इंटरनेट आनेवाले दौर में फिल्मों का भविष्य तय करेगा : मनोज बाजपेयी
मनोज बाजपेयी को इंडस्ट्री का प्रयोगधर्मी अभिनेता कहा जाता है. अलग अलग किरदार अलग अलग ढंग से करना उनकी प्राथमिकता है. अलीगढ़,ट्रैफिक के बाद वह फ़िल्म बुधि या सिंह-बोर्न टू रन के ज़रिये दर्शकों से जल्द ही रूबरू होंगे. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश * इस साल एक के बाद एक आपकी […]
मनोज बाजपेयी को इंडस्ट्री का प्रयोगधर्मी अभिनेता कहा जाता है. अलग अलग किरदार अलग अलग ढंग से करना उनकी प्राथमिकता है. अलीगढ़,ट्रैफिक के बाद वह फ़िल्म बुधि या सिंह-बोर्न टू रन के ज़रिये दर्शकों से जल्द ही रूबरू होंगे. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश
* इस साल एक के बाद एक आपकी फ़िल्म रिलीज़ हो रही है
दिल थामकर बैठिए अभी खेल बाकी है. अभी तो सिर्फ शुरुवात है. वैसे कुछ एक फिल्में पिछली साल ही रिलीज होने वाली थी. ट्रैफिक पिछले साल आने वाली थी बुधिया की रिलीज़ भी पिछले साल की ही थी. मगर बिकी अब जाकर. छोटी फिल्मों की अपनी जर्नी होती है. बनने में समय लगता है. बिकने में समय लगता है. रिलीज होने में समय लगता है. हाथों हाथ नहीं बिकती है. जैसे प्रोफीट तैयार हो जाता है. सारे शर्त्तों पर हाजिर हो जाते हैं तो फिल्म रिलीज हो जाते है. वैसे इसे मेरा भाग्य कहे या कुछ और.
इस साल रिलीज हुई मेरी फिल्मों में अंतराल रहे. जो मेरे सेहत के लिए अच्छा रहा साथ ही मैं अपनी फिल्मों के प्रमोशन को पूरा समय दे पाया हूं. इसी साल मैंने ठान लिया कि शॉर्ट फिल्में भी करूंगा. अपने मूवीज डॉट के लिए तांडव किया. जिसे लोगों ने पसंद किया. कृति ने तो सारे रिकार्ड्स ही तोड़ दिए. मेरे लिए अच्छा है कि दर्शकों के नजरों में लगातार बना हूं. शायद आने वाले साल में गैप आएगा क्योंकि इस साल ज्यादा काम नहीं किया है.
* क्या ओवर एक्सपोज़र का डर नहीं लगता है
मुझे डर नहीं लगता है अलग अलग किरदार अलग अलग ढंग से करेंगे तो ओवर एक्सपोजर का चक्कर नहीं रहेगा. हर किरदार में आप अलग दिखोगे तो दर्शक आपसे बोर नहीं होंगे. वैसे लोगों के प्रेशर को लेकर अब तक नहीं चला हूं तो अब क्या लूंगा. अभिनय मेरा प्यार है. मेरा जुनून है. जब मैं फिल्में करता हूं. अपने लिए करता हूं. रिलीज पर आए तो सोचता हूं कि यार पब्लिक इसकी तारीफ भी कर दे ताकि निर्माता भी थोड़ा कमा ले. 120 करोड़ की जनता को दिमाग में रखूंगा तो मृत्यु निश्चित है इसलिए मैं दर्शकों पर कम अपने काम पर ज़्यादा फोकस करता हूं.
* इन दिनों आप छोटी फिल्मों में ज़्यादा नज़र आ रहे हैं. छोटी फिल्मों का रिलीज होना क्या अब भी आसान है
मैं तो जाना ही जाता हूं छोटी फिल्मों के लिए. मुझे बहुत गर्व है कि मैंने छोटी फिल्में की है क्योंकि छोटी फिल्में ही बड़ी कहानी कहते हैं. छोटी फिल्मों ने मुझे इस स्थान तक पहुंचाया है. मैं आगे भी छोटी फिल्मों के ज़रिये सशक्त कहानी कहने के लिए तैयार हूं. जहाँ तक बात रिलीज़ की है तो पहले रवैया अच्छा रहा था लेकिन अब बदलाव देखने को मिल रहा है. कॉरपोरेट हाउसेज अब ज्यादा बड़ी फिल्मों की ओर जा रहे है.
