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किस इस्लामिक देश के नोट पर छपा है भगवान गणेश और गरुड़ जी का फोटो, क्या आप जानते हैं?

Updated at : 16 Jun 2025 6:15 PM (IST)
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Indonesian currency

इंडोनेशिया की मुद्रा पर छपी भगवान गणेश और गरुड़ जी की तस्वीर.

Indonesian Currency: इंडोनेशिया एकमात्र मुस्लिम बहुल देश है, जिसकी मुद्रा पर भगवान गणेश और मुद्रा रुपियाह पर गरुड़ जी की तस्वीर 1992 से शुरू हुई एक नोट सीरीज में छापी गई थी. यह देश हिंदू संस्कृति और ग्रंथों जैसे रामायण और महाभारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत मानता है. यहां की कठपुतली कला और ऐतिहासिक संबंध भारत से गहरे हैं. यह नोट आज चलन में नहीं हैं, लेकिन सांस्कृतिक धरोहर और संग्रह का हिस्सा बने हुए हैं.

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Indonesian Currency: जब हम इस्लामिक देशों की बात करते हैं, तो आम तौर पर लोग यह उम्मीद नहीं करते कि वहां पर हिंदू देवी-देवताओं को सार्वजनिक या सरकारी प्रतीकों के तौर पर दर्शाया जाएगा. लेकिन, दुनिया में एक ऐसा भी इस्लामिक देश है, जहां के नोटों पर भगवान गणेश और गरुड़ जी का फोटो भी छपता है. उस देश का नाम इंडोनेशिया है. यह देश भी एक अपवाद है. यह देश न केवल रामायण और महाभारत जैसे हिंदू ग्रंथों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर मानता है, बल्कि इसकी मुद्रा पर भगवान श्रीराम और गणेश जी की तस्वीर छप चुकी है.

1988 में छपी थी भगवान श्री गणेश जी की छवि

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 1988 में एक खास थीम पर इंडोनेशियाई नोट पर भगवान गणेश की तस्वीर छापी गई थी. बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, इंडोनेशिया में गणेश जी की तस्वीर उसकी संस्कृति में विविधता को दर्शाता है. साल 1988 में छापे गए इस करेंसी नोट का थीम शिक्षा थी. गणेश जी को इंडोनेशिया में कला, बुद्धि और शिक्षा का भगवान माना जाता है. यहां के कई शैक्षणिक संस्थानों में भी गणेश जी की तस्वीर का इस्तेमाल किया जाता है.

रुपियाह के 1992 सीरीज में छपी थी गरुड़ जी की तस्वीर

इंडोनेशिया की आधिकारिक मुद्रा रुपियाह पर गरुड़ की तस्वीर 1992 से शुरू हुई एक नोट सीरीज में छापी गई थी. खास तौर पर, 50,000 रुपियाह के नोट पर गरुड़ पंचशील को प्रमुखता से दर्शाया गया है. गरुड़ इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक है. यह नोट 1993 में जारी किया गया था और इसके बाद की कई सीरीज में भी गरुड़ पंचशील की तस्वीर बनी रही. गरुड़ पंचशील इंडोनेशिया का राष्ट्रीय चिह्न है, जिसमें गरुड़ पक्षी को पांच सिद्धांतों (पंचशील) के प्रतीक के रूप में दर्शाया जाता है, जो देश के संविधान का आधार हैं. यह हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ से प्रेरित है, लेकिन इसका डिजाइन इंडोनेशिया के राष्ट्रीय दर्शन को दर्शाता है.

गरुड़ जी वाले नोट में क्या है खास

  • 1993 सीरीज: 50,000 रुपियाह के नोट पर गरुड़ पंचशील की तस्वीर पहली बार प्रमुखता से दिखाई गई. इस नोट के अगले हिस्से पर इंडोनेशिया के पहले उपराष्ट्रपति मोहम्मद हत्ता की तस्वीर थी और पीछे गरुड़ पंचशील के साथ अन्य राष्ट्रीय प्रतीक शामिल थे.
  • वर्तमान स्थिति: गरुड़ पंचशील आज भी इंडोनेशिया के कई नोटों (जैसे 50,000 और 100,000 रुपियाह) पर मौजूद है, क्योंकि यह राष्ट्रीय प्रतीक है. उदाहरण के लिए 2016 और 2022 की नई सीरीज में भी गरुड़ पंचशील को शामिल किया गया है.

इंडोनेशिया का पुराना नाम और ऐतिहासिक संबंध

प्राचीन समय में इंडोनेशिया को द्वीपों की भूमि कहा जाता था, जिसका जिसका “सुवर्णद्वीप” या “यव द्वीप” (Java Island) के रूप में भारतीय ग्रंथों में मिलता है. इंडोनेशिया पर हिंदू और बौद्ध साम्राज्य (विशेष रूप से श्रीविजय और मजापहित साम्राज्य) का शासन रहा है. इन साम्राज्यों के समय भारतीय संस्कृति, धर्म और भाषा का व्यापक प्रभाव पड़ा. इंडोनेशिया में आज भी हिंदू प्रभाव वाले नाम जैसे “गणेश”, “शिव”, “रामायणा”, “पांडव” आदि सार्वजनिक स्थलों, सड़कों और सांस्कृतिक स्थलों पर देखे जा सकते हैं. जकार्ता हवाई अड्डे पर भगवान विष्णु और गरुड़ की विशाल प्रतिमा इसका स्पष्ट उदाहरण है.

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इंडोनेशिया का आर्थिक महत्व

इंडोनेशिया में भगवान गणेश का 20,000 रुपिया का नोट अब चलन से बाहर हो चुका है, लेकिन गरुड़ पंचशील अब भी मौजूद है. यह सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में संग्रहकर्ताओं और शोधकर्ताओं के लिए एक मूल्यवान धरोहर बन चुका है. इस मुद्रा का विमोचन इंडोनेशियाई कला और परंपराओं को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने के लिए किया गया था. यह कदम न केवल सांस्कृतिक सम्मान का प्रतीक था, बल्कि इससे पर्यटन, कला और सांस्कृतिक निर्यात को भी प्रोत्साहन मिला.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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