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Exclusive: सिर्फ एक्टर की फिल्म नहीं होती है सभी की होती है- नुसरत भरुचा

नुसरत भरुचा अपनी फिल्म हॉरर फिल्म छोरी को लेकर चर्चाओं में हैं. ये फिल्म सफल मराठी फिल्म लपाझापी का हिंदी रिमेक है.

By उर्मिला कोरी
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नुसरत भरुचा
नुसरत भरुचा
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प्यार का पंचनामा और सोनू के टीटू की स्वीटी फेम नुसरत भरुचा अपनी फिल्म हॉरर फिल्म छोरी को लेकर चर्चाओं में हैं. अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हो रही उनकी फिल्म सफल मराठी फिल्म लपाझापी का हिंदी रिमेक है. उनकी इस फ़िल्म और करियर पर उर्मिला कोरी की हुई बातचीत

फ़िल्म छोरी के ट्रेलर लॉन्च में आपके माता पिता भी आए थे कितना खास और अलग अनुभव करार देंगी?

यह पहला मौका है. जब मेरी किसी फिल्म के लांच पर मेरे माता पिता आए. ऐसा नहीं है कि मैं पहले उन्हें लाना नहीं चाहती थी लेकिन मैं अब तक बड़ी स्टारकास्ट वाली ही फिल्मों का हिस्सा रही हूं. मुझे लगता था कि वो आकर खोए हुए से महसूस ना करें. मैं अपने मम्मी पापा को बोलती थी कि आप घर पर चिल करो. मैं आकर आपको लाइव अपडेट दूंगी. इस बार छोटी टीम थी और मेरे घर से यह जगह थोड़ी ही दूरी पर है तो मुझे लगा आ ही जाओ. यह पहली बार है जब मैं किसी फिल्म का सोलो चेहरा हूं. मुझे लगा कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है. आखिरकार उन्हें यह महसूस तो हो कि मेरे लिए उन्होंने जो भी कोम्प्रोमाईज़ अपनी ज़िंदगी में किए. वह फलीभूत हुआ है.

छोरी में आप प्रेग्नेंट महिला की भूमिका में हैं उस अनुभव को कैसे परिभाषित करेंगी?

बहुत मुश्किल था. सांस भी नहीं आती थी. मैं कई बार कहती कि रुको थोड़ा वॉक लेकर आती हूँ. कुछ दिनों की शूटिंग में वो प्रोस्थेटिक पेट के साथ रहना मुश्किल था. गर्भवती महिलाएं नौ महीने वैसे रहती हैं उसके बाद डिलीवरी का दर्द. मैं बस सोच ही सकती हूं. मैं कभी मां बनी तो यही कहूंगी कि मुझे बेहोश कर दो. मेरे से नहीं होगा.इस फ़िल्म को करने के बाद माओं के प्रति सम्मान बढ़ा है. यह फिल्म भ्रूण हत्या के संवेदनशील मुद्दे को छूती हैं किस तरह से उसने आपको छुआ ये बात हम सबको पता है लेकिन जब वो आंकड़ों के तौर पर हमारे सामने आती है तो आप हिल जाते हो और आप उसको ओके नहीं बोल पाते हो. मैं अटक जाती हू. मैं उनमें से नहीं हूँ जो सिर्फ ये कह दे कि ये नहीं होना चाहिए. मैंने जो फील किया है. वो मैंने पर्दे पर डाला है. मैं इससे ज़्यादा नहीं बता पाउंगी वरना फिल्म की कहानी सामने आ जाएगी.

एक महिला होने के नाते क्या आपको कभी भेद भाव से गुज़रना पड़ा है?

मेरा परिवार बहुत ही ज़्यादा प्रोग्रेसिव रहा है. बहुत ही ज़्यादा सपोर्टिंव रहा है. यह मेरी मां का फैसला था कि उन्हें सिर्फ एक बच्चा चाहिए. मेरे बाद उन्होंने दूसरा बच्चा प्लान नहीं किया. मेरी दादी मेरी सबसे बड़ी सपोर्टर रही हैं , जब मैंने उन्हें कहा कि मैं अभिनेत्री बनना चाहती हूँ तो उन्होंने कहा था कि ज़रूर. मैंने अपने परिवार और घर में कभी किसी भेदभाव का सामना नहीं किया है. मैं जितनी पागल हूं और जितना कुछ कर लेती हूं वो इसी वजह से कि मेरी ग्राउंडिंग बहुत ही सही है. जब मैं महिलाओं के प्रति भेद भाव की घटनाओं को सुनती हूं तो मेरे लिए वो शॉकिंग होती है. मुझे यह कहते हुए बहुत दुःख होता है कि मैं प्रिविलेज हूं. यह वैश्विक समस्या है जिससे दुनिया भर की महिलाएं जूझ रही हैं. दूसरे मुद्दे होने चाहिए ये नहीं होना चाहिए.

