गढ़वा के 71 गांवों को हाथी कॉरिडोर व इको सेंसेटिव जोन में शामिल करने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में क्यों है

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 03 Jan 2022 2:08 PM

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Jharkhand News: वित्तीय वर्ष 2020-21 में हाथियों के झुंड ने दक्षिणी वन क्षेत्र के रंका, रमकंडा, चिनिया, बड़गड़ एवं भंडरिया क्षेत्र में हाथियों द्वारा फसल, मवेशी और घर को नुकसान पहुंचाने के मामले में करीब 28.5 लाख रुपये मुआवजा पीड़ित किसानों को उपलब्ध कराया गया है.

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Jharkhand News: जंगली हाथियों को सुरक्षित रखने एवं उनसे इंसानों की जिंदगी व संपत्ति की रक्षा करने के लिये वन विभाग के निर्देश पर गढ़वा दक्षिणी वन क्षेत्र के पांच प्रखंडों के 71 गांवों को हाथी कॉरिडोर व इको सेंसेटिव जोन में शामिल किये जाने का प्रस्ताव अभी भी लंबित है. वन विभाग द्वारा पिछले वर्ष ही वन्य प्राणी प्रमंडल रांची को प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन अब तक इस प्रस्ताव के लंबित रहने से हाथियों के उत्पात को रोकने के लिये विभाग की ओर से कोई विशेष पहल नहीं हो पा रही है.

जानकारी के अनुसार विभाग द्वारा भेजे गये इस प्रस्ताव में मैप के जरिये हाथियों के मूवमेंट की जानकारी और हाथियों के आतंक से प्रभावित 71 गांवों की सूची को शामिल किया गया है. इनमें जिले के रंका, रमकंडा, भंडरिया, बड़गड़ व चिनिया वन क्षेत्र के 71 गांव शामिल हैं. इन गांवों को हाथी कॉरिडोर व इको सेंसेटिव जोन घोषित होने के बाद इसका सीधा फायदा हाथियों से प्रभावित गांवों को मिलेगा. वहीं केंद्र व राज्य सरकार का इन गांवों में विशेष फोकस रहने के कारण हाथियों के संरक्षण व उसके बचाव पर कार्य योजना तैयार हो सकेगी. इसके बाद इन गांवों में हाथियों के आतंक को रोकने का प्रयास होगा, जिससे ग्रामीणों के फसल, जान-माल सहित घरों को क्षतिग्रस्त होने से बचाव में सुविधा मिलेगी.

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उल्लेखनीय है कि जिले के दक्षिणी वन क्षेत्र के इन 71 गांवों में हाथियों का आवागमन पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र से होता है. इससे पूर्व के वर्षों में गढ़वा की सीमा पर स्थित कनहर नदी के पार छत्तीसगढ़ से हाथियों का झुंड इन गांवों में पहुंचता था. इस बात का उल्लेख वन विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में किया है. यहां प्रत्येक वर्ष हाथियों का झुंड इन गांवों में पहुंचकर धान की खोज में घरों को क्षतिग्रस्त करता है. इसके साथ ही मवेशी व जान- माल का नुकसान सहित फसलों को रौंदकर बर्बाद कर दिया जाता है. इसके एवज में वन विभाग प्रत्येक वर्ष पीड़ित ग्रामीणों को क्षतिपूर्ति की राशि उपलब्ध कराता है, लेकिन हाथियों को रोकने व उसके संरक्षण को लेकर विभाग के पास अब तक कोई विशेष फंडिंग की व्यवस्था नही है, ताकि किसी कार्य योजना को लागू कर हाथियों के आतंक से ग्रामीणों को बचाया जा सके. दरअसल हाथियों को चरने के लिये एक वृहद मैदान की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिकतर रिज़र्व क्षेत्र इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते हैं. यही कारण है कि हाथी अपने आवास से बाहर से निकल आते हैं, जिससे मनुष्य के साथ हाथियों का संघर्ष बढ़ जाता है.

