जोड़ों का दुश्मन है आर्थराइटिस

Updated at : 22 Oct 2015 5:43 AM (IST)
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जोड़ों का दुश्मन है आर्थराइटिस

डॉ एमएम अग्रवाल हड्डी रोग विशेषज्ञ, मैक्स अस्पताल, दिल्ली आर्थराइटिस एक ऐसा रोग है, जो जोड़ों को प्रभावित करता है. रोग के गंभीर हो जाने पर जोड़ों के मूवमेंट में परेशानी आती है. कई बार ज्वाइंट रिप्लेसमेंट की भी नौबत आ जाती है. रोग का उपचार शुरुआत में ही हो जाने पर इसे काफी हद […]

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डॉ एमएम अग्रवाल

हड्डी रोग विशेषज्ञ, मैक्स अस्पताल, दिल्ली

आर्थराइटिस एक ऐसा रोग है, जो जोड़ों को प्रभावित करता है. रोग के गंभीर हो जाने पर जोड़ों के मूवमेंट में परेशानी आती है. कई बार ज्वाइंट रिप्लेसमेंट की भी नौबत आ जाती है. रोग का उपचार शुरुआत में ही हो जाने पर इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है
1. ऑस्टियो आर्थराइटिस
इसके अधिकतर मामलों में घुटने प्रभावित होते हैं. औरतों को यह पहले प्रभावित करता है. आजकल आरामदायक जिंदगी के कारण लोगों का वजन बढ़ गया है, जिससे घुटनों पर जोर पड़ता है. इस रोग का एक कारण अप्रत्यक्ष रूप से ऑस्टियोपोरोसिस भी है. बचाव के लिए कम उम्र से ही व्यायाम करना जरूरी है. इससे शरीर में कैल्शियम बना रहता है. किसी भी व्यक्ति के पीक बोन मास की उम्र 35 वर्ष है. दोपहर के भोजन के बाद धूप में आधा घंटा टहलने से भी शरीर में विटामिन डी बनता है. इससे शरीर में कैल्शियम का अवशोषण अच्छे-से होता है. हफ्ते में एक बार विटामिन डी की गोली भी ले सकते हैं. मड़ुआ खाना भी फायदेमंद होता है. इस रोग में डीएमओएआरडी दिया जाता है. रोग की शुरुआत में ही व्यायाम और फिजियोथेरेपी जरूरी है. जब रोग काफी बढ़ जाये और इलाज का उपाय न बचे, तो जोड़ में इन्जेक्शन दिया जाता है. अंतिम उपचार टोटल नी-रिप्लेसमेंट है. इसके अलावा एक एचटीओ ऑपरेशन भी होता है. इसमें नी-रिप्लेसमेंट करने के बजाय सिर्फ क्षतिग्रस्त हिस्से को रिपेयर किया जाता है. भविष्य में स्टेम सेल थेरेपी से भी इसके सफल उपचार की उम्मीदें हैं.
2. सोरायटिक आर्थराइटिस
यह त्वचा का रोग है, जो सोरायसिस के मरीजों में होता है. इसमें शरीर पर लाल-लाल चकत्ते हो जाते हैं और खुजली होती है. इनसे सफेद पपड़ी निकलती है. धीरे-धीरे इससे जोड़ भी प्रभावित होने लगते हैं. यदि सही समय पर इलाज न कराया जाये, तो यह जोड़ों को खराब कर देता है. उसके बाद ठीक हो पाना मुश्किल होता है. इस आर्थराइटिस में शरीर का कोई भी अंग प्रभावित हो सकता है. सोरायसिस का भी पूर्ण इलाज संभव नहीं है, लेकिन लक्षणों के इलाज से इसे कंट्रोल किया जा सकता है. लापरवाही बरतने पर समय के साथ यह रोग और गंभीर होता जाता है. यह रोग तब होता है, जब शरीर के अंदर इम्यूनिटी सिस्टम शरीर में मौजूद हेल्दी सेल्स और टिश्यू पर हमला कर देता है.
इसी कारण जोड़ों में दर्द होता है और स्किन सेल्स अधिक बनने लगते हैं.
3. रुमेटॉइड आर्थराइटिस
