वेब सीरीज -तस्करी – द स्मगलर्स वेब
निर्देशक -नीरज पांडे
कलाकार -इमरान हाशमी ,नंदीश संधू,अमृता खानविलकर,अनुजा साठे ,जमील खान ,जोया अफरोज, फ्रेडी दारुवाला,अनुराग सिन्हा, शरद केलकर और अन्य
प्लेटफॉर्म -नेटफ्लिक्स
रेटिंग -तीन
Taskaree The Smuggler’s Web Review:भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसीज के अनसंग हीरोज की कहानी बताने में माहिर निर्माता निर्देशक नीरज पांडे इस बार वेब सीरीज “तस्करी” से भारतीय कस्टम ऑफिसर्स की कहानी लेकर आये हैं. कहानी असल घटनाओं पर आधारित है.जिससे रोमांच का भरोसा और बढ़ जाता है.एयरपोर्ट पर होने वाली तस्करी को यह सीरीज डिटेल में दिखाती भी है,लेकिन ट्विस्ट एंड टर्न थोड़े प्रेडिक्टेबल रह गए हैं. इसके बावजूद कहानी, उसका ट्रीटमेंट और कलाकारों का अभिनय इसे देखने लायक बनाता है.
ये है कहानी
यह सीरीज भारतीय कस्टम ऑफिसर्स की कहानी है. मुंबई एयरपोर्ट्स से जब लगातार तस्करी की खबरें संसद में सरकार के लिए सिरदर्द बन जाती है,तो सरकार ईमानदार ऑफिसर प्रकाश सिंह (अनुराग सिन्हा )को इसकी जिम्मेदारी सौंपती है.जांच में मालूम होता है कि इस तस्करी का मास्टरमाइंड मिलान में रहने वाला भारतीय मूल का बिजनेस मैन बड़ा चौधरी (शरद केलकर )है. उसके तस्करी का जाल बहुत मजबूत है. देश ,विदेश के अलावा इसमें भारतीय कस्टम के लोग भी मिले हुए हैं. जिस वजह से प्रकाश सिंह तीन ईमानदार लेकिन सस्पेंड ऑफिसर्स अर्जुन मीणा (इमरान हाशमी ),मिताली (स्नेहा खानविलकर )और गुज्जर (नंदिश संधू ) की बहाली कर बड़े चौधरी के सिंडिकेट को रोकने की जिम्मेदारी देता है,लेकिन बड़ा चौधरी के तस्करी के जाल को तोड़ना आसान नहीं है. ईमानदार ऑफिसर्स हैं ,तो बेईमानों की भी कमी नहीं है.कब कौन बड़े चौधरी की तरफ हो जाए पता नहीं. जिससे यह लड़ाई बहुत जल्द पर्सनल बन जाती है.ऐसे में अर्जुन मीणा और उसके साथी बड़े चौधरी और उसके सिंडिकेट का खात्मा किस तरह से करते हैं. यही कहानी है.
सीरीज की खूबियां और खामियां
इस शो के क्रिएटर नीरज पांडे हैं, इसलिए इस सीरीज से भी उम्मीदें बढ़ी हुई थी. विषय के साथ इस बार भी उन्होंने पूरी तरह से न्याय किया है. एयरपोर्ट पर होने वाली तस्करी को कभी किसी भी हिंदी फिल्म या सीरीज में इतने डिटेल में नहीं दिखाया गया है. तस्करी ही नहीं कस्टम ड्यूटी के बारे में भी यह सीरीज डिटेल में जानकारी देती है. कस्टम की खुफिया एजेंसी कॉइन के बारे में भी बात हुई है. कहानी सात एपिसोडस के जरिये कही गयी है. हर एपिसोड में जिस तरह से कहानी का अंत होता है. उससे अगले एपिसोड को देखने की उत्सुकता बनी रहती है.इसके लिए नीरज और उनके टीम की तारीफ बनती है.सीरीज शुरू होने के साथ ही सीधे मुद्दे पर आ जाती है.दो ट्रैक मोहब्बत वाले भी है ,लेकिन उन्हें उतना ही रखा गया है जिससे मूल कहानी प्रभावित ना हो और वह मूल कहानी में कुछ जोड़ जाए. लेखन में सबकुछ अच्छा ही हुआ है.ऐसा भी नहीं है. सीरीज की जैसे शुरुआत हुई थी. क्लाइमेक्स उसके साथ न्याय नहीं कर पाया है.रियलिस्टिक ट्रीटमेंट वाली इस सीरीज का क्लाइमेक्स फ़िल्मी हो गया है.सबकुछ जैसे हड़बड़ी में खत्म कर दिया गया है. जिस तरह की शख्सियत बड़े चौधरी को सीरीज में बताया गया था. कहानी में वैसा प्रभाव नहीं आ पाया है. प्रिया पर फिर से भरोसा करने की बात समझ से परे लगती है. सीरीज के दूसरे पहलुओं पर आये तो नीरज पांडेय की यह सीरीज है तो ढेर सारे लोकेशंस स्क्रीन पर नज़र आएंगे ही. इस सीरीज में भी मुंबई के अलावा कहानी मिलान ,अल दिराह,बैंकॉक में लगातार आती जाती रहती है. जिस तरह से भारत के साथ -साथ विदेशी लोकेशंस में फिल्म को जमकर शूट किया गया है.वह सीरीज को रियलिस्टिक लुक देने के साथ साथ भव्यता भी देती है. गीत संगीत में बेला सियाओ को जोड़ा गया. बीजीएम कहानी के साथ न्याय करता है. संवाद साधारण रह गए हैं .
एक्टर्स ने किया कमाल
इमरान हाशमी इस सीरीज का चेहरा हैं और उन्होंने अपनी भूमिका को पूरी ईमानदारी से जिया है.वह सीरीज के हीरो होते हुए भी हीरोइज्म को फ़िल्मी नहीं बल्कि बहुत रियलिस्टिक तरीके से परदे पर दिखाते हैं.नंदीश संधू ,अमृता खानविलकर और प्रिय अफ़रोज़ ने अपने किरदार में छाप छोड़ी है तो अनुराग सिन्हा की भी तारीफ बनती है.शरद केलकर अपनी भूमिका में जमें हैं लेकिन उन्हें थोड़ा और स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था.यह बात सीरीज देखते हुए कई बार महसूस होती है. जमील खान ,फ्रेडी दारुवाला सहित बाकी के किरदारों ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

