मां कुणालेश्वरी के दर्शन से जीवन की बाधा होती है दूर

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नवरात्र के दिनों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें मंदिर परिसर में लग जाती है

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कुनौली. निर्मली प्रखंड से लगभग 32 किलोमीटर दूर, इंडो-नेपाल सीमा से सटे कुनौली पूरब टोला स्थित श्री श्री 108 मां कुणालेश्वरी महिष मर्दिनी भगवती मंदिर क्षेत्र में आस्था और विश्वास का अद्वितीय केंद्र है. नवरात्र के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है और “जय माता दी” के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है. यह अष्टभुजी दुर्गा मंदिर अपनी ख्याति को लेकर न केवल बिहार बल्कि नेपाल के श्रद्धालुओं के बीच भी प्रसिद्ध है. नवरात्र के दिनों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें मंदिर परिसर में लग जाती है. विशेष रूप से महाअष्टमी पर यहां माता को 56 भोग अर्पित किए जाते हैं और पूरी रात भजन-कीर्तन व जागरण का आयोजन होता है. भक्तों का विश्वास है कि मां कुणालेश्वरी के दर्शन मात्र से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मंदिर का इतिहास भी उतना ही अनोखा है. बताया जाता है कि वर्ष 1965 में कोसी बांध की खुदाई के दौरान मां कुणालेश्वरी महिष मर्दिनी भगवती की प्रतिमा प्राप्त हुई थी. स्वतंत्रता सेनानी स्व अनिरुद्ध नारायण सिंह ने काफी प्रयासों के बाद इस प्रतिमा को सुरक्षित कर पूजा-अर्चना की शुरुआत की. इसके बाद वर्ष 1989 में जनसहयोग से मंदिर का निर्माण कर प्रतिमा को विधिवत स्थापित किया गया. तभी से यहां नियमित वैदिक पद्धति से पूजा-अर्चना होती आ रही है. मंदिर के पुजारी पप्पू ठाकुर का कहना है कि मां की कृपा अपरंपार है, अब तक कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटा. वहीं, पंडित नागेंद्र झा ने बताया कि यहां प्रतिमा की पूजा बड़े विधि-विधान और विशेष नियमों के साथ की जाती है, जो मंदिर की विशेष पहचान है. पूजा कमेटी के अध्यक्ष बम किशोर सिंह और सचिव सुशील सिंह ने कहा कि मंदिर जनसहयोग का प्रत्यक्ष उदाहरण है. समिति शांतिपूर्ण और सुसज्जित ढंग से पूजा-अर्चना कराने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है. इस नवरात्र में भी सभी नियमों और परंपराओं का पालन करते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है. हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है, जो भक्तों के लिए आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. नवरात्र के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां कुणालेश्वरी के दर्शन से जीवन की हर बाधा दूर हो जाती है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.

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RAJEEV KUMAR JHA

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