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Pippa Movie Review: 1971 के भारत पाकिस्तान के वॉर बैकड्राप की शानदार कहानी पर बनी औसत फिल्म 'पिप्पा'

Updated at : 16 Aug 2024 1:04 PM (IST)
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Pippa Movie Review: 1971 के भारत पाकिस्तान के वॉर बैकड्राप की शानदार कहानी पर बनी औसत फिल्म 'पिप्पा'

भारत और पाकिस्तान युद्ध हिंदी सिनेमा के पसंदीदा विषयों में से एक रहा है. समय - समय पर इस विषय पर फ़िल्में बनती रही हैं और 1971 के वॉर पर बॉर्डर, गाजी से लेकर राजी तक बन चुकी है. इसी युद्ध की कहानी की एक अहम घटना को निर्देशक राजा मेनन की फिल्म पिप्पा में कहा गया है.

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फ़िल्म- पिप्पा

निर्माता- आरएसवीएपी

निर्देशक- राजा मेनन

कलाकार- ईशान खट्टर, प्रियांशु पेनयुली, मृणाल ठाकुर, सोनी राजदान, इनामुल हक,चंद्रचूर राय, अनुज सिंह दुहान, कमल सदाना, फ्लोरा डेविड जैकब और अन्य

रेटिंग- ढाई

भारत और पाकिस्तान युद्ध हिंदी सिनेमा के पसंदीदा विषयों में से एक रहा है. समय – समय पर इस विषय पर फ़िल्में बनती रही हैं और 1971 के वॉर पर बॉर्डर, गाजी से लेकर राजी तक बन चुकी है. इसी युद्ध की कहानी की एक अहम घटना को निर्देशक राजा मेनन की फिल्म पिप्पा में कहा गया है. वॉर टैंक पीटी 76 जिसे भारतीय सैनिक पिप्पा कहते थे. इस युद्ध में पिप्पा की अहमियत को यह फिल्म दर्शाती है. यह पारिवारिक रिश्तों की भी कहानी है. यह मानवता की कहानी के साथ साथ गर्व की भी कहानी है, यह फिल्म इस बात को भी सामने लाती है कि पूरी दुनिया में शायद ही किसी देश ने किसी दूसरे देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ाई लड़ी होगी. कुलमिलाकर इस फिल्म के विषय में इमोशन, ड्रामा और जज्बा सबकुछ था, जो एक बेहतरीन फिल्म की जरूरत थी, लेकिन परदे पर मामला औसत वाला रह गया है.

वॉर बैकड्राप वाली यह फिल्म रिश्तों की भी है कहानी

फिल्म की कहानी ब्रिगेडयर बलराम सिंह मेहता की. लिखी किताब द बर्निंग चैफिज पर आधारित है. कहानी की मुख्य धुरी देश की सेवा के लिए समर्पित एक सैनिक का परिवार है, जिसमें दो भाई हैं, बड़े भाई, मेजर राम मेहता (प्रियांशु पेन्युली), और छोटे भाई, कैप्टन बलराम सिंह मेहता (ईशान खट्टर). हर दूसरी हिंदी फिल्म की तरह जिम्मेदारी बड़े भाई को सख्त बना गयी है और छोटा शरारती है. जिस वजह से उन दोनों में आए दिन कहासुनी होती रहती है.उनकी एक बहन राधा ( मृणाल )और मां ( सोनी राज़दान ) भी है. जो दोनों को संभालती रहती हैं. कहानी मूल मुद्दे फिर आती है और हम देखते हैं कि राम और बलराम को 1971 के युद्ध के लिए बुलाया जा रहा है, जिसमें भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से आज़ाद कराने के लिए लड़ा था, जिसे अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है. दोनों अलग -अलग जिम्मेदारियों के साथ अपने अलग-अलग रास्ते पर युद्ध में चलते हैं. क्या उनके रास्ते युद्ध के मैदान में एक. होंगे, जो इनके निजी जिंदगी के रिश्ते को भी नया मोड़ देंगे. यही फिल्म की आगे की कहानी है.

फिल्म की खूबियां और खामियां

फिल्म की कहानी का विषय रोचक है, जिसमें मानवता का पहलू जुड़ा हुआ है. मौजूदा गाजा की त्रासदी को देखते हुए यह कहानी और भी महत्वपूर्ण हो गयी है कि जब एक देश ने दूसरे देश में शांति बहाली के लिए युद्ध लड़ा था. वैसे वॉर के साथ साथ रिश्तों की उधेड़ बुन भी कहानी का अहम हिस्सा है लेकिन जिस तरह से इस वॉर बैकड्राप में पारिवारिक रिश्तों को जोड़ा गया हैं. वह उस तरह से परदे पर नहीं आ पाया है, जिससे इमोशनल कनेक्शन बन पाए.भाइयों के बीच वाली केमिस्ट्री मिसिंग है. इसके साथ ही फिल्म वॉर टैंक पीटी 76 को बलराम अपनी जान कहते हैं, फिल्म के कहानी में किसी भी दृश्य में यह बात प्रभावी ढंग से सामने नहीं आ पायी हैं. पिप्पा की कार्यशैली को उस रोमांच के साथ नहीं दर्शाया गया है, जो इसकी सबसे बड़ी जरूरत थी.

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फिल्म में पाकिस्तान की तैयारियों के बारे सिर्फ कुछ संवाद में बताया गया है. इसके अलावा फिल्म का मुख्य मकसद कि एक देश ने दूसरे देश की आजादी के लिए हथियार उठाया था. ये पहलू भी उस गौरव के साथ परदे पर नहीं आ पाया है. किरदार भी अधपके से रह गए हैं. राधा यानी मृणाल का किरदार फिल्म में क्रिप्टोग्राफी को जानती है कैसे उसने यह सीखा इसकी बैक स्टोरी फिल्म में मिसिंग है।सिर्फ यह कहकर जानकारी दे दी गयी कि मेरी रूचि इसमें है. फिल्म के गीत- संगीत की बात करें तो यह कहानी के विषय और दौर दोनों के साथ न्याय करती है. रैप सांग 70 के दशक वाली कहानी में थोड़ा अटपटा लग सकता है, लेकिन फिल्म में वह न्याय करता है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. फिल्म की सिनेमाटोग्राफी, कॉस्टयूम से लेकर प्रोडक्शन डिजाइन तक मजबूत पक्ष है. हां एक्शन कोरियोग्राफी पर थोड़ा और काम करने की जरूरत थी.

प्रियांशु अभिनय में ईशान से रहे हैं बेहतर

ईशान खट्टर एक अच्छे अभिनेता हैं,यह उन्होंने अपनी अब तक की कई फिल्मों में साबित किया है, लेकिन इस फिल्म में सैनिक के तौर पर वह थोड़े कमज़ोर रह गए हैं. उनके चेहरे और वह बॉडी लैंग्वेज में वह भाव नहीं आ पाया है, जो इस कहानी और उनके किरदार की की जरूरत थी. प्रियांशु पैनयुली एक सैनिक के रूप में ईशान से बेहतर काम किया हैं. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. मृणाल ठाकुर के लिए फिल्म में करने को कुछ खास नहीं था. बाकी के किरदारों ने भी सीमित स्पेस में अपने किरदार के साथ बखूबी न्याय किया है.

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कोरी

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