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गढ़वा जिले के दक्षिणी वन क्षेत्र वाले रंका पश्चिमी व पूर्वी, भंडरिया व कुटकु एरिया में प्रत्येक वर्ष हाथियों का उत्पात अक्टुबर महीने से शुरू होकर मार्च महीने तक चलता है. हाथियों द्वारा अक्सर धान की खोज में ही घरों को क्षतिग्रस्त किया जाता है. इसके साथ ही अन्य जिले भी हाथियों की आवाजाही से प्रत्येक वर्ष परेशान रहते हैं. जानकारी के अनुसार जंगली हाथियों का झुंड सालोंभर गढ़वा के अलावा गिरिडीह, धनबाद, हजारीबाग, बोकारो, पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम, जामताड़ा, दुमका सहित अन्य जिलों में उत्पात मचाते हैं. यहां प्रत्येक साल दर्जनों लोगों को जंगली हाथी कुचलकर मार डालते हैं. वहीं जान-माल की भारी क्षति के साथ प्रमुख रूप से धान की फसल चट कर जाते हैं. इसके साथ ही धान की खोज में सैकड़ो घरों को क्षतिग्रस्त कर देते हैं. वन विभाग के पास लोगों को इस संकट से मुक्ति दिलाने का प्रबंध नहीं है. महज पश्चिम बंगाल के बाकुड़ा से विशेषज्ञों को बुलाकर हाथियों को एक जिले से खदेड़कर उन्हें दूसरे जिले में भेज दिया जाता है. जहां दूसरे जिलों या वन क्षेत्रों में पुनः हाथियों का आतंक शुरू हो जाता है और यही कार्रवाई सालभर चलता रहता है.

गढ़वा दक्षिणी वन क्षेत्र के अंतर्गत रंका पश्चिमी वन क्षेत्र के 19 गांवों को हाथी कॉरिडोर में शामिल किया गया है. इनमें चिनिया, डोल, चपकली, राजबांस, बिलैतिखैर, छतेलिया, चिरका, हेताड़कला, पाल्हे, बेसरी, पुरेगाड़ा, सलवाहि, परसुखाड़, नगाड़ी, बाराडीह, नागशिली, करमाखुर्री, मसरा, सिंदे के नाम शामिल है. इसी तरह रंका पूर्वी वन क्षेत्र के 24 गांवों में अनहर, बाहोकूदर, बान्दू,गांगोडीह, दलदलिया, कर्री, दमारण, कटरा, विश्रामपुर, बलिगढ़, गोबरदहा, केरवा, रोहड़ा, रमकंडा, रकसी, मंगराही, मुरली, दुर्जन, चुटिया, भौरी, बरवाहि, बरदरी, चुतरु, बान्दू के नाम शामिल है. वहीं भंडरिया वन क्षेत्र के 25 गांवों में मरदा, नौका, जोन्हीखाड़, तेवाली, छेतकी, बिराजपुर, कुशवार, बैरिया, बरवा, रोदो, बिंदा, बरकोल, रामर, गड़िया, बढ़नी, सालो, बरीगंवा, परसवार, टेहड़ी, बरकोल कला, बरकोल खुर्द, बाड़ी खजूरी, खजूरी, गोठानी व बड़गड़ के नाम शामिल किया गया है. इसी तरह कुटकु वन क्षेत्र के तीन गांवों में रूद, लिधकी व पररो गांव को हाथी कॉरिडोर के प्रस्ताव में शामिल किया गया है.

