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सावधान! भारत में गर्मी बढ़ने से 2030 में काम करना होगा मुश्किल, 3.4 करोड़ नौकरियों के बराबर उत्पादकता की होगी कमी

Updated at : 02 Jul 2019 6:18 PM (IST)
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सावधान! भारत में गर्मी बढ़ने से 2030 में काम करना होगा मुश्किल, 3.4 करोड़ नौकरियों के बराबर उत्पादकता की होगी कमी

संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि वायुमंडल का तापमान बढ़ने से 2030 में भारत में 5.8 फीसदी काम के घंटों का नुकसान हो जायेगा. उत्पादकता की इस क्षति का कुल नुकासान 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बरारबर होगा. इससे कृषि एवं निर्माण क्षेत्रों पर खास तौर पर फर्क पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन […]

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संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि वायुमंडल का तापमान बढ़ने से 2030 में भारत में 5.8 फीसदी काम के घंटों का नुकसान हो जायेगा. उत्पादकता की इस क्षति का कुल नुकासान 3.4 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बरारबर होगा. इससे कृषि एवं निर्माण क्षेत्रों पर खास तौर पर फर्क पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने ‘गर्म धरती पर कार्य करना-गर्मी से उत्पन्न दबाव का श्रम उत्पादकता एवं साफ सुथरे कार्य पर प्रभाव ‘ (वर्किंग ऑन अ वॉर्मर प्लैनेट- द इम्पैक्ट ऑफ हीट स्ट्रेस ऑन लेबर प्रोडक्टिविटी एंड डिसेंट वर्क) शीर्षक से अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है.

इसे भी देखें : जलवायु परिवर्तन से भारत की जीडीपी को नुकसान, जानें

आईएलओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2030 तक दुनियाभर में दो कामकाजी घंटों के नुकसान होने का अनुमान है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी के कारण या तो काम करना मुमकिन नहीं होगा या तो कर्मचारियों के काम करने की रफ्तार धीमी हो जायेगी. रिपोर्ट के मुताबिक, 21वीं सदी के आखिर तक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भीषण गर्मी के कारण 2030 तक दुनियाभर में कुल कामकाजी घंटों में 2.2 फीसदी की कमी आ जायेगी. इससे आठ करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों की उत्पादकता का ह्रास होगा. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उष्मागत तनाव के कारण 2030 तक वैश्विक स्तर पर कुल 2,400 अरब डॉलर का वित्तीय नुकसान होने का अनुमान है.

रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि अगर जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए अभी कदम नहीं उठाये गये, तो यह वित्तीय बोझ बढ़ेगा. इसका कारण यह है कि सदी के आखिर तक वैश्विक तापमान के और अधिक बढ़ने की आशंका है.

अक्टूबर, 2018 में भी संयुक्त राष्ट्र ने दी थी चेतावनी

संयुक्त राष्ट्र ने आठ अक्टूबर, 2018 को अपनी एक रिपोर्ट में इस बात के लिए आगाह किया था कि 2030 तक पृथ्वी के औसत तापमान में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर 1.5 डिग्री सेल्सियस की औसत वृद्धि होगी, जिससे अत्यधिक सूखे, जंगलों में आग, बाढ़ और करोड़ों लोगों के लिए खाद्यान्न की कमी का खतरा बढ़ जायेगा. संयुक्त राष्ट्र के ‘जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल’ (आईपीसीसी) ने कहा कि वैश्विक स्तर पर जलवायु में हो रही उथल-पुथल से बचाव के लिए समाज और विश्व अर्थव्यवस्था को ‘अभूतपूर्व स्तर’ पर बहुत बड़े बदलाव से गुजरना होगा.

बहुत जल्द ही 3 से 4 फीसदी बढ़ जायेगा धरती का तापमान

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया था कि इस आपदा से निपटने के लिए बहुत ही जल्दी कदम उठाने होंगे. धरती की सतह का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और यह बहुत जल्द तीन से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. ऐसा होने पर धरती पर रहना लगभग असंभव हो जायेगा. सतह का तापमान एक डिग्री तक बढ़ना महासागरों में भयावह तूफान लाने से लेकर, बाढ़ एवं सूखे जैसी आपदाओं के लिए काफी है. ये आंकड़े ग्रीन हाउस गैसों के वर्तमान उत्सर्जन स्तर के आधार पर तैयार किये गये हैं.

संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, गृह के दो-तिहाई हिस्से का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने से वह हिस्सा पहले ही उस ओर बढ़ चला है. इसे और अधिक गर्म होने से बचाने के लिए हमें आगामी कुछ सालों में ही महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे.

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