इसमें शरीर के दोनों हिस्सों के जोड़ प्रभावित होते हैं, जैसे-दोनों कोहनियों के जोड़, दोनों घुटने आदि. यह अन्य प्रकार के आर्थराइटिस से ज्यादा गंभीर माना जाता है. रूमेटॉइड आर्थराइटिस में तेज दर्द पीड़ित को परेशान करता है. इसमें ज्वाइंट कैप्सूल्स में सूजन भी हो जाती है. कुछ मरीजों में प्रभावित होने के बाद भी ज्वाइंट पेन कई वर्षो के बाद प्रकट होता है, तो कुछ में बहुत जल्दी. इसका उपचार यदि देर से कराया जाये, तो अंग टेढ़े भी हो सकते हैं.
आर्थराइटिस में फिजियोथेरेपी
फिजियोथेरेपिस्ट आर्थराइटिस के दौरान जोड़ों के मूवमेंट को सुचारू बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस कार्य के लिए व्यायाम और कई प्रकार की तकनीकों की मदद लेते हैं. कुछ प्रकार के व्यायाम की जानकारी भी देते हैं जिसे रोगी घर पर भी कर सकते हैं. इनसे मांसपेशियां मजबूत होती हैं और लचीलापन बढ़ता है. फिजियोथेरेपी से आर्थराइटिस के दर्द से राहत मिलती है और जोड़ सही तरीके से काम करते हैं. फिजियोथेरेपिस्ट इसके लिए व्यायाम, पोश्चर, हाइड्रोथेरेपी, मसाज, दर्द से राहत के लिए इलेक्ट्रोथेरेपी और टेंस मशीन की भी सहायता लेते हैं. अत: रोगी फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह अवश्य लें.
क्या है इसका इलाज
इसके लिए दवाओं का कॉम्बिनेशन दिया जाता है. इसे डीएमएआरडी कहते हैं. यह कॉम्बिनेशन रोग के स्वभाव को परिवर्तित कर देता है. इनमें से किसी दवाई को अकेले या ग्रुप में दिया जाता है. जैसे ही रोग के लक्षण दिखें, दवाइयों को शुरू कर देना चाहिए. इन दवाओं से रोग को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है लेकिन यह काफी हद तक कंट्रोल कर देता है. रोग कंट्रोल हो जाने के बाद भी हर दो महीने में डॉक्टर से जांच कराएं, ताकि पता चल सके कि रोग फिर से तो नहीं बढ़ रहा है या दवाइयों का कोई साइड इफेक्ट तो नहीं है. पिछले 10 वर्षो में इस रोग के इलाज में काफी प्रगति हुई है. इसके इलाज के लिए कई बायोलॉजिकल दवाइयां भी आ गयी हैं. ये दवाइयां काफी प्रभावी हैं. ऐसी कुछ ग्रुप की दवाइयों की कीमत 7-8 हजार रुपये प्रति सप्ताह तक होती है. कुछ दवाएं 16-20 हजार रुपये प्रति 15 दिनों की भी आती हैं.
ओमेगा-3 फैटी एसिड है फायदेमंद
रूमेटॉइड आर्थराइटिस में ओमेगा-3 फैटी एसिड से मरीज को अत्यधिक लाभ मिलता है. इस फैटी एसिड में एंटी इन्फ्लेमेट्री गुण होते हैं. इस कारण यह जोड़ों में इन्फ्लेमेशन को रोकता है. ओमेगा-3 फैटी एसिड सालमन मछली से प्राप्त होता है. फिश ऑयल से भी यह मिल सकता है. तीसी, पालक, बींस आदि से इसे प्राप्त कर सकते हैं.
बातचीत : कुलदीप तोमर
योग की महत्वपूर्ण भूमिका
स्वामी सत्यानंद जी के अनुसार पवनमुक्तासन भाग-1 (सूक्ष्म अभ्यास) रुमेटॉइड आर्थराइटिस के लिए श्रेष्ठ माना जाता है. इसके अभ्यास से जोड़ों में लचीलापन आता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं और नव्र्स में प्राणिक ऊर्जा का संचार होता है. इसके अलावा यह तनाव को भी दूर करता है. शरीर के हर जोड़ के तनाव को यह दूर करता है. इसका अभ्यास योग प्रशिक्षक के निरीक्षण में ही करना चाहिए.
त्नआर्थराइटिस के मरीजों को योगनिद्रा और अजपाजप का अभ्यास भी अवश्य करना चाहिए. त्ननाड़ीशोधन और भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास रोज करें.
परहेज : ठंडी चीजें, खट्टे खाद्य पदार्थ, राजमा आदि न खाएं. हरी सब्जी रोज खाएं. (योग गुरु धर्मेद्र सिंह से बातचीत)
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