीं से महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता और जातिगत श्रेणी को लेकर उंच-नीच की अवधारणा कि खिलाफत शुरू कर दी थी.

महात्मा गांधी का अस्पृश्यता से वास्ता दूसरी बार तब बड़ा तब वो वकालत की पढ़ाई के लिये लंदन जा रहे थे. चूंकि इस समय समुद्र पार जाना धर्म विरूद्ध माना जाता था. गांधीजी के जात-बिरादरी के लोगों ने ग्राम पंचायत बुलाकर उनको जात-बाहर घोषित कर दिया. हालांकि इससे महात्मा गांधी का विश्वास मजबूत ही हुआ.

रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष में देखा भेदभाव

दक्षिण अफ्रीका में पहले वकालत की प्रैक्टिस और फिर रंगभेद नीति के खिलाफ संघर्ष के दौरान उन्हें कई बार जातिगत अस्पृश्यता और अपमान का सामना करना पड़ा था. पहली बार जब उन्हें पीट्सबर्ग के स्टेशन में ट्रेन से नीचे उतार दिया गया था. दूसरी बार तब जब एक गोरे हज्जाम ने उनकी शेविंग करने से मना कर दिया था.

तीसरी बार तब, जब महात्मा गांधी के आश्रम में एक अश्वेत क्लर्क का पॉट साफ करने से गांधीजी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी ने मना कर दिया था. महात्मा गांधी को इन सबके खिलाफ संघर्ष करना पड़ा था. हालांकि वहां उनको जीत मिली थी. महात्मा गांधी के मन में ये बात बैठ गई थी कि यदि यहां छोटे स्तर पर इतनी दिक्कत है तो पता नहीं भारत में क्या होगा.

भारत में भी कई वाकये हैं जब महात्मा गांधी को ऐसी दिक्कतों या स्थिति का सामना करना पड़ा. गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर महात्मा गांधी देश भर का दौरा कर रहे थे तो दक्षिण भारत में उनको एक शब्द सुनने को मिला, पंचम. वैसे तो संगीत में पंचम का मतलब काफी अच्छा होता है लेकिन दक्षिण भारत के पंचम का मतलब था, जातिगत श्रेणी में पांचवे पायदान पर आने वाले लोग.

जिनके साथ कोई सार्वजनिक जलाशय साझा नहीं करता था. ब्राह्मण जिनकी परछाई से भी दूर रहना पसंद करते थे और जिनका छुआ खाया नहीं जा सकता था. महात्मा गांधी को ये मानवाधिकारों का उल्लंघन लगा.

जब राजेंद्र प्रसाद के घर में हुआ छूआछूत का सामना

इसके बाद साल 1917 में जब महात्मा गांधी चंपारण जा रहे थे. गांधीजी चंपारण जाने के क्रम में बांकीपुर (वर्तमान पटना) में कुछ देर के लिए रूके. कुछ लोग महात्मा गांधी को राजेंद्र प्रसाद के घर ले गए. वहां ये सोचकर कि गांधीजी पता नहीं किस जाति के होंगे, उनको राजेंद प्रसाद के घरवालों ने बाहर ही बिठा दिया. गांधीजी को इस बात का काफी बुरा लगा. इस घटना का जिक्र महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा, सत्य के साथ मेरे प्रयोग में किया है.

बा कस्तूरबा से तलाक चाहते थे महात्मा गांधी

महात्मा गांधी और दलित चिंतन से जुड़ा एक वाकया काफी प्रसिद्ध है. इस घटना ने दुनिया को बताया था कि महात्मा गांधी दलित उत्थान को लेकर कितना समर्पित थे. ऐसा कि वो अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी से अपना वैवाहिक जीवन खत्म करने पर आमदा हो गये थे. दरअसल, एक दिन महात्मा गांधी के सहयोगी ने उनसे दूदाभाई नाम के एक बुनकर को गांधीजी के अहमदाबाद स्थित आश्रम में रखने को कहा. दूदाभाई अपनी पत्नी और बेटी के साथ आश्रम में रहने आ गये, लेकिन इससे अहमदाबाद का वैष्णव समाज नाराज हो गया.