शायद उन्हे लग रहा है कि छोटी फिल्मों के दर्शक कम हो गए हैं लेकिन अच्छी बात यह हुई है कि इंडीपेंडेट प्रोड्यूसर आ रहे हैं. जिन्हें मेकिंग से वितरण तक की समझ है. वैसे आनेवाले समय में कहानी कहने वाले इन छोटी फिल्मों के लिए इंटरनेट बड़ा माध्यम बनने वाला है.
* बुधिया सिंह बोर्न टू रन फ़िल्म को हाँ कहने के लिए क्या वजह थी.
बिरंची दास और बुधिया की कहानी जब सामने आई थी. उस वक़्त उस कहानी पर मेरा पूरा ध्यान था. मुझे याद है उस न्यूज को देखते हुए मैंने पाया था कि बहुत सारे न्यूज़ चैनल बिरंची दास को हीरो बता रहे तो आधे लोग विलन।कई सारी शख्सियतें उसे हीरो बना रही थी. तो कोई विलेन. ये जो चीज है जिसने मुझे फ़िल्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।मैं चाहता था कि दर्शक भी कंफ्यूज हो जाए कि वो हीरो है या विलेन. वैसे अब बिरंचि की मौत हो गयी है अब जाकर लोगों को एहसास हु्आ कि उसके अलावा और कोई था नहीं बुधिया का.
* इस फ़िल्म में आप बच्चे के साथ काम कर रहे हैं बच्चों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा
मेरे लिए यह नया नहीं था, जब दिल्ली में था. बहुत सारे बच्चों के साथ वर्कशॉप किए हैं. बच्चों के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए. मैं जानता हूं. उनके जोश और स्पॉटेनियस को मैच करना बहुत मुश्किल होता है. बच्चों के साथ काम करने के लिए आपको बच्चों का दोस्त बनना पड़ेगा उनके लिए भैय्या था अंकल था सर था. मनोज बाजपेयी स्थापित कलाकार नहीं.
* इस फ़िल्म के निर्देशक सोमेंद्र नवोदित हैं,नये निर्देशकों के साथ काम करने का अनुभव कैसा होता है
जो नये निर्देशक आ रहे हैं. वो नए तरीके की फिल्में लेकर आ रहे हैं. हमारे समाज की कहानी को नए ढंग से कहना चाहते हैं. पढ़ाई लिखाई एक्सपोजर मुझसे ज्यादा है. ऐसे में उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है. मैं सीनियर हूं तो पोलाइटली काम करवा लेते है. राय सुनते हैं लेकिन जो चाहिए वही लेते हैं.
* एक एक्टर के तौर पर खुद में निखार लाने के लिए आप क्या करते हैं
दुनिया भर का सिनेमा देखता हूं. अलग अलग लोगों की फिल्में देखता हूं. नए नए एक्टर्स से मिलता जुलता है. आज भी जो है अपने परिवार के साथ लोखंडवाला मार्केट जाता हूं इसलिए की आम आदमियों से जुड़ा रहूं. थिएटर और फिल्मों के अलावा आम आदमियों को देखकर ही सब सीखा है.