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हाथी कॉरिडोर व इको सेंसेटिव जोन प्रस्तावित क्षेत्र में भंडरिया व बड़गड़ प्रखण्ड क्षेत्र के 28 गांवों में 2011 के आंकड़ो के अनुसार करीब 1818.4 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती किया जाता है. इनमें मरदा गांव में 84.2, नौका में 84.2, जोन्हीखांड़ में 24.4, तेवाली में 10.1, छेतकी में 52.1, रोदो में 222.2, बिंदा में 68.2, रामर में 89.1, गड़िया में 62.8, बढ़नी में 31.6, सालों में 43.6, बरीगंवा में 19.2, परसवार में 337.8, टेहरी में 97.5, बरकोल कला में 52.2, बरकोल खुर्द में 96.8, बाड़ी खजूरी में 53, गोठानी में 127.5, बड़गड़ में 167.1, रुद में 33.4, लिधकी में 16.4 व पर्रो में 45.2 हेक्टेयर में हो रहे धान की खेती प्रत्येक वर्ष हाथियों द्वारा प्रभावित होता है. इसी तरह चिनिया प्रखण्ड के चिनिया में 3296.7 हेक्टयर में खेती होती है. इनमें चिनिया में 456.6, डोल में 430.9, चपकली में 401.2, बिलैतिखैर में 353.6, छतेलिया में 320.6, चिरका में 335.9, पाल्हे में 77.7, बेसरी में 21.6, पुरेगाड़ा में 19.8, परसुखांड में 85.8, नागशिली में 86, खुर्री में 339.7, मसरा में 299.9, सिंदे में 67.4 हेक्टेयर में होने वाली खेती हाथियों से प्रभावित होता है. इसके साथ ही रमकंडा के 5432.1 हेक्टयर में होने वाली खेती हाथियों द्वारा क्षतिग्रस्त होता है. इसमें हाथी कॉरिडोर प्रस्तावित क्षेत्र बलिगढ़ में 1934.4, केरवा में 227.8, रकसी में 670.8, मंगराही में 471.4, मुरली में 116.4, दुर्जन में 704.2, बिराजपुर में 458.4, कुशवार में 188.4, बैरिया में 330.5 व बरवा में 329.8 हेक्टेयर में लगी फसले बर्बाद होती है. इसी तरह रंका प्रखंड में कुल 2374.9 हेक्टेयर में लगी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. इसमें अनहर गांव में 90, बाहुकुदर में 9.5, गांगोडीह में 35.2, दलदलिया में 12.1, कर्री में 359.3, दमारण में 87.7, कटरा में 233.5, बिश्रामपुर में 184.5, भौरी में 289.4, चुटिया में 326.4, बरवाहि में 208.3, बरदरी में 308.4, चुतरु में 147, बान्दू में 83.6 हेक्टेयर में होने वाली फसल शामिल हैं

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हाथियों के आतंक से क्षतिग्रस्त मकान, जान माल के नुकसान होने की स्थिति में ग्रामीणों के आवेदन पर वन विभाग क्षति का आकलन कर सरकारी प्रावधान के तहत पीड़ित ग्रामीणों को मुआवजा उपलब्ध कराता है. विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार इस वर्ष हाथियों के झुंड ने अब तक गढ़वा दक्षिणी वन क्षेत्र के रमकंडा, बलिगढ़, गोबरदहा, पाट गांव के 17 घरों को क्षतिग्रस्त कर करीब 20 क्विंटल अनाज खा चुके हैं. वहीं कई मामले अभी तक विभाग के पास नही पहुंचा है. इससे मामलों की संख्या और बढ़ सकती है. फिलहाल इसके इस नुकसान के एवज में विभाग अब तक करीब दो लाख रुपये मुआवजा उपलब्ध करा चुका है. इसी तरह वित्तीय वर्ष 2020-21 में हाथियों के झुंड ने दक्षिणी वन क्षेत्र के रंका, रमकंडा, चिनिया, बड़गड़ एवं भंडरिया क्षेत्र में हाथियों द्वारा फसल, मवेशी और घर को नुकसान पहुंचाने के मामले में करीब 28.5 लाख रुपये मुआवजा पीड़ित किसानों को उपलब्ध कराया है. आंकड़ों के अनुसार इन प्रखंडों में हाथियों ने आठ पशुधन को पटक कर मार डाला है. वहीं मानव द्वंद में गंभीर रूप से दो व साधारण रूप में पांच ग्रामीण घायल हुये हैं. इसके साथ ही हाथियों ने गंभीर व आंशिक रूप से 95 घरों को क्षतिग्रस्त किया है. वहीं 66 किसानों के 16.54 हेक्टेयर खेतों में लगे फसलों को रौंदकर बर्बाद करने के साथ ही करीब 173 क्विंटल अनाज खा गये हैं. इसी तरह वित्तीय वर्ष 2019-20 में हाथियों ने 16 मवेशियों सहित 3 ग्रामीणों को पटक कर मार डाला. वहीं, 8 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. इसके साथ ही 82 किसानों के फसलों को हाथियों ने नुकसान पहुंचाया था. वहीं 86 किसानों के सैकड़ों क्विंटल धान चट कर गये थे. इसके साथ ही हाथियों ने 111 मकानों को क्षतिग्रस्त कर दिया था. इनमें 50 मकान गंभीर रूप से तो, वहीं 61 मकानों को आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त किया था. इस नुकसान के एवज में विभाग ने करीब 43 लाख मुआवजा उपलब्ध कराया था.

रिपोर्ट: विनोद पाठक/मुकेश तिवारी

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