देश का पेस्टीसाइड्स बाजार 2015-16 तक 33,000 करोड रुपये को छू जाएगा
Updated at : 20 Mar 2015 2:06 PM (IST)
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मुंबई : कीटनाशकों का बाजार वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान 12-15 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 33,000 करोड रुपये पर पहुंच जाएगा हालांकि यह उद्योग, सरकार की गलत नीतियों के कारण भारी नुकसान से जूझ रहा है. यह बात कीटनाशक उद्योग संगठन शीर्ष अधिकारी ने कही. पेस्टीसाइड्स मैन्यूफैक्चर्स एंड फ़ॉर्म्युलेटर्स ऐसोसिएशन आफ इंडिया (एमएफएआई) के […]
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मुंबई : कीटनाशकों का बाजार वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान 12-15 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 33,000 करोड रुपये पर पहुंच जाएगा हालांकि यह उद्योग, सरकार की गलत नीतियों के कारण भारी नुकसान से जूझ रहा है. यह बात कीटनाशक उद्योग संगठन शीर्ष अधिकारी ने कही.
पेस्टीसाइड्स मैन्यूफैक्चर्स एंड फ़ॉर्म्युलेटर्स ऐसोसिएशन आफ इंडिया (एमएफएआई) के अध्यक्ष प्रदीप दवे ने कहा, अनुमान है कि कीटनाशक उद्योग जो अभी करीब 27,000 करोड रुपये का है, जिसमें वित्त वर्ष 2013-14 के दौरान घरेलू बाजार की हिस्सेदारी 15,000 करोड रुपये और निर्यात की 12,000 करोड रुपये है.
उन्होंने कहा कि उद्योग को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2015-16 में इसमें 12-15 प्रतिशत वृद्धि दर्ज होगी जिसमें घरेलू बाजार 18,000 करोड रुपये और निर्यात बाजार 15,000 करोड रुपये का होगा. दवे ने कहा कि हालांकि सरकार की गलत नीतियों के कारण उद्योग को पिछले तीन साल के दौरान 15,000 करोड रुपये का नुकसान हुआ है.
उन्होंने कहा, सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गैर-पंजीकृत कीटनाश फोर्म्युलेशन के आयात को समर्थन दे रही है जो भारतीय किसानों के लिए खतरा है. उन्होंने कहा, कृषि मंत्रालय भारतीय क्षेत्र को समान मौका प्रदान नहीं करता, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एकाधिकार सुनिश्चित हुआ है. उन्होंने कहा कि भारतीय कीटनाशक उद्योग पिछले कुछ साल से सख्त नीति के दौर गुजर रहा है.
संगठन तैयार माल के आयातित फोर्म्युलेशन पर रोक लगाने की मांग कर रहा है जिसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश में डंपिंग कर रही हैं. इसने सीमा शुल्क में कटौती की भी मांग की है क्योंकि देश से 12,000 करोड रुपये के कीटनाशक का निर्यात होता है.
दवे ने कहा भारतीय कीटनाशक उद्योग में अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों के उत्पादन की क्षमता और विशेषज्ञता है. उद्योग के पास 40 प्रतिशत से अधिक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है जिसका गैरकानूनी तौर पर कीटनाशक के आयात के कारण उपयोग नहीं हो पा रहा है और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया से जुडे सपने के अनुरुप नहीं है.
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