यह फिल्म मानसिक तौर पर आपके लिए कितनी मुश्किल थी उससे निकलना कितना मुश्किल था?

इस फ़िल्म की शूट से जब वापस आयी तो मैं दो महीने तक कुछ नहीं कर पायी. मैं लोगों से मिलती कम थी. बात भी कम करती थी. मुझे नुसरत के तौर पर कमबैक करने में मुश्किल हुई. इस फ़िल्म से जुड़ा जो इमोशन है. वो आपको छोड़ता ही नहीं है.मैंने इस किरदार के लिए तीन महीने तयारी की फिर २८ दिन शूटिंग फिर डबिंग. आप जो पांच छह महीने का लाइफ जीते हैं. उससे आसानी से निकल नहीं पाते हैं.

क्या इंडस्ट्री में आप उस मुकाम पर पहुँच गयी हैं जहाँ मेकर्स आप पर भरोसा कर रहे हैं क्योंकि आप इस फिल्म का चेहरा हैं?

मैं चाहती हूँ कि लोग मुझ पर भरोसा करें. लोगों का भरोसा होगा तो ही आगे चलकर लोग मुझे काम दें पाएंगे. ऐसी पिक्चरें बन पाएंगी. ऐसी फिल्में बन रही हैं तो इसका श्रेय दर्शकों को जाता है क्यूंकि वो लड़कियों की फिल्म देख रहे हैं. दर्शकों को भी समझ आ चुका है कि एक्ट्रेस सिर्फ अच्छा डांस करने और बहुत खूबसूरत दिखने भर नहीं होती है. वो और भी बहुत कुछ कर सकती हैं. हम एक लड़ाई लड़ते हैं तो कैसे लड़ते हैं. वो ये देखना चाहते हैं. मुझे लगता है कि मैं एक अच्छी दुनिया में रह रही हूं.

ओटीटी पर फिल्म रिलीज हो रही है तो क्या प्रेशर कम है?

थिएटर में भी रिलीज होती तो मुझे प्रेशर काम होता था. मैंने कभी पिक्चर का प्रेशर नहीं लिया था. अभी तक तो हीरो प्रेशर ले रहे थे. मुझे ये कांसेप्ट समझ में नहीं आता है. जब एक एक्टर कहता है कि बॉक्स ऑफिस मेरी फिल्म की इतनी कमाई थी. मुझे नहीं लगता है कि वो सिर्फ एक्टर की फिल्म होती है. वो सबकी फिल्म होती है. यही वजह है कि मैं कहती हूँ कि हमारी फिल्म ने इतना बिजनेस किया तो मुझे प्रेशर नहीं है. निर्देशक विशाल सर ने अपना काम किया है लेखक ने अपना. विक्रम सर ने अपना काम किया है. नहीं चली तो सबका घाटा है सिर्फ मेरा नहीं. चलेगी तो हम सब ऊपर उठेंगे. एक्टर फिल्म का चेहरा होता है तो जिम्मेदारी बन ही जाती है. तो यही वजह है कि मैंने एक्टर बनने को स्वीकार किया है. मैं किसी चीज़ को लेकर सहम कर नहीं बैठ सकती हूँं. मुझे लगता है कि यही साहसिक कदम है. मैं अच्छी दिख रही हूं. बुरी दिख रही हूं. स्टेज पर गिर गयी. यह पूरी दुनिया के सामने है. उसके सामने ही हम उठकर खड़े होते हैं अपनी शक्ल दिखाते हैं. इसके साथ आपको प्लस माइंस सब लेना ही पड़ेगा.

आप छोरी का चेहरा हैं क्या अब आप फिल्मों का चुनाव सोच समझकर करेंगी?

बिल्कुल भी नहीं , मुझे अगर ड्रीम गर्ल ऑफर हुई तो मैं फिर करना चाहूंगी भले ही उसमें मेरे तीन सीन और चार गाने हो. वो भी बहुत ख़ुशी ख़ुशी. मैं आम दर्शक की तरह हूं. जो हर तरह की फिल्में देखते हैं तो मुझे करने में क्यों परहेज होगा. एक्टर के तौर पर ग्रो कर रही हूं तो नाच गाने वाले रोल के साथ साथ मैं स्ट्रांग किरदार भी करना चाहूंगी . मौका भी दोनों का मुझे मिल रहा तो मैं करुँगी.

