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FILM REVIEW: बच्चों के शारीरिक शोषण के मुद्दे को सामने लाती ''हरामखोर''

Updated at : 13 Jan 2017 3:09 PM (IST)
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FILM REVIEW: बच्चों के शारीरिक शोषण के मुद्दे को सामने लाती ''हरामखोर''

II उर्मिला कोरी II फिल्म – हरामखोर निर्माता – अनुराग कश्यप और गुनीत मोंगा निर्देशक – श्लोक शर्मा कलाकार -नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ,श्वेता त्रिपाठी रेटिंग – दो श्लोक शर्मा की फिल्म ‘हरामखोर’ एक संवाद के साथ शुरू होती है कि बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में होती है वह सबसे ज़्यादा शोषित उन्ही […]

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II उर्मिला कोरी II

फिल्म – हरामखोर

निर्माता – अनुराग कश्यप और गुनीत मोंगा

निर्देशक – श्लोक शर्मा

कलाकार -नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ,श्वेता त्रिपाठी

रेटिंग – दो

श्लोक शर्मा की फिल्म ‘हरामखोर’ एक संवाद के साथ शुरू होती है कि बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में होती है वह सबसे ज़्यादा शोषित उन्ही हाथों से होते हैं. इसी संवाद में फिल्म ‘हरामखोर’ की कहानी बुनी गयी है. फिल्म का बैकड्रॉप मध्य प्रदेश के छोटे से गांव है (गाड़ियों के नंबर प्लेट से कहानी मध्यप्रदेश का होना मालूम होता है) स्कूल टीचर श्याम (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाता है. उसकी क्लास में संध्या (श्वेता त्रिपाठी) नाम की 15 वर्षीय लड़की पढ़ती है जिस पर श्याम की खास नजर है.

घर में बीवी के होने के बावजूद श्‍याम संध्या से नज़दीकियां बढ़ाता है. संध्या अकेली ह. उसकी माँ मर चुकी है पिता की काम की मशरूफियत संध्या को शाम के करीब ले जाती है. शाम सिर्फ अपनी हवस को मिटाने के लिए संध्या का इस्तेमाल कर रहा है. वहीँ संध्या के बालमन शाम से विशेष लगाव रखता है जिस वजह से वह शाम की अलग अलग तरह की ज़्यादतियों को सहती रहती है. इस कहानी के साथ साथ एक और ट्रैक है लव ट्राइंगल.

संध्या का सहपाठी कमल भी संध्या को प्यार करता है. वह अपने दोस्त मिंटू के साथ मिलकर संध्या का दिल जीतने की प्लानिंग करता रहता हैं. कमल का संध्या के प्रति प्यार कहानी को एक अलग अंत तक ले जाता है. वह अंत क्या है वह आपको फिल्म ही बताएगी.

फिल्म का विषय सामयिक है बच्चों का शारीरिक शोषण एक बहुत बड़ा मुद्दा है. जिस पर बहुत कम ही फिल्में बनती है वो भी रीयलिस्टिक अप्रोच के साथ तो और भी गिनी चुनी फिल्में याद आएगी. फिल्म अपने विषय की वजह से अपील करती हैं लेकिन फिल्म की प्रस्तुति में कमी दिखती है. कहानी में किरदारों को सही ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है।फिल्म के स्क्रीनप्ले पर और काम करने की ज़रूरत महसूस होती है. फिल्म की रफ़्तार बहुत धीमी है ,जिससे कई बार आपको फिल्म बोर करने लगती हैं. फिल्म के कई सीन शेकिंग कैमरा से शॉट किए गए हैं अगर यह प्रयोग है तो अटपटा सा लगता है.

अभिनय की बात करें तो फिल्म की कास्ट ही इस फिल्म की सबसे अच्छी बात हैं नवाज़ हमेशा की तरह इस किरदार में भी रच बस गए हैं. उनको देखकर गुस्सा भी आता है और हंसी भी. श्वेता त्रिपाठी भी अपने सहज अभिनय से प्रभावित करती हैं. फिल्म के बाल कलाकार बहुत ही सधे ढंग से अपने किरदार को सामने लाते हैं फिर चाहे वह कमल का किरदार हो या मिंटू या फिर शक्तिमान वाला बाल कलाकार.

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के अनुरूप हैं. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी कहानी के साथ पूरी तरह से न्याय करती हैं. अन्य पक्ष ठीक ठाक हैं. कुलमिलाकर कमज़ोर स्क्रीनप्ले बच्चों के शारीरिक शोषण जैसे संवेदनशील मुद्दे को प्रभावी ढंग से सामने नहीं ला पाती है.

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