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बिहार मेरी अपनी जगह है तो किरदार और कहानी से कनेक्शन जुड़ ही जाता है- देवांशु सिंह

By उर्मिला कोरी
Updated Date
Devanshu Singh
Devanshu Singh
prabhat khabar

ओटीटी प्लेटफार्म ज़ी फाइव पर फ़िल्म 14 फेरे जल्द ही दस्तक देने वाली है. विक्रांत मैस्सी और कृति खरबंदा स्टारर इस फ़िल्म के निर्देशक देवांशु सिंह हैं. बिहार के मुंगेर के रहने वाले देवांशु की पिछली फिल्म चिंटू का बर्थडे काफी सराही गयी थी. उनकी आगामी फ़िल्म 14 फेरे और उससे जुड़े पहलुओं पर उर्मिला कोरी की हुई बातचीत...

अब तक ट्रेलर का आपको किस तरह से रिस्पांस मिला है

बहुत ही बढ़िया. फ़िल्म में और भी बहुत कुछ है जिसे ट्रेलर पूरी तरह से बयां नहीं कर पाया है. ट्रेलर से ही लोग इतने उत्साहित हैं तो फ़िल्म देखेंगे तो उन्हें बहुत पसंद आएगा.

शादी पर इससे पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं 14 फेरे में क्या अलग होने वाला है

हमारी फ़िल्म शादी की फ़िल्म नहीं है बल्कि शादी के बारे में है. हर घर की शादी में अलग कहानियां होती हैं. हर घर की कहानी, मसले और किरदारों पर आप फ़िल्म बना सकते हैं. ओल्ड स्कूल जो फैमिली एंटरटेनर हुआ करता था. जैसे गोलमाल,चुपके चुपके , हम आपके हैं कौन. मैं इन्ही फिल्मों को देखकर बड़ा हुआ हूं. ऋषिकेष मुखर्जी और सूरज बड़जात्या की फिल्मों को. मैंने बस 14 फेरे में इनदोनों की दुनिया को जोड़ दिया है. मुझे उम्मीद है कि मेरी फिल्म लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर जाएगी.

आपकी पिछली फिल्मों को देखें निर्देशक या लेखक के तौर पर उड़ान या फिर चिंटू का बर्थ डे आपने हल्के फुल्के अंदाज़ ने गंभीर मुद्दों को छुआ है क्या 14 फेरे में जातिवाद पर कटाक्ष है

जातिवाद एक बहुत बड़ा मुद्दा है. मैं और मेरी फिल्म बहुत छोटी है इस विषय के साथ न्याय करने के लिए. मैं दावा नहीं करता कि मैं फिल्मकार के तौर पर दुनिया को बदल दूंगा क्योंकि मैं इस सोच के साथ आया भी नहीं था. मेरी फिल्म दिखा रही है कि जो समस्या है वो रहेगी लेकिन आज की तारीख में क्या उसको फॉलो करना ज़रूरी है या उसको हटाकर आप अपनी ज़िंदगी को खुशहाल तरीके से जी सकते हो. अगर चाहते तो मेरे फ़िल्म के लीड किरदार भागकर शादी कर लेते लेकिन वो भागते नहीं है क्योंकि उन्हें पता है कि जातिवाद से बड़ा परिवार होता है. परिवार के लिए लोग जान देना और तकलीफें झेलना चाहेंगे. वही संजय और अदिति फ़िल्म में कर रहे हैं. हमारे समाज में कुछ नियम इतने पुराने हैं कि उनपर चलना नहीं चाहिए. बस यही याद दिलाना है लोगों। बिना किसी को आहत किए हुए. मैंने ऐसे परिवार देखें हैं जहां दूसरे धर्म और जाति के लोगों के बीच शादी हुई है और उनकी शादी बहुत हैप्पी वाली रही है दिल जुड़े परिवार जुड़े धर्म और जाति भले ना जुड़े.

पेंडेमिक में शादी की कहानी वाली इस फ़िल्म की शूटिंग कितनी मुश्किल थी

आपके चेहरे पर मास्क है और आपको एक्टर को समझाना है. यह आसान नहीं होता है. शादी की फिल्म थी. भीड़ चाहिए था. एक स्केल पर फ़िल्म को ले जाना चाहता था लेकिन नहीं हो पाया. लॉक डाउन नहीं होता तो मैं हज़ार लोगों का क्राउड लेकर शूट करता था.

