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''चंद्रकांता'' के क्रूर सिंह ने कहा- झारखंड के युवाओं का फिल्मों में बढ़ा है रुझान

Updated at : 26 Oct 2018 10:04 AM (IST)
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''चंद्रकांता'' के क्रूर सिंह ने कहा- झारखंड के युवाओं का फिल्मों में बढ़ा है रुझान

अखिलेंद्र मिश्रा से बातचीत दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ में क्रूर सिंह का किरदार निभाकर घर-घर में लोकप्रिय होने के बाद गंगाजल, लगान, सरफरोश आदि कई फिल्मों में अब तक शानदार अभिनय करने वाले अभिनेता अखिलेंद्र िमश्रा ने प्रभात खबर से विशेष बातचीत में कहा कि सिनेमा और समाज का संबंध साहित्य से कट गया […]

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अखिलेंद्र मिश्रा से बातचीत

दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ में क्रूर सिंह का किरदार निभाकर घर-घर में लोकप्रिय होने के बाद गंगाजल, लगान, सरफरोश आदि कई फिल्मों में अब तक शानदार अभिनय करने वाले अभिनेता अखिलेंद्र िमश्रा ने प्रभात खबर से विशेष बातचीत में कहा कि सिनेमा और समाज का संबंध साहित्य से कट गया है. साहित्य मिले तो जीवन जीने की कला मिल जायेगी. हर साहित्य पौराणिक साहित्य से प्रेरित है. चाहे वह टैगोर का हो, गालिब, प्रेमचंद या दिनकर का. सिनेमा तो छोड़िये नाटक को भी लोग भूल चुके हैं, क्योंकि हमने जड़ छोड़ दी है. चीन और जापान में लोग जड़ से जुड़े हैं.

आप किसी किरदार को कितना जी पाते हैं?

मैं अखिलेंद्र मिश्रा का किरदार निभा रहा हूं. सभी अपना ही किरदार निभाते हैं. यह जीवन रंगमंच है. हम नाटक से हैं तो उसको भी जीते हैं. जहां भी रस है वहीं आनंद है. फिर वह चाहे नाटक हो या साहित्य.

युवाओं के लिए नाटक कितना जरूरी है?

बहुत जरूरी है. मैं तो कहता हूं कि हाइस्कूल से ही नाटक की पढ़ाई होनी चाहिए. छात्र किसी भी विषय का क्यों हो नाटक जरूर पढ़े. तभी तो वह जान पायेंगे कि थियेटर क्या है? इसका सशक्त प्रभाव क्या है. नाटक अनिवार्य होना चाहिए.

सिनेमा को लेकर झारखंड को आप किस तरह से देखते हैं?

झारखंड फिल्म पॉलिसी बना कर सरकार ने बहुत बड़ा काम किया है. यहां फिल्मों की शूटिंग हो रही है. युवाओं का फिल्मों में रुझान बढ़ा है. यहां के थियेटर कलाकारों को काम मिल रहा है. मैंने ही झारखंड में दो फिल्में की, लोहरदग्गा (नक्सल बेस्ड स्टोरी) और फेसबुक वाला प्यार. इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हुआ. इसका भी प्रभाव रहा.

आप जमशेदपुर कब-कब आये?

मां चाहती थी कि मैं इंजीनियर बनूं. मैंने आइआइटी, बीआइटी की तैयारी भी की, लेकिन कहीं हुआ नहीं. इंजीनियरिंग परीक्षा का सेंटर जमशेदपुर में पड़ा था. बात 1981-82 की है. उस समय जमशेदपुर बहुत छोटा दिखता था. वर्ष 1987 में टेली फिल्म करने जमशेदपुर आया था. 31 साल बाद अब आया हूं.

आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

फुरसत में मैं सृष्टि से जुड़ा, पौराणिक और वैचारिक साहित्य पढ़ता हूं. थियेटर के कारण बहुत कुछ पढ़ने से बच गया था. जो अब पढ़ रहा हूं. हाल में उपनिषद का एक अंश पढ़ रहा हूं. स्वयं के बारे में पढ़ रहा हूं. अध्यात्म से मेरा लगाव है.

बातचीत: कन्हैयालाल सिंह

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