भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले खुमैनी के पूर्वजों को कभी भारत ने दिया था शरण...

Updated at : 27 Jun 2017 9:16 PM (IST)
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भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले खुमैनी के पूर्वजों को कभी भारत ने दिया था शरण...

नयी दिल्‍ली : ईरान के सर्वोच्‍च नेता अयातुल्‍ला अल खुमैनी ने दुनियाभर के मुसलमानों से कश्‍मीर की आजादी मांग रहे लोगों के समर्थन की अपील करते हुए भारत को तानाशाह देश करार दिया. खुमैनी ने भारत के खिलाफ उस समय जहर उगला है जब ईरान के साथ भारत के रिश्‍ते काफी बेहतर माने जा रहे […]

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नयी दिल्‍ली : ईरान के सर्वोच्‍च नेता अयातुल्‍ला अल खुमैनी ने दुनियाभर के मुसलमानों से कश्‍मीर की आजादी मांग रहे लोगों के समर्थन की अपील करते हुए भारत को तानाशाह देश करार दिया. खुमैनी ने भारत के खिलाफ उस समय जहर उगला है जब ईरान के साथ भारत के रिश्‍ते काफी बेहतर माने जा रहे हैं. हाल ही में भारत ने ईरान के साथ चारबहार संधि भी किया है.

खुमैनी ने कश्मीर को मुसलिम राष्ट्र और भारत को ‘तानाशाह’ कहा है. ईद के मौके पर खुमैनी ने कश्मीरी जनता से यह अपील की है कि वह कश्मीर, यमन और बहरीन जैसे देशों और वहां रहनेवाले लोगों का साथ दें. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे तानाशाह शासकों को अलग कर देना चाहिए, जो रमजान के मौके पर लोगों पर पत्थरबाजी करते हैं.

ज्ञात हो कि जिस समय खुमैनी के पूर्वजों को इरान से 14 साल के लिए देश निकाला मिला था, तब भारत ने ही उनको शरण दी थी. बीबीसी की खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश के बाराबंकी का किन्तूर गांव से ही 1979 में आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी 14 साल के निष्कासन के बाद अपने वतन ईरान लौट रहे थे.

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आपको बता दें कि ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रवर्तक रूहुल्लाह खुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी सन 1790 में, बाराबंकी के इसी छोटे से गांव किन्तूर में जन्मे थे. रूहुल्लाह खुमैनी के दादा करीब 40 साल की उम्र में अवध के नवाब के साथ धर्मयात्रा पर इराक गये और वहां से ईरान के धार्मिक स्थलों की जियारत की और ईरान के खुमैन नाम के गांव में जा बसे.

बीबीसी ने लिखा कि सैयद अहमद मूसवी फिर भी अपना उपनाम ‘हिंदी’ ही रखा. उनके पुत्र आयतुल्लाह मुस्तफा हिंदी का नाम इस्लामी धर्मशास्त्र के जाने-माने जानकारों में शुमार हुआ. उनके दो बेटों में, छोटे बेटे रूहुल्लाह का जन्म सन 1902 में हुआ, जो आगे चलकर आयतुल्लाह खुमैनी या इमाम खुमैनी के रूप में प्रसिद्ध हुए.

ईरान के अराक और कोम शहर स्थित इस्लामी शिक्षा केंद्रों में पढ़ते-पढ़ाते वह शहंशाही राजनीतिक प्रणाली का पुरज़ोर विरोध करने लगे और उसकी जगह विलायत-ए-फ़कीह (धार्मिक गुरु की संप्रभुता) जैसी पद्धति की वकालत करने लगे. पहलवी सल्तनत के इसी विद्रोह के तहत उन्हें ईरान से देशनिकाला दे दिया गया.

अयातुल्ला अल खुमैनी ने दो ट्वीट किये और उनमें ये बातें कहीं. पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा, ‘मुसलिम सुमदाय को बहरीन, कश्मीर, यमन इत्यादि जगहों पर लोगों का खुल कर समर्थन करना चाहिए. रमजान में लोगों पर हमला करनेवाले उत्पीड़कों तथा तानाशाह को अस्वीकार कर देना चाहिए.’ दूसरे ट्वीट में लिखा, ‘बहरीन, यमन और मुसलिम देशों में उठनेवाले इस तरह के मामले पूरे इसलामिक निकाय को घाव पहुंचाते हैं.’

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