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गौरक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा-हिंसा रोकने की जिम्मेदारी राज्यों की

Updated at : 03 Jul 2018 2:49 PM (IST)
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गौरक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा-हिंसा रोकने की जिम्मेदारी राज्यों की

नयी दिल्ली : गौ रक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी राज्यों पर डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की हिंसक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिये दिशानिर्देश हेतु दायर याचिका पर मंगलवार को सुनवाई पूरी कर ली. न्यायालय इस पर बाद में फैसला सुनाएगा. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा […]

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नयी दिल्ली : गौ रक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी राज्यों पर डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की हिंसक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिये दिशानिर्देश हेतु दायर याचिका पर मंगलवार को सुनवाई पूरी कर ली. न्यायालय इस पर बाद में फैसला सुनाएगा.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा , न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़़ की खंडपीठ ने सख्त शब्दों में कहा कि कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता. पीठ ने कहा कि कानून व्यवस्था राज्य का विषय है और इसके लिये प्रत्येक राज्य सरकार ही जिम्मेदार होगी. इस मामले में सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि गौ रक्षा के नाम पर हिंसा की घटनायें वास्तव में भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा है और यह अपराध है.

अतिरिक्त सालिसीटर जनरल पी एस नरसिम्हा ने कहा कि केंद्र इस समस्या के प्रति सचेत है और इससे निबटने का प्रयास कर रहा है. उन्होंने कहा कि मुख्य चिंता तो कानून व्यवस्था बनाये रखने की है. पीठ ने कहा कि कोई भी कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता और ऐसी घटनाओं की रोकथाम करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है. शीर्ष अदालत ने पिछले साल छह सितंबर को सभी राज्यों से कहा था कि गौ संरक्षण के नाम पर हिंसा की रोकथाम के लिये कठोर कदम उठाये जायें. इसमें प्रत्येक जिले में एक सप्ताह के भीतर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाये और उन तत्वों के खिलाफ तत्परता से अंकुश लगाया जाये खुद के ही कानून होने जैसा व्यवहार करते हैं.

इसके साथ शीर्ष अदालत ने राजस्थान , हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई के लिये दायर याचिका पर इन राज्यों से जवाब भी मांगा था. यह अवमानना याचिका महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने दायर की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन तीन राज्यों ने शीर्ष अदालत के छह सितंबर , 2017 के आदेशों का पालन नहीं किया है.

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