आईयूडी से कम होता है महिलाओं में गर्भाशय कैंसर का जोखिम
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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नेशनल कंटेंट सेल एक नयी समीक्षा और मेटा-विश्लेषण से पता चला है कि गर्भ नियंत्रण के लिए अंतर्गर्भाशयी डिवाइस का इस्तेमाल करनेवाली महिलाओं को ग्रीवा कैंसर होने का जोखिम कम रहता है. जर्नल ऑब्सट्रेट्रिक्स और गायनोकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की दर उन महिलाओं में […]
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नेशनल कंटेंट सेल
एक नयी समीक्षा और मेटा-विश्लेषण से पता चला है कि गर्भ नियंत्रण के लिए अंतर्गर्भाशयी डिवाइस का इस्तेमाल करनेवाली महिलाओं को ग्रीवा कैंसर होने का जोखिम कम रहता है. जर्नल ऑब्सट्रेट्रिक्स और गायनोकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की दर उन महिलाओं में एक तिहाई कम थी जिन्होंने इंट्रैब्रेटरीन डिवाइस (आइयूडी) का इस्तेमाल किया था. इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने चेताया कि आइयूडी को कैंसर के रोकथाम के लिए उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह कैंसर होने से कैसे रोकता है.
दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में चिकित्सा प्रमुख व शोध के लीड लेखक विक्टोरिया कौरेटिस ने कहा कि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है, हम इस पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह सच है कि आइयूडी ग्रीवा कैंसर कम करने का काम कर रहा है. लेकिन यह कैसे काम करता है यह कहना अभी जल्दबाजी होगी.
शोधकर्ताओं ने कहा कि वे तंत्र की जांच करने की योजना बना रहे हैं, जिसके द्वारा आइयूडी ग्रीवा के कैंसर की दर को कम कर सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, ग्रीवा कैंसर मानव पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) के कुछ प्रकार के कारण होता है. यह संक्रमण 10 में से एक महिला में पाया जाता है. मेटा-विश्लेषण में, शोधकर्ताओं ने कुल 16 अध्ययनों में दुनियाभर से 12,000 से अधिक महिलाओं पर परीक्षण किया. सभी अध्ययनों में देखा गया कि जीन महिलाओं ने आइयूडी उपयोग किया था उनमें गर्भाशय ग्रीवा कैंसर नहीं पाया गया. बीमारी के जोखिम वाले कारकों पर भी विशेष जानकारी ली गयी. मैकगिल विश्वविद्यालय में कैंसर विज्ञान के निदेशक एडुआर्डो फ्रेंको ने शोधकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पद्धति को बेहतर बताया़.
क्या है आईयूडी
इंट्रा यूट्रिन डिवाइस कई नामों से जाना जाता है. लेकिन अंग्रेजी के T अक्षर के आकार वाला आइयूडी भारत में प्रचलित है. इसे कॉपर टी के नाम से भी जाना जाता है. प्लास्टिस से बने इस डिवाइस पर बारीक तांबे का ताल लिपटा होता है. यह महिलाओं के गर्भाशय में लगाया जाता है. देश में बच्चों में अंतर बनाये रखने के लिए इसका प्रयोग सबसे ज्यादा किया जाता है. इसे निकालने के कुछ ही हफ्तों बाद महिला दोबारा गर्भधारण कर सकती है.
विश्व के कुछ ही देशों में है इसकी पहुंच
कैंसर विज्ञानी फ्रौंको ने बताया आइयूडी और ग्रीवा कैंसर पर शोध के बारे में काफी पहले से विचार किया जा रहा था और इन शोधकर्ताओं ने बेहतर परिणाम दिया है. शोध की समीक्षा के अनुसार प्रतिरक्षात्मक सेवाओं जैसे गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जांच और एचपीवी वैक्सीन की पहुंच दुनिया के कुछ ही हिस्सों में है. लेकिन गर्भाशय कैंसर की दर लगातार बढ़ती जा रही है. जीन देशों में महिलाएं आइयूडी इस्तेमाल कर रहीं हैं उन देशों में इस कैंसर का दर कम होता देखा गया है. शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि आइयूडी उन आबादी पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है जिनके पास इन प्रकार की सेवाओं की कम पहुंच थी.
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