कहीं आपका हेल्थ इंश्योरेंस भी तो नहीं है 'आधा-अधूरा'? क्लेम के समय कंपनियां ऐसे करती हैं 'खेल'

Updated at : 11 Apr 2026 3:06 PM (IST)
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Health Insurance

एक्सपर्ट से समझें इंश्योरेंस कंपनियों का 'नॉन-मेडिकल' खेल (फोटो: Canva)

Health Insurance: प्रीमियम पूरा, पर क्लेम मिला अधूरा, जानिए बीमा कंपनियों के 'हिडन' दांव-पेच.

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Health Insurance: आज के दौर में बीमारी कभी भी दस्तक दे सकती है. इसी डर से लोग लाखों रुपये का प्रीमियम भरकर हेल्थ इंश्योरेंस लेते हैं ताकि मुसीबत में जेब खाली न हो. लेकिन क्या आपको पता है कि देश की कई बड़ी प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम का पूरा पैसा नहीं दे रही हैं? आंकड़े बताते हैं कि कई बार मरीज को कुल खर्चे का 80% से भी कम पैसा मिल रहा है. आइए समझते हैं कि बीमा कंपनियां क्लेम में कटौती करने के लिए किन रास्तों का इस्तेमाल करती हैं.

केस स्टडी: जब कंपनियों को कोर्ट ने सिखाया सबक

  • बेंगलुरु: एक महिला ने ब्रेस्ट कैंसर का क्लेम किया, जिसे कंपनी ने ‘पुरानी दिल की बीमारी’ का बहाना बनाकर खारिज कर दिया. अदालत ने इसे ‘सेवा में कमी’ माना और 5 लाख रुपये भुगतान का आदेश दिया.
  • चंडीगढ़: 2.25 लाख रुपये के बिल के बदले कंपनी ने मात्र 69,958 रुपये दिए. उपभोक्ता आयोग के हस्तक्षेप के बाद कंपनी को ब्याज सहित पूरा पैसा देना पड़ा.
    नोएडा: यहां भी तकनीकी कारणों से क्लेम रिजेक्ट किया गया, जिसे बाद में जिला उपभोक्ता आयोग ने गलत ठहराया और कंपनी को हर्जाना भरने को कहा.

बीमा कंपनियां कहां काटती हैं आपके पैसे?

  1. नॉन-मेडिकल खर्चे (The Non-Medical Trap): इरडा (IRDAI) के विशेषज्ञों के मुताबिक, अस्पताल बिल में सर्जिकल ब्लेड, कॉटन, गाउन, ग्लव्स और यहाँ तक कि हाथ धोने वाले साबुन और टिश्यू पेपर के पैसे भी जोड़ता है. बीमा कंपनियां इन्हें “इलाज का हिस्सा नहीं” मानती हैं और इनकी रकम बिल से काट ली जाती है.
  2. रूम रेंट की लिमिट और प्रोपोर्शनेट कटौती: अगर आपकी पॉलिसी में कमरे का किराया ₹5,000 तय है, लेकिन आपने ₹8,000 वाला कमरा ले लिया, तो कंपनी सिर्फ कमरा ही नहीं बल्कि डॉक्टर की फीस और सर्जरी के खर्च में भी उसी अनुपात में कटौती कर देती है.
  3. पुरानी बीमारी और जानकारी छिपाने का बहाना: कंपनियां अक्सर ‘प्री-एक्सिस्टिंग डिजीज’ (पुरानी बीमारी) का हवाला देकर क्लेम रोक देती हैं, भले ही उस बीमारी का वर्तमान इलाज से कोई लेना-देना न हो.
  4. को-पे (Co-pay) का क्लॉज: आजकल कई पॉलिसियों में ‘को-पे’ की शर्त होती है. इसका मतलब है कि बिल चाहे कितना भी हो, उसका एक तय हिस्सा (जैसे 10% या 20%) मरीज को खुद ही भरना होगा.
कटौती का कारणअसल में क्या होता है?एक्सपर्ट की सलाह
नॉन-मेडिकल बिलग्लव्स, मास्क, गाउन और कंज्यूमेबल्स के पैसे नहीं मिलते.पॉलिसी लेते समय ‘कंज्यूमेबल कवर’ राइडर जरूर लें.
रूम रेंट कैपिंगतय लिमिट से महंगा कमरा लेने पर पूरे बिल से कटौती होती है.हमेशा अपनी लिमिट के अंदर वाला कमरा ही चुनें.
पुरानी बीमारीपुरानी बीमारी छिपाने पर पूरा क्लेम रिजेक्ट हो सकता है.पॉलिसी फॉर्म भरते समय कोई भी मेडिकल हिस्ट्री न छुपाएं.
को-पे क्लॉजबिल का एक हिस्सा आपको खुद देना पड़ता है.बिना को-पे वाली या कम को-पे वाली पॉलिसी को प्राथमिकता दें.

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Abhishek Pandey

लेखक के बारे में

By Abhishek Pandey

अभिषेक पाण्डेय पिछले 2 वर्षों से प्रभात खबर (Prabhat Khabar) में डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संस्थान 'दादा माखनलाल की बगिया' यानी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) से मीडिया की बारीकियां सीखीं और अपनी शैक्षणिक योग्यता पूरी की है। अभिषेक को वित्तीय जगत (Financial Sector) और बाजार की गहरी समझ है। वे नियमित रूप से स्टॉक मार्केट (Stock Market), पर्सनल फाइनेंस, बजट और बैंकिंग जैसे जटिल विषयों पर गहन शोध के साथ विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं। इसके अतिरिक्त, इंडस्ट्री न्यूज, MSME सेक्टर, एग्रीकल्चर (कृषि) और केंद्र व राज्य सरकार की सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana) का प्रभावी विश्लेषण उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं। आम जनमानस से जुड़ी यूटिलिटी (Utility) खबरों और प्रेरणादायक सक्सेस स्टोरीज को पाठकों तक पहुँचाने में उनकी विशेष रुचि है। तथ्यों की सटीकता और सरल भाषा अभिषेक के लेखन की पहचान है, जिसका उद्देश्य पाठकों को हर महत्वपूर्ण बदलाव के प्रति जागरूक और सशक्त बनाना है।

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