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पुण्‍यतिथि: किरदार में पूरी तरह डूब जाना बलराज साहनी की खूबी थी

Updated at : 13 Apr 2019 9:43 AM (IST)
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पुण्‍यतिथि: किरदार में पूरी तरह डूब जाना बलराज साहनी की खूबी थी

अपने दौर के बेहद प्रतिभाशाली और प्रतिष्ठित अभिनेता बलराज साहनी की आज पुण्यतिथि है. वे न सिर्फ अपनी फ़िल्मों के लिए बल्कि सामाजिक सरोकारों के लिए भी याद किये जाते हैं. उनका जन्म 1 मई 1913 में ब्रिटिश इंडिया के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी में हुआ था. उन्‍होंने इंग्लिश लिट्रेचर में मास्‍टर डिग्री लाहौर यूनिवर्सिटी […]

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अपने दौर के बेहद प्रतिभाशाली और प्रतिष्ठित अभिनेता बलराज साहनी की आज पुण्यतिथि है. वे न सिर्फ अपनी फ़िल्मों के लिए बल्कि सामाजिक सरोकारों के लिए भी याद किये जाते हैं. उनका जन्म 1 मई 1913 में ब्रिटिश इंडिया के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी में हुआ था. उन्‍होंने इंग्लिश लिट्रेचर में मास्‍टर डिग्री लाहौर यूनिवर्सिटी हासिल की थी. इसके बाद वे अपने परिवार के व्‍यापार को संभालने के लिये रावलपिंडी आ गये. 1938 में उन्‍होंने महात्‍मा गांधी के साथ मिलकर काम किया. इसके बाद वे बीबीसी लंदन हिंदी को ज्‍वाइन करने इंग्‍लैंड चले गये.

अभिनय की शुरुआत

बलराज साहनी को शुरूआत से ही एक्टिंग का काफी शौक था. अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत इंडियन पीपुल थियेटर के साथ की. 1946 में रिलीज हुई ‘इंसाफ’ के साथ उन्‍होंने बॉलीवुड पारी की शुरुआत की. इसके बाद उन्‍होंने इसी साल ‘धरती के लाल’ और ‘दूर चलें’ जैसी फिल्‍मों में काम किया. साल 1953 में आई उनकी फिल्‍म दो बीघा जमीन के लिए वे आज भी याद किये जाते हैं. इस फिल्‍म ने कांस फिल्‍म फेस्टिवल में अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीता. साल 1961 में उन्‍होंने फिल्‍म ‘काबुलीवाला’ में काम किया जिसकी छाप अमिट है.

किरदार को जीवंत बनाने के लिए गये जेल

अपने किरदारों को जीवंत बनाने के लिए बलराज साहनी उस किरदार को असल में जीते थे. दिलीप कुमार के कहने पर के. आसिफ ने बलराज को फिल्‍म ‘हलचल’ में एक जेलर का रोल दिया. के. आसिफ इस रोल को जीवंत बनाना चाहते थे इसलिए वे कुछ नेताओं और जेल प्रशासन के अधिकारियों से मिले. बलराज साहनी भी चाहते थे कि उनका किरदार कहीं भी चूके न. इसलिए वे उत्‍साहित होकी आर्थर जेल रोड पहुंचे और कैदियों के रहन-सहन के बारे में जाना. बात 1949 की है.

जब सच में जाना पड़ा जेल…

1949 में बलराज साहनी बलवंत गार्गी के लिखे नाटक ‘सिग्नलमैन’ की तैयारी में जुटे थे. रिहर्सल के दौरान जब उन्‍हें खबर मिली कि परेल से कम्युनिस्ट पार्टी का जुलूस निकलने वाला है. वामपंथी विचारधारा के समर्थक बलराज साहनी अपनी पत्‍नी के साथ उस जुलूस में शामिल हो गये. लेकिन इसी बीच हिंसा शुरू हो गई. कई लोगों के साथ बलराज साहनी भी गिरफ्तार हो गये. उन्‍हें बरेली के जेल भेज दिया गया. दो महीन के बाद उन्‍हें आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. एक दिन जेलर ने उन्‍हें बुलाकर कहा कि उन्‍हें कहीं देखा है. उस समय वहां के. आसिफ भी बैठे थे. के. आसिफ के कहने पर जेलर ने उन्‍हें जेल में रहकर शूटिंग करने की इजाजत दे दी. वो सुबह शूटिंग पर जाते और शाम को लौट आते. करीब 3 महीने तक जेल में रहकर ही उन्‍होंने ‘हलचल’ फिल्‍म की शूटिंग की.

लेखन का शौक

बलराज साहनी को लेखन का भी शौक था. उन्‍होंने हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी में भी काफी कुछ लिखा. साल 1960 में पाकिस्‍तान दौरे के बाद उन्‍होंने ‘मेरा पाकिस्‍तानी सफर’ नामक एक किताब भी लिखी. उन्‍होंने कई देशों की यात्रायें की और किताब भी लिखी. बलराज साहनी के छोटे भाई भीष्‍म साहनी हिंदी के एक जानेमाने लेखक हैं.

चर्चित फिल्‍म

दरअसल किरदारों में पूरी तरह डूब जाना बलराज साहनी की खूबी थी. उनकी चर्चित फिल्‍मों में ‘दो बीघा जमीन’, ‘गर्म हवा’, ‘काबुली वाला’, ‘लाजवंती’, ‘हकीकत’, ‘धरती के लाल’, ‘वक़्त’ और ‘दो रास्ते’ शामिल है.

13 अप्रैल 1973 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था.

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