पुण्यतिथि : इस वजह से दादा साहब फाल्के पुरस्कार लेने से सुचित्रा सेन ने कर दिया था मना, जानें ये खास बातें
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 Jan 2019 8:42 AM
सुचित्रा सेन भारतीय सिनेमा की एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनका ग्लैमर देश तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि विदेशों में भी उन्हें प्रसिद्धि मिली. हालांकि बाद में उन्होंने खुद को अपने घर तक ही सीमित कर लिया और वे पूरी दुनिया से कट गयी थीं. उन्होंने खुद को इतना सीमित कर लिया था कि दादा […]
सुचित्रा सेन भारतीय सिनेमा की एक ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनका ग्लैमर देश तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि विदेशों में भी उन्हें प्रसिद्धि मिली. हालांकि बाद में उन्होंने खुद को अपने घर तक ही सीमित कर लिया और वे पूरी दुनिया से कट गयी थीं. उन्होंने खुद को इतना सीमित कर लिया था कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी लेने से मना कर दिया क्योंकि इसके लिए उन्हें घर से बाहर निकलना पड़ता.
बॉलवुड की अपूर्व सुंदरी जब अपने कैरियर के चरम पर थीं और बाद में जब वे बॉलीवुड से अलग हुईं, उनके इस दोनों जीवन में काफी अंतर है और एक रहस्य सा है कि आखिर सुचित्रा सेन इतनी अलग-थलग क्यों हो गयीं.
मास्को फिल्म फेस्टिवल में मिला था सम्मान
सुचित्रा सेन भारत की पहली अभिनेत्री थीं, जिन्हें विदेश में सम्मान मिला था. उन्हें 1963 में मास्को फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया था. सुचित्रा सेन हिंदी और बांग्ला फिल्मों की शीर्ष अभिनेत्री थीं. उनका जन्म वर्तमान बांग्लादेश के सिराजगंज में हुआ था. उनका असली नाम रोमा दासगुप्ता था.
उत्तर कुमार के साथ था अनूठा प्रेम संबंध
सुचित्रा सेन की पहली मूवी ‘साढ़े चौहत्तुर’ थी जिसमें उनके अपोजिट उत्तम कुमार ने काम किया था. हालांकि इससे पहले 1952 में उन्होंने ‘शेष कोथाय’ की थी, जो कभी रिलीज नहीं हुई. उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी बांग्ला फिल्मों में सबसे चर्चित जोड़ी थी. हालांकि इन्होंने आजीवन यह कहा कि उनका रिश्ता मात्र सहकर्मियों जैसा है, लेकिन जानकार कहते हैं कि इनके बीच आध्यात्मिक प्रेम था, जिसे दोनों ने विवाहित होते हुए निभाया. जब सुचित्रा गुमनामी का जीवन जी रही थीं, 1980 में उत्तम कुमार की मौत के बाद वह बाहर आयीं थीं और उनके शव के पास चुपचाप खड़ी देखीं गयीं थी. हालांकि वे वहां से उतनी ही खामोशी से वापस भी चली गयीं थीं.
ग्लैमर की दुनिया से निकलकर आध्यात्मिक जीवन को अपनाया
सुचित्रा सेन के बारे में कहा जाता है कि ‘प्रणय पाश‘(1978) की असफलता के बाद उन्होंने खुद को ग्लैमर की दुनिया से अलग कर लिया और पूजा-प्रार्थना में व्यस्त रहने लगीं और खुद को दुनिया से पूरी तरह अलग कर लिया. वर्ष 2013 में उनका निधन हुआ. उस वक्त भी उनकी के अनुसार उनके शव का अंतिम संस्कार निजी तरीके से हुआ.
ब्यूटी विद ब्रेन थीं सुचित्रा सेन
सुचित्रा सेन ने दिलीप कुमार के साथ ‘देवदास’ फिल्म की थी जिसमें उन्होंने पारो का किरदार निभाया था. दिलीप कुमार का कहना था कि वे ब्यूटी विद ब्रेन थीं. सुचित्रा की खूबसूरती इस कदर थी कि उन्हें कैमरामैन हमेशा क्लोजअप शूट करना चाहते थे. उनकी बेटी मुनमुन सेन का कहना कि मेरी मां जितना पर्दे पर ग्लमैरस थीं उतना ही निजी जीवन में भी थीं. वे हमेशा पार्टी करतीं थी और बेहद खूबसूरत और बोल्ड थीं. उनकी चर्चित फिल्मों में आंधी, देवदास, बंबई का बाबू,सप्तपदी, साढ़े चौहत्तुर, ममता और बिपाशा शामिल हैं.
सुचित्रा सेन की यादगार फिल्में
‘देवदास’ (1955) उनकी पहली हिंदी फिल्म थी और ‘आंधी’ (1975) अंतिम. ‘देवदास’ (1957) , ‘मुसाफिर’(1957), ‘चंपाकली’ (1957), ‘बंबई का बाबू’ (1960), सरहद (1960) , ‘ममता’ (1966) उनकी यादगार फिल्में है. उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी एक जमाने में बांग्ला सिनेमा की सबसे लुभावनी जोड़ी थी. इस जोड़ी ने ‘शाप मोचन’, ‘अग्निपरीक्षा’, ‘इंद्राणी’, ‘सप्तपदी’ जैसी यादगार फ़िल्मों में काम किया. साल 1953 से 1978 के बीच सुचित्रा ने हिंदी और बंगला मिला कर 61 फ़िल्में की. इनमें से 20 से ज्यादा फ़िल्में ब्लॉकबस्टर रहीं और एक दर्जन से ज्यादा फ़िल्में सुपरहिट रहीं.
कह गई अलविदा
सुचित्रा सेन को 24 दिसंबर 2013 को फेफड़ों के संक्रमण के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था. जनवरी महीने में वे कुछ हम तक ठीक हो गई थी. लेकिन 17 जनवरी को हार्ट अटैक की वजह से उनकी मौत हो गई. सुचित्रा सेन की मौत से हिंदी और बंगला सिनेमा को गहरा धक्का लगा. उस समय देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह सहित देश के दिग्ग्ज नेताओं ने उनकी मौत पर गहरा दुख प्रकट किया था. अंतिम संस्कार के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उपस्थिति में उन्हें बंदूकों की सलामी दी गई.
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