क्यों आयी मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच दरार

Updated at : 15 Jun 2014 1:23 PM (IST)
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क्यों आयी मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच दरार

नयी दिल्ली:दिलीप कुमार और मधुबाला का रिश्ता शादी की गांठ से बंधा होता अगर मधुबाला के पिता इस बंधन के साथ व्यापारिक संबंधों को बढाने के बारे में नहीं सोचते ऐसा करना अभिनेता दिलीप कुमार के लिए न तो अच्छा ही होता और न ही उन्हें ये गवारा था कि कोई और उनके उभरते करियर […]

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नयी दिल्ली:दिलीप कुमार और मधुबाला का रिश्ता शादी की गांठ से बंधा होता अगर मधुबाला के पिता इस बंधन के साथ व्यापारिक संबंधों को बढाने के बारे में नहीं सोचते ऐसा करना अभिनेता दिलीप कुमार के लिए न तो अच्छा ही होता और न ही उन्हें ये गवारा था कि कोई और उनके उभरते करियर की दिशा को निर्धारित करे.

हाल ही में जारी अपनी आत्मकथा दिलीप कुमार ‘द सबस्टेंस एंड द शैडो’ में 91 वर्षीय दिलीप ने अपने और मधुबाला के रिश्ते के बारे में ये बातें साझा की हैं जो आज भी सिनेमा के प्रशंसकांे को रोमांचित करती हैं. 1951 में मधुबाला के साथ ‘तराना’ में काम करने वाले भारतीय चित्रपट के मुख्य स्तंभों में से एक दिलीप उनके बारे में यादें बांटते हुए उन्हें एक अच्छा कलाकार होने के साथ ही एक ‘‘बेहद जिंदादिल और जीवटता से भरपूर’’ इंसान बताते हैं.

हे हाउस द्वारा प्रकाशित अपनी किताब में उन्होंने लिखा, ‘‘मैं यह स्वीकार करता हूं कि मैं मधुबाला के साथी कलाकार और अच्छे इंसान दोनों रुपों के प्रति आकर्षण में बंधा था. उसमें वे सभी गुण मौजूद थे जिसकी एक औरत में मैं उस समय होने की आशा रखता था. जैसा कि मैंने पहले कहा कि वो बहुत जिंदादिल और जीवंत थी जिसने मेरे शर्मीलेपन और संकोच को बिना किसी प्रयास के दूर किया.’’ के. आसिफ की ‘मुगल ए आजम’ में उनकी जोडी ने खूब सुर्खियां बटोरी थी क्योंकि उनके भावनात्मक लगाव की अफवाहें जोरों पर थीं. इससे निर्देशक आसिफ बहुत खुश थे. मधुबाला ने आसिफ के सामने दिलीप के प्रति अपने लगाव के रहस्य को भी जाहिर किया था और आसिफ उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करते थे.

लेकिन लंबे चले फिल्म निर्माण के दौरान दोनों के रिश्ते में खटास आ गई. कुमार ने याद करते हुए लिखा, ‘‘मैंने महसूस किया कि जब हमारे रिश्ते में खटास आनी शुरु हुई तब आसिफ काफी गंभीरता से हमारे संबंधों को सुधारने के लिए प्रयास कर रहे थे और वे उसके :मधुबाला: पक्ष में परिस्थितियों का निर्माण कर रहे थे लेकिन भला हो मधुबाला के पिता का जो हमारी होने वाली शादी को एक व्यापारिक गठजोड बनाना चाहते थे.’’ फिल्म की शूटिंग के दौरान उनका रिश्ता बहुत खराब स्थिति में पहुंच गया था. दिलीप जाहिर करते हैं कि जिस समय मुगल ए आजम का पंख वाला मशहूर दृश्य फिल्माया जा रहा था जिसे हिंदी चित्रपट के सबसे रुमानी दृश्यों में शामिल किया जाता है, उस समय तक उन दोनों में बातचीत भी बंद हो चुकी थी.

दिलीप लिखते हैं, ‘‘रिश्ते में खटास के नतीजतन मुगल ए आजम के लगभग आधे निर्माण के बाद से हम आपस में बात भी नहीं कर रहे थे. पंख वाले कालजयी दृश्य की शूटिंग के दौरान जिसमें हम दोनों के होठों के बीच सिर्फ वह पंख ही होता है, हमारे बीच बातचीत बंद थी थी यहां तक कि हम एक दूसरे से दुआ सलाम भी नहीं करते थे.’’ दिलीप कहते हैं कि वह दृश्य वास्तव में दो ‘‘कलाकारों के पेशेवर अंदाज और कला के प्रति समर्पण’’ का प्रतीक है जिसमें दोनों ने अपने निजी विरोधों को दूर रखते हुए फिल्म के निर्देशक के स्वप्न को साकार किया.

मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान की अपनी फिल्म निर्माण कंपनी थी और वे इकलौते ऐसे इंसान थे जिन्हें दोनों फिल्मी सितारों को एक ही छत के नीचे देखने पर सबसे ज्यादा खुशी होती. मधुबाला को लगता था कि एक बार शादी होने के बाद परिस्थितियां सुधर जाएंगी और अंतर्विरोध दूर हो जाएंगे लेकिन दिलीप अपने भविष्य को किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति के हाथ में नहीं सौंपना चाहते थे जो उनके करियर से जुडे फैसले ले और उनके लिए रणनीति बनाए.दिलीप कुमार को महसूस हो रहा था कि वे एक ऐसे रिश्ते में बंधते जा रहे हैं जो कि उनके लिए हितकारी नहीं होगा. इसलिए उन्होंने शादी का विचार त्याग दिया और दोनों को दुबारा सोचने का अवसर देने का मन बनाया.

दिलीप कुमार कहते हैं कि उन्होंने मधु और उनके पिता से इस विषय में कई मर्तबा साफ दिली से बात की लेकिन वास्तव में वे उनकी दुविधा को समझने के लिए तैयार ही नहीं थे जिससे संभावनाएं बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होती जा रही थीं और अंतत: उनके रिश्ते का एक दुखद अंत हुआ. अपनी किताब में दिलीप ने कामिनी कौशल के साथ उनकी नजदीकियों का भी जिक्र किया है. कामिनी कौशल का असल नाम उमा कश्यप था और उस समय वे शादीशुदा थीं. दिलीप और कामिनी ने ‘शहीद’, ‘नदिया के पार’ और ‘शबनम’ में साथ काम किया था.

दिलीप यादें साझा करते हुए बताते हैं, ‘‘स्टारडम ने मुङो सुख देने से ज्यादा दु:ख ही दिया. उमा के साथ लंबे समय तक मेरा जुडाव भावनात्मक से ज्यादा बौद्धिक रहा. उसके साथ मैं अपने कामकाजी रिश्तों की सीमा से परे जाकर अपने पसंद के मुद्दों और विषयों पर बातचीत कर सकता था. अगर यह प्यार का ही रुप था तो हो सकता है कि ये प्यार ही हो. मैं नहीं जानता लेकिन अब यह बहुत महत्व नही रखता.’’

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