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Deoghar news : देवघर जेल में संकीर्तन शुरु, आज एक साथ निकलेंगे दो पुष्प मुकुट

Updated at : 08 Aug 2025 8:12 PM (IST)
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Deoghar news : देवघर जेल में संकीर्तन शुरु, आज एक साथ निकलेंगे दो पुष्प मुकुट

<P>वरीय संवाददाता, देवघर . सावन पूर्णिमा पर देवघर जेल में आठ अगस्त से ही बाबा कक्ष में संकीर्तन शुरु हुआ, जिसका शनिवार की सुबह में समापन होगा, साथ ही

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वरीय संवाददाता, देवघर . सावन पूर्णिमा पर देवघर जेल में आठ अगस्त से ही बाबा कक्ष में संकीर्तन शुरु हुआ, जिसका शनिवार की सुबह में समापन होगा, साथ ही पूर्णिमा के दिन सुबह 10 बजे से जेल के बाबा शृंगार मंदिर में संकीर्तन आरंभ होगा, जिसका समापन 10 अगस्त की सुबह 11 बजे होगा. पूर्णिमा के दिन नौ अगस्त की शाम पांच बजे जेल के बंदियों द्वारा तैयार किया गया पुष्प मुकुट लेकर जेल के अधिकारी व कर्मचारी बासुकिनाथ स्थित फौजदारी बाबा के दरबार में जायेंगे. इसी पुष्प मुकुट से सावन पूर्णिमा के दिन वर्षों से बाबा बासुकिनाथ की शृंगार पूजा होती आ रही है. इसके बाद जेल के अंदर बंदी सहित पदाधिकारी, कर्मचारी व बाहर से आये अतिथि प्रसाद ग्रहण करेंगे.

सावन पूर्णिमा में जेल के बंदी तैयार करते हैं दो पुष्प मुकुट

सावन पूर्णिमा के दिन हर साल देवघर जेल के बंदी पुष्प मुकुट तैयार करते हैं. दोनों पुष्प मुकुट साथ-साथ जेल से निकलता है. एक बाबा बासुकिनाथ की शृंगार पूजा के लिए भेजा जाता है, जबकि दूसरा पुष्प मुकुट बाबा बैद्यनाथ की शृंगार पूजा के लिए होता है. बंदियों द्वारा तैयार किये दोनों पुष्प मुकुट को जेल से साथ-साथ निकाल कर कारा परिसर के बाहर मंदिर में रखा जाता है. एक पुष्प मुकुट वाहन से जेल के पदाधिकारी कर्मचारी फौजदारी बाबा बासुकिनाथ लेकर जाते हैं. वहीं, बाबा बैद्यनाथ के दरबार में खुद पुष्प मुकुट लेकर जेलर या जेल अधीक्षक जाते हैं. जेल से मिली जानकारी के मुताबिक, बाबा बैद्यनाथ को साल में प्रत्येक दिन कैदियों द्वारा निर्मित पुष्प मुकुट चढ़ाने की परंपरा है, लेकिन शिवरात्रि के दिन बाबा को मोउर चढ़ाया जाता है. इसकी भरपाई के लिए सावन पूर्णिमा के दिन दो पुष्प मुकुट बनाकर एक बाबा बासुकिनाथ और दूसरा बाबा बैद्यनाथ को अर्पित किया जाता है. जेल कर्मियों की उपस्थिति में ही वहां बाबा का शृंगार होता है. यह परंपरा अंग्रेज जेलर के समय से ही चली आ रही है. हालांकि, इसका न तो कोई इतिहास है और न ही कोई लिखित दस्तावेज ही है. कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय यहां पदस्थापित अंग्रेज जेलर के पुत्र की तबीयत बिगड़ गयी थी. लोगों के सुझाव पर उन्होंने बाबा बैद्यनाथ को मुकुट चढ़ाया था और उनके पुत्र की हालत सुधर गयी थी, तब से यह परंपरा चली आ रही है. जेल कर्मी व बंदियों द्वारा यह मुकुट तैयार किया जाता है. एक मुकुट बनाने में तकरीबन पांच किलो फूल लगता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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