पेट रोगों में लाभदायक है गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन

Updated at : 05 Jan 2016 8:27 AM (IST)
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पेट रोगों में लाभदायक है गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन

आजकल अनियमित जीवनशैली के कारण पेट रोग बढ़ गये हैं. रोज गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास करने से पेट के अंदरूनी अंग मजबूत होते हैं और पेट संबंधी समस्याएं दूर होती हैं. गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन भी गति के साथ सामने झुकनेवाला अभ्यास है. जिन लोगों को स्लिप डिस्क, सायटिका, हाइ बीपी या हृदय रोग हो अथवा पेट […]

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आजकल अनियमित जीवनशैली के कारण पेट रोग बढ़ गये हैं. रोज गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास करने से पेट के अंदरूनी अंग मजबूत होते हैं और पेट संबंधी समस्याएं दूर होती हैं.
गत्यात्मक पश्चिमोत्तानासन भी गति के साथ सामने झुकनेवाला अभ्यास है. जिन लोगों को स्लिप डिस्क, सायटिका, हाइ बीपी या हृदय रोग हो अथवा पेट की किसी भी प्रकार की सर्जरी करायी हो, तो इसे बिना किसी कुशल योग प्रशिक्षक की सहायता के न करें.
आसन की विधि : योगा मैट बिछा लें तथा पीठ के बल लेट जाएं. पैर के पंजों को एक साथ रखें. शरीर सीधा रखें.अब भुजाओं को धीरे से सिर के ऊपर उठाएं तथा इन्हें सीधा रखते हुए जमीन पर रखने का प्रयास करें. ध्यान रहे इस अवस्था में भुजाओं की हथेलियां आसमान की तरफ खुली अवस्था में हों. यह अभ्यास की प्रारंभिक अवस्था है.
अब संपूर्ण शरीर को शांत व शिथिल बनाने का प्रयास करें. संपूर्ण शरीर और श्वास की गति के प्रति सजग बने रहें. अब धड़ को ऊपर उठाते हुए सीधे बैठ जाएं. हाथों को सिर के ऊपर सीधा खड़ा कर लें. अब सामने की तरफ झुकते हुए इस आसन को करने का प्रयास करें. कोशिश यह होनी चाहिए कि दोनों हाथों के पंजों से दोनों पैर के अंगूठे या पैर के तलवों को पकड़ने का प्रयास करते हुए सिर या ललाट को घुटनों के नजदीक लाते हुए स्पर्श करें. इस अवस्था में थोड़ी देर के लिए रुकें. उसके बाद वापस बैठने की स्थिति में लौट जाएं और फिर धीरे से पीछे की ओर लेट जाएं. अभ्यास की प्रारंभिक स्थिति में आएं. अब संपूर्ण प्रक्रिया को जल्दी-जल्दी अनेक बाद दुहराते जाएं. अभ्यास के दौरान शारीरिक गति और अवस्था पूर्णत: नियंत्रण में हो, अन्यथा सिर में चोट भी लग सकती है़
श्वसन : इस अभ्यास की प्रारंभिक अवस्था में श्वास सामान्य होनी चाहिए़ जब शरीर बैठने की अवस्था में आता है उस समय श्वास लें तथा शरीर को झुका कर पश्चिमोत्तासन में ले जाते हैं उस समय श्वास छोड़ें और पुन: बैठने की अवस्था में श्वास लेंगे और पुन: प्रारंभिक स्थिति में आयेंगे तब श्वास छोड़ेंगे़
अवधि : शुरुआत में आठ से 10 बार अभ्यास कर सकते हैं, किंतु जब नियंत्रण हो जाये, तो शारीरिक क्षमता के अनुसार इस अभ्यास की क्षमता को बढ़ा सकते हैं.
सजगता : चूंकि यह अभ्यास गति के साथ किया जाता है. अभ्यास के क्रम में शारीरिक स्तर पर पूर्ण रूप से शरीर की गति एवं श्वास के तालमेल के प्रति सजग बने रहेंगे़ आध्यात्मिक स्तर पर आपकी सजगता स्वाधिष्ठान चक्र पर बनी रहनी चाहिए़क्रम : इस अभ्यास के पूर्व या पश्चात सेतु आसन, चक्रासन, भुजंगासन, मत्स्यासन, शलभासन आदि करना चाहिए़सीमाएं : वैसे लोग न करें, जिन्हें स्लिप डिस्क, सायटिका, हाइ बीपी, हृदय रोग या छह महीने में पेट की सर्जरी हुई हो साथ ही यदि कोई महिला गर्भावस्था में हो, तो उसे भी यह अभ्यास नहीं करना चाहिए़
उदर के अंगों को मजबूत बनाता है
इस आसन के लाभ पश्चिमोत्तानासन के रूप में टीइ जैसे-यह आसन भी घुटने के पीछे की नसों को फैलाता है तथा कूल्हों को लचीला बनाता है़ यह आसन यकृत, अग्नाशय, प्लीहा, गुरदे और अधिवृक्क ग्रंथियों सहित पूरे उदर एवं श्रोणि प्रदेश को मजबूत बनाता है व उनकी मालिश करता है. यह इस क्षेत्र के बढ़े वजन को भी कम करता है और मूत्र प्रजनन प्रणाली की शिकायतों को दूर करता है़ यह मेरुदंड की तंत्रिकाओं और मांसपेशियों में रक्त संचार बढ़ाता है़
यह मासिक धर्म की गड़बड़ियों, सुस्त यकृत, मधुमेह, कोलाइ एस्रोफीलिया के योगोपचार में इस आसन का अभ्यास किया जाता है़ चूंकि यह गत्यात्मक अभ्यास है, जो रक्त संचार और पाचन क्रिया बढ़ाता है़ यह शारीरिक एवं प्राणिक ऊर्जा को उद्दीप्त कर समस्त शरीर को लचीला बनाता है़
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