संभ्रांत वर्ग ने आश्रम के लिये आर्थिक सहायता बंद कर दी. महात्मा गांधी के खिलाफ जूलुस निकाले गये. इस बीच महात्मा गांधी को पता चला कि आश्रम की महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं जिसकी केंद्र उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी भी हैं. इससे महात्मा गांधी इतने क्षुब्ध हुए कि कस्तूरबा से कह दिया कि यदि वो उनके विचारों और तरीकों से सहमत नहीं हैं तो आश्रम छोड़ कर जा सकती हैं.

इसके अलावा जब महात्मा गांधी के सहयोगी मगनलाल गांधी की पत्नी संतोकबहन नाराज हो गयीं तो महात्मा गांधी ने उन्हें भी आश्रम से जाने को कह दिया. हालांकि बाद में सब ठीक हो गया. कस्तूरबा भी साथ रहीं और मगनलाल गांधी भी. आश्रम सबके लिये खुल गया. हमेशा-हमेशा के लिये.

दलितों को जब हरिजन कहा महात्मा गांधी ने

महात्मा गांधी का मानना था कि जाति-पाति और ऊंच-नीच की अवधारणा की वजह से भारत की गुलामी आई है. इसलिए उन्होंने इसके खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन चलाने का फैसला किया. 1933 में महात्मा गांधी ने आत्मशुद्धि के लिये 21 दिन का उपवास रखा. इसके बाद 7 नवंबर 1933 से 2 अगस्त 1934 तक लगातार 10 महीने तक भारत की यात्रा की.

इस दौरान हरिजन नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया जिसमें दलित चिंतन और उत्थान से संबंधित लेख लिखे जाते थे. इसी समय उन्होंने दलितों को नया नाम हरिजन दिया जिसका तात्पर्य ईश्वर की संतान होता है. महात्मा गांधी ने ये नाम इसलिये दिया क्योंकि उनका मानना था कि ईश्वर ने सबको समान बनाया है इसलिये केवल पेशे के आधार पर किसी के साथ असमान व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए.

पृथक निर्वाचन प्रणाली पर आंबेडकर से मतभेद

ऐसा ही एक वाकया 1931-32 का है जब महात्मा गांधी और डॉ भीमराव अंबेडकर की बीच मतभेद हो गये थे. दरअसल भीमराव आंबेडकर पृथक निर्वाचन प्रणाली की मांग कर रहे थे जिसके मुताबिक चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में केवल दलित उम्मीदवारों को ही चुनाव में खड़ा होने का अधिकार था वहीं मतदान का अधिकार भी केवल दलितों को ही था. लेकिन महात्मा गांधी इससे सहमत नहीं थे. गांधीजी दलितों के लिये निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीट के पक्ष में तो थे लेकिन वे इस बात से सहमत नहीं थे कि मतदान का अधिकार केवल दलितों को होगा.

महात्मा गांधी का मानना था कि इससे सदियों से चली आ रही खाई को पाटा नहीं जा सकेगा वहीं डॉ भीमराव आंबेडकर का मानना था कि यदि सबको मतदान का अधिकार होगा तो दलितों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पायेगा. इस मसले पर डॉ भीमराव आंबेडकर का प्रस्ताव मान भी लिया गया था लेकिन महात्मा गांधी ने इसके खिलाफ अनशन कर दिया. आखिरकार सबको झुकना पड़ा और प्रस्ताव पास नहीं हो सका.

रांची में भी गांधीजी ने हरिजनों को किया जागरूक

महात्मा गांधी की एक याद झारखंड की राजधानी रांची से भी जुड़ी है. महात्मा गांधी एक बार रांची आये हुए थे. इसी समय वो यहां स्थित संत पॉल स्कूल भी गए थे. उन्होंने संत पॉल स्कूल में अपने संबोधन के दौरान कहा था कि हमें जाति-पाति, भेदभाव, अस्पृश्यता और ऊंच-नीच की भावना से ऊपर उठना होगा. हरिजन बस्ती में जाकर उन्होंने स्कूली बच्चों से साफ-सफाई के साथ रहने और समाज व्यवस्था में ऊपर उठने का आग्रह किया था. तो ऐसे तो हमारे महात्मा गांधी. जिसको लोग प्यार से बापू भी कहते हैं.

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