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फिल्म रिव्यू : ''हमारी अधूरी कहानी'' की ''अधूरी प्रेम कहानी''

Updated at : 12 Jun 2015 4:20 PM (IST)
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फिल्म रिव्यू : ''हमारी अधूरी कहानी'' की ''अधूरी प्रेम कहानी''

II अनुप्रिया अनंत II कलाकार : विद्या बालन, राजकुमार राव, इमरान हाशमी निर्देशक : मोहित सूरी रेटिंग : 2 स्टार मोहित सूरी की अधिकतर प्रेम कहानियां अधूरी ही रही हैं. हालांकि मोहित सूरी ने पहले भी कई फिल्में निर्देशित की हैं. लेकिन फिल्म आशिकी 2 से उन्होंने इन अधूरी प्रेम कहानियों का सफर शुरू किया […]

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II अनुप्रिया अनंत II

कलाकार : विद्या बालन, राजकुमार राव, इमरान हाशमी

निर्देशक : मोहित सूरी

रेटिंग : 2 स्टार

मोहित सूरी की अधिकतर प्रेम कहानियां अधूरी ही रही हैं. हालांकि मोहित सूरी ने पहले भी कई फिल्में निर्देशित की हैं. लेकिन फिल्म आशिकी 2 से उन्होंने इन अधूरी प्रेम कहानियों का सफर शुरू किया था. फिल्मों के नाम भले ही एक विलेन और आशिकी 2 रहे हों. लेकिन उनमें भी नायक नायिका एक दूसरे से मिल नहीं पाते. सो, कहा जा सकता है कि मोहित सूरी अधूरी प्रेम कहानियां दर्शाने में माहिर हो गये हैं या फिर शायद उन्होंने इसे अपना क्षेत्र मान लिया है.

हमारी अधूरी कहानी में तो चूंकि उन्होंने नाम में ही अधूरे शब्द का इस्तेमाल कर लिया है तो जाहिर है कि फिल्म में प्रेम कहानी अधूरी ही रही होगी. मोहित सूरी की यह फिल्म जिसका लेखन महेश भट्ट ने किया है. काफी उम्मीदें थीं कि उम्दा लेखन के साथ एक बेहतरीन कहानी देखने को मिलेगी. चूंकि कलाकारों में विद्या बालन का नाम जुड़ा है. लेकिन अफसोस इस बात की है कि फिल्म किसी भी लिहाज से दिल को नहीं छूती.

फिल्म के किसी किरदार से वह हमदर्दी या प्रेम नहीं हो पाता. हम उनके दुख से दुखी नहीं हो पाते. वसुधा हरि के साथ अपनी जबरदस्ती की शादी निभा रही है. हरि उस समाज का पुरुष है, जहां एक पति किसी को पत्‍नी नहीं बल्कि बंधक बना कर लाता है. वसुधा के हाथों पर हरि नाम गुदवा कर हरि सिर्फ यह साबित करना चाहता है कि वसुधा उसकी बंधक है. हरि वसुधा की जिंदगी में होकर भी नहीं है. शादी के एक साल के बाद ही वह वसुधा को छोड़ कर चला जाता है.

वसुधा अपने बच्चे सांझ को अपने पिता के बारे में कुछ इसलिए नहीं बताती कि बेटे का पिता से विश्वास न उठे. अचानक वसुधा की जिंदगी में तूफान आता है. लेकिन उस दौरान आरब रुपरैल उसे संभालता है. आरब का बचपन ठीक वैसा ही बीता है, जो सांझ का बचपन है. और वह वसुधा से प्यार कर बैठता है. एक शादीशुदा औरत किसी गैर मर्द से प्यार कैसे कर सकती है? यह तो पाप है. कुछ ऐसी ही झंझावातों से वसुधा गुजरती है. वह चाह कर भी आरव को पूरी तरह स्वीकार नहीं पाती.

लेकिन ये प्रेम कहानी पूरी न होकर भी पूरी होती है. फिल्म का थीम बेहतरीन था. लेकिन जिस तरह फिल्म के संवादों लिखे गये हैं. यह महसूस होता है कि हम किसी पुराने दौर की फिल्म देख रहे. हम वसुधा के साथ कनेक्ट नहीं कर पाते. वजह यह है कि वसुधा आम होकर भी संवाद फिल्मी बोलती है. कहानी एक लय के साथ नहीं. कहीं भी कुछ भी हो रहा होता है. विद्या बालन जैसी अभिनेत्री होने के बावजूद हम उनका शक्तिशाली रूप नहीं देख पाते. उनके संवाद हमें दिल से नहीं भिगोते. उनका दर्द हमें हरि के लिए गुस्सा नहीं उगलने देता.

इससे स्पष्ट है कि विद्या बालन जैसी अभिनेत्री होने के बावजूद हम खुद को कहानी में सम्मिलित नहीं कर पाते. महेश भट्ट व शुगफ्ता ने जब साथ कमान संभाली है तो उम्मीद कर सकते थे कि बेहतरीन संवाद होंगे. ऐसी फिल्मों में पूरी गुंजाईश भी होती है. लेकिन वह असर नहीं हो पाता. इस लिहाज से यह कमजोर फिल्म है. फिल्म में तमाम अच्छे कलाकारों के बावजूद, सोच के बावजूद फिल्म आपके दिल में नहीं उतरती.

जबकि जैसी दर्द भरी कहानी कही गयी है. यह यादगार रखने वाली लव स्टोरीज में से एक हो सकती थी. इमरान हाशमी को उनका पसंदीदा किरदार मिला था. लेकिन कमी उनके परफॉरमेंस में नहीं. कहानी में रही. राजकुमार राव एक रुढ़िवादी पति के रूप में बेहतरीन परफॉर्म कर पाये हैं. फिल्म के कुछ दृश्य आप टुकड़ों में अच्छे लगते हैं.

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