घाटे में चल रही कोयला खदानों को बंद करेगा कोल इंडिया, जस्ट ट्रांजिशन बना समय की मांग

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घाटे में चल रही कोयला खदानों को बंद करेगा कोल इंडिया, जस्ट ट्रांजिशन बना समय की मांग

जलवायु विशेषज्ञ लगातार यह कह रहे है कि जस्ट ट्रांजिशन को लेकर सरकार को ठोस निर्णय लेने चाहिए और इसके लिए नीति बनानी चाहिए अगर सरकार ने इसपर जल्दी ही कोई नीति नहीं बनायी तो झारखंड जैसे राज्य को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

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कोल इंडिया घाटे में चल रही खदानों को ज्यादा दिनों तक बनाये रखने की स्थिति में नहीं होगा. यह बयान हाल ही में कोयला सचिव ने दिया है, जिसने इस बात को पुख्ता किया है कि जस्ट ट्रांजिशन समय की मांग है और जलवायु विशेषज्ञ जस्ट ट्रांजिशन को लेकर जिस तरह मजबूती से अपनी राय रख रहे हैं वह कितना और क्यों जरूरी है.

जस्ट ट्रांजिशन नहीं हुआ तो गंभीर परिणाम होंगे

जलवायु विशेषज्ञ लगातार यह कह रहे है कि जस्ट ट्रांजिशन को लेकर सरकार को ठोस निर्णय लेने चाहिए और इसके लिए नीति बनानी चाहिए अगर सरकार ने इसपर जल्दी ही कोई नीति नहीं बनायी तो झारखंड जैसे राज्य को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. यह आशंका विशेषज्ञों द्वारा इसलिए जाहिर की जा रही है, क्योंकि हाल ही में कोयला सचिव ए के जैन ने एक कार्यक्रम में कहा है कि कोल ब्लाॅकों के प्राइवेटाइजेशन को देखते हुए कंपीटिशन में बने रहने के लिए कोल इंडिया घाटे में चल रहे खदानों को चालू रखने और आर्थिक रूप से कमजोर खदानों को बनाये रखने की स्थिति में नहीं होगा.

23 खदान बंद होंगे

पिछले साल कोल इंडिया की ओर से यह कहा गया था कि वह घाटे में चल रही 23 खदानों को बंद कर देगी और इससे कंपनी को लगभग 500 करोड़ रुपये की बचत करने में मदद मिलेगी. गौरतलब है कि कोल इंडिया पिछले तीन-चार साल में 82 खदानों को बंद कर चुकी है, जिसमें झारखंड के भी कई खदान शामिल हैं. हालांकि कोल इंडिया के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक प्रमोद अग्रवाल का कहना है कि कोयला अगले 10-15 सालों तक देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता रहेगा.

ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम करना बड़ी जिम्मेदारी

जलवायु परिवर्तन से विश्व को बचाने के लिए 2015 में पेरिस समझौता हुआ था जिसे 2016 से लागू कर दिया गया. चूंकि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत अधिक होता है जो जलवायु परिवर्तन में बड़ी भूमिका निभाता है, इसलिए सरकार इनपर नकेल कसने की ओर अग्रसर है और यह इस समझौते की जरूरत और मजबूरी दोनों है. यही वजह है कि जलवायु को बचाने के लिए कार्य करने वाले एक्सपर्ट्‌स लगातार यह कह रहे हैं कि कोल एनर्जी से रिन्यूबल एनर्जी की ओर बढ़ा जाये, लेकिन जो लोग कोयले पर आधारित जीवन जी रहे हैं और खदानों के बंद होने से जिनका जीवन बुरी तरह प्रभावित होगा, उन्हें न्यायसंगत तरीके से किसी और रोजगार में लगाया जाये, ताकि उनके साथ अन्याय ना हो..

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झारखंड होगा बुरी तरह प्रभावित

एनएफआई की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि कोल ट्रांजिशन से झारखंड राज्य अत्यधिक प्रभावित होगा और कई शहर इसकी वजह से वीरान हो सकते हैं, क्योंकि वे पूरी तरह से कोयले पर आधारित हैं. इनमें पाकुड़, पलामू, रांची और कोडरमा का नाम सबसे पहले आता है, जहां जस्ट ट्रांजिशन का बड़ा प्रभाव दिखेगा. इसके अलावा हजारीबाग, रामगढ़, गिरिडीह, सिंहभूम,गोड्डा, धनबाद, चतरा, देवघर और बोकारो जैसे शहर भी प्रभावित होंगे. चूंकि कोयला क्षेत्र में 90 प्रतिशत ऑफ रोल श्रमिक हैं. इसलिए समस्या विकट है और अगर जल्दी ही कुछ नहीं किया गया तो समस्या का निदान करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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