इंडस्ट्री में एक्ट्रेस के तौर पर प्रतिस्पर्धा में बनें रहने या आने के लिए क्या छोरी जैसी फिल्में करना ज़रूरी होती हैं?

मुझे ज़रूरी कुछ भी नहीं लगता है करना या ना करना. आप मेरे करियर को देखेंगी तो पाएंगी कि मैंने एक साल में एक फिल्म की है दो साल में एक फिल्म की है. ज़रूरी लगता तो उस वक़्त लगता. छह सात जगह जाकर मीटिंग्स करके कुछ न कुछ करके किसी न किसी फिल्म में कास्ट हो ही जाती है. एलएसडी हिट हो ही गयी थी मैंने नहीं किया क्यूंकि मैं जो कर रही थी उसमें मुझे मज़ा आ रहा था. मैं उस वक़्त सीख रही थी तो धीरे धीरे आगे बढ़ना चाहती थी दौड़ना नहीं चाहती थी. आकशवाणी फ्लॉप हुई तो लगा कि थोड़ा और सीखते हैं. जब आत्मविश्वास आया कि मैं तीन चार चीज़ें कर सकती हूं तो मैंने थोड़ी सी हिम्मत दिखाई और साहसिक फिल्मों के चुनाव करने लगी. सच बात ये भी है कि पांच साल पहले छोरी मुझे कोई ऑफर नहीं करता था. प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए अगर ज़िंदगी और काम को अप्रोच करुंगी तो मैं पचास चीज़ें और सोचूंगी. काम नहीं कर पाउंगी तो मैं ये सब नहीं सोचती हूं.

अक्सर कहा जाता है कि इंडस्ट्री पुरुष प्रधान है मौजूदा दौर में आप बदलाव महसूस करती हैं?

मुझे नहीं पता कि इंडस्ट्री पुरुष प्रधान नहीं रही या है. मुझे प्रियंका चोपड़ा का इंटरव्यू याद है. जब मैरीकॉम रिलीज हुई थी. उन्होंने कहा था कि आप इस फिल्म को महिला प्रधान फिल्म कह रहे हैं. यह बात मुझे दुखी कर रही है. जब हीरो किसी फिल्म के पोस्टर में होता है तब तो आप उसे नहीं कहते हैं कि यह पुरुष प्रधान फिल्म है. हम अभी भी उसी भाषा में हैं. उसी सोच में हैं. सवाल अभी भी वही है. मैरीकॉम के बाद कितनी फ़िल्में आयी हैं. इंडस्ट्री और लोगों की सोच ज़्यादा नहीं बदली हैं लेकिन मैं ये ज़रूर कहूंगी अब आप एक्ट्रेसेज से उसका क्रेडिट नहीं ले सकते हैं. दीपिका , आलिया और अनुष्का ने वो रास्ता अभिनेत्रियों के लिए बना दिया है. उनकी वजह से हम नए लोगों को भी छोरी जैसी सशक्त कहानी ऑफर होती है.

कोई बॉलीवुड की फिल्म जिसने आपको डराया हो?

उर्मिला मार्तोंडकर की भूत मुझे डराती है. कौन है वो भी अच्छी थी. रेवती की फिल्म रात आज भी मुझे डराती है. सोचिये रात किस साल में बनी थी उस साल में हमने उतनी बेहतरीन हॉरर फिल्म बनायीं थी अब सोचिये हम क्या बना रहे हैं.

अक्षय कुमार के साथ आप फ़िल्म राम सेतु की शूटिंग कर रही हैं उसका अनुभव कैसा रहा है?

बहुत ही खास,अक्षय सर औऱ उनकी पूरी यूनिट सभी का बहुत खयाल रखते हैं. सेट पर यह नियम है कि लंच अभी साथ में बैठकर करेंगे. सभी के घर से टिफिन आता है और सभी लोग एक दूसरे से खाना शेयर करते हैं. अब तक ऐसा अनुभव कभी किसी सेट का नहीं था.

आपकी आनेवाली फिल्में?

जनहित में जारी के अगले शेड्यूल की शूटिंग के लिए जल्द ही भोपाल जा रही हूं. हुड़दंग शूट हो गयी है रिलीज क्यों नहीं हो रही है पता नहीं . निर्माता इसका जवाब दे पाएंगे.

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