फ़िल्म की ओटीटी रिलीज से संतुष्ट हैं आपकी पिछली फिल्म चिंटू का बर्थडे भी ओटीटी पर रिलीज हुई थी

मैंने जो फ़िल्म बनायी थी चिंटू का बर्थडे वो 2007 में लिखी थी।. उस वक़्त तो ओटीटी का नामोंनिशान नहीं था तो हम कभी ओटीटी सोचकर फ़िल्म नहीं बनाते हैं. सबकुछ बड़ा सोचकर बनाते हैं. डॉल्बी में आप बनाते हैं लेकिन जब वह चैनल में स्टीरियो पर प्ले होती है तो आपको फ़िल्मकार के तौर पर मज़ा नहीं आता है. हर फिल्म की अलग तासीर होती है. 14 फेरे में 7 गाने हैं. बैकग्राउंड स्कोर भी हाइ है. इसी चीज़ को आप थिएटर में सुनते और आवाज़ गूंजती तो अलग ही मज़ा आता था और सबसे अहम 14 फेरे पारिवारिक फ़िल्म है तो थिएटर में परिवार के साथ देखने का बहुत मजेदार अनुभव होता था. ओटीटी रिलीज के फायदे भी हैं।मैं बॉक्स ऑफिस का प्रेशर नहीं महसूस कर रहा हूं. वैसे ओटीटी रिलीज अभी यह न्यू नार्मल है तो हम क्या ही कर सकते हैं.

हसीन दिलरुबा के निर्देशक विनिल का कहना है कि अगर उन्हें पता होती कि उनकी फिल्म ओटीटी पर रिलीज होगी तो वे उसे अलग तरह से शूट करते थे आप भी फिलहाल इस सोच से गुज़र रहे हैं क्या

नहीं, विनिल सर के साथ मैंने काम किया है. उनकी फिल्मों के लिए कास्टिंग की है. वो बहुत ही सीनियर टेक्निशियन हैं. उनको पता है कि वो क्या कह रहे हैं. मैं बस अपनी बात कह सकता हूं. विजुवली तौर पर मैं थिएटर और ओटीटी दोनों के लिए सामान तौर पर ही शूट करता था. हां फ़िल्म के म्यूजिक को मैं अलग तरह से ट्रीट करता था.

फ़िल्म की कास्टिंग की बात करें तो क्या ए लिस्ट के कमर्शियल एक्टर आपकी विशलिस्ट में थे

हर किसी को बड़े से बड़ा एक्टर चाहिए लेकिन मुझे हकीकत पता थी कि बड़ा एक्टर मेरे साथ काम करने से रहा. मैं खुश हूं कि मेरी फिल्म को विक्रांत मिले. उनको स्क्रिप्ट पसंद आती है तो फिर वो अपने आपको पूरी तरह से समर्पित कर देते हैं. विक्रांत,कृति और मेरे हम तीनों के लिए यह फ़िल्म एक सामान महत्वपूर्ण थी क्योंकि हम सभी अपने कैरियर में और ज़्यादा बड़ा होना चाहते हैं.

आपकी पिछली फिल्म में चिंटू का बर्थडे में बगदाद में बिहारी परिवार को दिखाया गया था 14 फेरे में विक्रांत का किरदार भोजपुरी अंदाज़ में हिंदी बोल रहा है क्या इस फ़िल्म में भी बिहारी कनेक्शन है

मैं बिहार से हूं. आप वही कहानी कहना चाहते हैं जिससे आप ताल्लुक रखते हैं. इस फ़िल्म बिहार के जहानाबाद का जिक्र है उस जगह सबसे ज़्यादा कास्ट को लेकर परेशानी होती है. बहुत ही अलग तरह से फ़िल्म में जोड़ा गया है. विक्रांत का किरदार बिहार के गांव से ही है. अगर किसी दूसरे शहर के बाशिन्दे की कहानी कहनी होती तो शायद मैं उतने अच्छे ना कह पाऊं। बिहार से हूं तो वहां का ह्यूमर समझता हूं. वहां का कल्चर समझता हूँ. एक आत्मविश्वास भी होता है कि आप कुछ स्पेशल कर सकते हैं. जैसे सूरज बड़जात्या को पारिवारिक फिल्मों में महारत हासिल है. उसी तरह बिहार मेरी अपनी जगह है. उसके साथ मैं न्याय करने की कोशिश कर सकता हूं.

आनेवाले प्रोजेक्ट

एक म्यूजिकल प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूं फिलहाल इतना ही बता सकता हूं.

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