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बेचैनी और अवसाद में योगोपचार, जानें कैसे करें योग और रहें निरोग

Updated at : 04 Jul 2019 11:39 AM (IST)
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बेचैनी और अवसाद में योगोपचार, जानें कैसे करें योग और रहें निरोग

डॉ प्रशांत कुमार, योग विशेषज्ञ,धनबाद बेचैनी या अवसाद मानसिक दुर्बलता से होने वाली परेशानी है. इसमें ऐसा कोई भी आसन किया जा सकता है, जो ऊर्जादायी हो. इसमें हस्तपादासन, कूर्मासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, योगमुद्रा, सूर्य नमस्कार और शशांकासन उपयोगी हैं. प्राणायामों में नाड़ीशोधन, भ्रामरी, मूर्च्छा, सूर्यभेदी, सीतकारी और शीतली प्राणायाम तथा योगनिद्रा अत्यंत लाभकारी हैं. हस्तपादासन […]

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डॉ प्रशांत कुमार, योग विशेषज्ञ,धनबाद

बेचैनी या अवसाद मानसिक दुर्बलता से होने वाली परेशानी है. इसमें ऐसा कोई भी आसन किया जा सकता है, जो ऊर्जादायी हो. इसमें हस्तपादासन, कूर्मासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, योगमुद्रा, सूर्य नमस्कार और शशांकासन उपयोगी हैं. प्राणायामों में नाड़ीशोधन, भ्रामरी, मूर्च्छा, सूर्यभेदी, सीतकारी और शीतली प्राणायाम तथा योगनिद्रा अत्यंत लाभकारी हैं.

हस्तपादासन : इसे उत्तानासन या स्टैंडिंग फॉरवर्ड पोज भी कहते हैं. योग दिवस से पूर्व, प्रधानमंत्रीजी ने जिन प्रमुख योगासनों के वीडियो ट्वीट किये थे, यह उनमें से एक है. यह आसन शरीर की थकान कम करता है तथा दिमाग को तुरंत शांत और अवसादमुक्त करता है. एंग्जाइटी से होने वाली ब्लड प्रेशर, सिर दर्द और अनिद्रा की समस्या भी इसके अभ्यास से दूर होती हैं.

विधि : खड़े होकर दोनों पंजों के बीच लगभग एक फीट की दूरी रखें. सांस छोड़ते हुए सामने की तरफ झुककर हथेलियों को जमीन पर टिका दें. नाक को घुटने से स्पर्श करने दें. घुटने बिल्कुल सीध में हों. इस अवस्था में 10 सेकेंड से अधिकतम एक मिनट तक सहज श्वास लें और पेट को अधिकतम संकुचित करते हुए श्वास छोड़ें, ताकि पेट की सारी हवा बाहर निकल जाये. फिर श्वास भरते हुए धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में आ जाएं.
सावधानी : खाली पेट ही करें. गर्भावस्था, कमर या आंखों की परेशानी हो तो न आजमाएं.

कूर्मासन : इसे कच्छपासन भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें शरीर को कछुए की तरह सिकोड़ना होता है. यह आसन मन-मस्तिष्क को तरोताजा रखता है. डर और क्रोध को भगाता है. इसके अभ्यास से धैर्य की वृद्धि होती है. इंद्रियों की एकाग्रता बढ़ती है, जीवन के प्रति नकारात्मक भाव समाप्त होता है. मन प्रफुल्लित रहता है और ऊर्जा ऊपर के चक्रों की तरफ बढ़ती है.

विधि : इसे दो तरीकों से किया जाता है. आसान के तरीके के लिए, वज्रासन में बैठकर बायीं एड़ी को अंडकोष के दायीं तरफ तथा दायीं एड़ी को बायीं तरफ स्थित कर दें. दोनों कोहनियों को मिलाकर नाभि पर रखें. अब मुट्ठी आधी बंद कर सांस छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें और शरीर और गर्दन को सीधा रखते हुए सामने की ओर देखें. कुछ पल बाद, श्वास भरते हुए मुट्ठी खोलें और धीरे-धीरे रीढ़ सीधी करें. तकरीबन दो-दो मिनट के लिए तीन बार करें.
सावधानी : हर्निया, स्लिप डिस्क, सायटिका और गंभीर पेटरोगों में न करें.
प्राणायाम :
पहली विधि : जब भी अवसाद घेरे या बेचैनी महसूस हो, पद्मासन में बैठें. रीढ़ बिल्कुल सीधी रखें. आंखें बंद कर कुछ पल धीमी, लंबी व गहरी श्वास लें. श्वास लेते या छोड़ते समय किसी भी तरह की जल्दी न करें. पेट पूरा फूले और पिचके. तकरीबन बीस बार श्वास-प्रश्वास के बाद आप पहले से बेहतर महसूस करने लगेंगे. अब दायीं नासिका को अंगूठे से बंद कर दें और बायीं नासिका से श्वास खीचें. भरपूर श्वास फेफड़े में भर जाने दें. फिर, बायीं नासिका को बंद कर दायीं नासिका से श्वास निकल जाने दें. श्वास लेने और छोड़ने की यह प्रक्रिया इतनी धीमी गति से हो कि स्वयं आपको भी अपनी श्वास की आवाज सुनाई न दे. पांच-सात मिनट ऐसा करने पर आपकी चंद्र नाड़ी चलने लगेगी और आप शीतलता का अनुभव करेंगे. गर्मी के इन दिनों में यह प्राणायाम अन्यथा भी करना चाहिए. शीतकाल में इसे न आजमाएं.
दूसरी विधि : पद्मासन में बैठें अर्थात पालथी लगाकर बायीं एड़ी को दायीं जंघा पर और दायीं एड़ी को बायी जंघा पर रखें. हथेलियां घुटनों पर हों और उनकी दिशा ऊपर की ओर हो. रीढ़ और गर्दन एक सीध में रखते हुए जीभ को बाहर निकालकर नली की तरह मोड़ें और इसी अवस्था में मुख से श्वास अंदर जाने दें. सांस पूरी तरह भर जाये, तो भीतर ही रोक लें, जीभ को मुख के अंदर ले आएं और मुंह बंद कर लें. अब जालंधर बंद लगाएं अर्थात अपनी ठोढ़ी को गर्दन से सटाएं. अंतर्कुंभक लगाये हुए ही इस अवस्था में पांच सेकेंड तक रहें और श्वास धीरे-धीरे बाहर निकल जाने दें. तकरीबन दस मिनट तक करें. कफ हो, तो न करें.
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