* अभिनय अब बहुत बदल गया इन दिनों बहुत रीयलिस्टिक हो गया है
यह अभी नहीं बहुत पहले से ही चेंज हुई है. बैंडिट क्वीन से ही चेंज हुई है. इसका श्रेय एक्टर्स को नहीं निर्देशक को जाता हूं. नये नये निर्देशक जैसेअनुराग और दिबाकर ने बदला. अच्छी बात यह है कि उस वक़्त हम भी आ गए थे. जो कुछ नया करना चाहते थे. इरफान ,नवाज ,केके हो. नीरज कबी, विक्की कौशल ये सब अच्छे एक्टर्स इसका आगे का हिस्सा बने. ऐसे एक्टर्स जितने आएंगे उतना हीअच्छा है. पंकज त्रिपाठी और विजय राज भी बहुत अच्छे एक्टर्स हैं भले ही उनकी चर्चा कम होती है।
* क्या आपको लगता है कि आपका संघर्ष खत्म हुआ है
नहीं, अभी भी स्ट्रगल करता हूं. अंतर ये है कि उस समय ज़्यादा था अब कम करता हूं. पहले मेरी तरह की फिल्में कम बनती थी अब ज्यादा बनती है. अब ऑफर बहुत सारे हैं. इज्ज्त बढ़ी है. थोड़ी आसान हो जाती है जिंदगी जब आपने ज्यादा जी ली होती है. चीज़ें समझ आने लगती है. कैमरे को फेश करते हुए जो पहले दिन आक्रोश था वह अब भी बरकरार है. जिस दिन वो खत्म होगा. अभिनय मर जाएगा.
* राजनीती और स्पेशल छब्बीस जैसी बड़ी फिल्मों का क्या आप भविष्य में हिस्सा बनने वाले हैं
बड़ी फिल्में मेरे पास ज्यादा आती नहीं है. एक समय आया था. जब ऐसी भगवान ने प्रकाश झा को सद्बुद्धि दी थी उन्होंने एक नहीं लगातार दो फिल्में मुझे ऑफर की. राजनीती और आरक्षण।नीरज को स्पेशल छब्बीस जैसी स्क्रिप्ट फिर मिले जिससे मुझे वह चुन सके.
हमको मेनस्ट्रीम में तभी काम मिलते हैं. जब रोल अच्छा है लेकिन कोई स्टार नहीं करता है. ऐसे में निर्देशक को हमारे पास आना पड़ता है. ऐसी फिल्मों से हम तभी जुड़ते हैं. जब पैसा मिलता है. दर्जा मिलता है. इसमे से एक भी कम मिलता है तो फ़िल्म नहीं करता हूं. मैंने अक्सर देखा है कि बड़ी फ़िल्म वाले चाहते है कि जो छोटी फ़िल्म के लिए मैं मेहनताना लेता हूँ वही मेहनताना बड़ी फ़िल्म के लिए भी लूं.
* इन दिनों हॉलीवुड फिल्में हिंदी फिल्मों के लिए चुनौती बनती जा रही है
हां बहुत ज्यादा दे रहा है हम अमेरिकन स्टूडियो से बड़ी फिल्म नहीं बना सकते हैं क्योंकि उनकी फिल्मों का बजट हमसे कई गुना है. उसके दर्शक हमसे कई गुना है. पूरे विश्व में है. हमारे दर्शक सिर्फ हिंदी और उर्दू बोलने वाले हैं. हम तभी टिके रह पाएंगे अगर हम अपनी कहानी कहेंगे वो भी अपने अंदाज़ में. उनके अंदाज़ में उनकी कहानी कहेंगे तो टिक नहीं पाएंगे. उनका बजट हमसे दस गुना है.
* इनदिनों आप शार्ट फिल्मों में काफी नजर आ रहे हैं.
हां इंटरनेट के माध्यम से फ़िल्म देखने के लिए मैं लोगों को प्रेरित करना चाहता हूं और शार्ट फिल्मों से बेहतर और क्या हो सकता है. मुझे लगता है कि एक बार आदत पड़ जायेगी तो जब हमारी फिल्में थिएटर में रिलीज़ होंगी तो लोग सब्सक्राइब करके देखेंगे.
हम जो सौ दौ करोड़ कमाकर नाचने लगते हैं इंटरनेट में वह कूवत है कि हमारी फिल्में कम से कम आठ सौ करोड़ कमा सकती है. वैसे भी अब थिएटर कम हो रहे हैं. मैं हाल ही में मुज़्ज़फ़रपुर गया था. जिन थिएटरों में फिल्में देखकर मैं बड़ा हुआ. अब वो सारे थिएटर बंद हो गए हैं ऐसे में इंटरनेट ही ऐसा माध्यम है जिससे हम ज़्यादा से ज़्यादा दर्शकों को फिल्मों से जोड़ सकते हैं. इंटरनेट आने वाले दौर में फिल्मों का भविष्य तय करेगा.
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