मदनपुर देवी स्थान मंदिर: देवी के दर्शन करने रोज रात में आते हैं बाघ

Edited by SATISH KUMAR
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बिहार एवं उत्तर प्रदेश सीमा पर वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के घने जंगलों के बीच स्थित सिद्धिदात्री मां मदनपुर देवी स्थान आने पर मां भगवती पिंडी रूप का दर्शन श्रद्धालुओं को होता है.

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हरनाटांड़. बिहार एवं उत्तर प्रदेश सीमा पर वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के घने जंगलों के बीच स्थित सिद्धिदात्री मां मदनपुर देवी स्थान आने पर मां भगवती पिंडी रूप का दर्शन श्रद्धालुओं को होता है. सभी फलों को देने वाला नवरात्र में यूपी-बिहार सहित नेपाल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर देवी माता का दर्शन करते हुए मन्नत मांगते हैं. मान्यता है कि मां के दरबार सच्चे मन से पूजा करने वाला खाली हाथ नहीं लौटा है. यही कारण है कि शारदीय नवरात्र ही नहीं बल्कि प्रत्येक सोमवार व शुक्रवार को मां के दरबार में श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है. बगहा पुलिस जिला से लगभग 17 किलोमीटर पर मदनपुर वन क्षेत्र के घनघोर जंगलों के बीच मां मदनपुर देवी का स्थान है. राजा मनन सिंह के राज्य के अधीन आता था मदनपुर देवी स्थान स्थान के पुजारी के मुताबिक मदनपुर देवी स्थान कभी राजा मनन सिंह के राज्य के अधीन आता था. जहां राजा कभी कभार इस जंगल में शिकार करने आया करते थे. इसी दौरान राजा को सूचना मिली कि रहषु गुरु नामक साधु उनके राज्य क्षेत्र में जंगलों के बीच बाघ के गले में सांप बांधकर धान की दवनी करता है. यह सुनकर राजा सैनिकों के साथ मौके पर पहुंच गए और अपनी आंखों से देख अचंभित हो गये. उसके बाद राजा ने रहषु गुरु से जानकारी लेते हुए देवी मां को सामने बुलाने की जिद पर आ गये. इस पर रहषु गुरु देवी के आने के साथ ही राज पाठ का सर्वनाश होने की बात करते हुए राजा को समझाने की काफी प्रयास किये. लेकिन राजा उसे सजा देने की बात करते हुए अपनी बातों पर अटल रहे. तब रहषु गुरु ने देवी का आह्वान किया. बताया जाता कि देवी कामाख्या से चलकर खंडवा में विश्राम करती हुई थावे पहुंची. देवी के थावे पहुंचने के बाद रहषु गुरु ने एक बार राजा को फिर चेताया. लेकिन राजा नहीं माने. इसी दौरान देवी मां भक्त रहषु गुरु के सिर आते हुए हाथ का कंगन दिखाया. जिसे देख राजा मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़े और फिर नहीं उठे. उसके बाद राजा का परिवार एवं सारा समाज ही तहस-नहस हो गया. मदनपुर देवी पीठ के पुजारी ललन दास कहते हैं कि बाघों के आशियाने के बीच घने जंगल में स्थित मां के दरबार में दिनों दिन बढ़ती संख्या मां की महिमा का प्रमाण है. मां के दरबार में मां का वाहन बाघ प्रतिदिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आते है. आज भी रात्रि में यहां किसी को रुकने की अनुमति नहीं है. पुजारी संध्या में भोग लगाने के बाद माता का आसन लगाते हैं और अपने निवास कोच में चले जाते हैं. इसी क्रम में मां का वाहन बाघ अपनी सेवा में आते और मां के पास कुछ समय रुक कर पुन: घने जंगलों में चले जाते हैं. बदलते समय के साथ मंदिर को मॉडर्न तो बनाया गया लेकिन मां की शक्ति और उनके प्रति लोगों का आस्था बरकरार है. राजा की बहू को गर्भवती देख मां ने दी माफी बताया जाता कि राजा की बहू मायके में थी. देवी मां के प्रकोप से बचते हुए राजा की गर्भवती बहू बगहा के बड़गांव स्टेट पहुंची, तो देवी विनाश कर चुकी थी. जहां बहू को गर्भवती देख देवी मां उसे माफ करते हुए मदनपुर जंगल के बीचो-बीच पिंडी का रूप धारण कर स्थापित हो गयी. कुछ दिनों बाद जंगल में गाय चराने गये हरिचरण नामक व्यक्ति की नजर पिंडी पर पड़ी. उसने देखा कि एक गाय पिंडी के स्वरूप पर अपना दूध गिरा रही है. यह देख पिंडी के आसपास की सफाई कर पूजा अर्चना शुरू कर दिया. हरिचरण की भक्ति से प्रसन्न होकर देवी मां प्रकट होते हुए उसको रखवाली के लिए एक बाघ प्रदान किया. इसके बाद इसकी चर्चा क्षेत्र में चारों तरफ फैल गयी. कहा जाता है जिनकी संतानों से आज बड़गांव दरबार का वंशज कायम है बड़गांव स्टेट की बहुरानी अपर्णा सिंह बहुरानी खुद इन पारीक कथाओं में इत्तेफाक रखती हैं. इसकी जानकारी बड़गांव स्टेट को हुई तो उन्होंने पिंडी की जगह एक मंदिर का निर्माण कराया. जहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचकर नवरात्र में पूजा अर्चना कर मन्नत मांगते हैं.

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