आज का दर्शन : सवा सौ वर्ष पुरानी आस्था का केंद्र बांका स्थित बाबा ब्रह्मदेव स्थान

Edited by Shruti Kumari
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बांका के करनावै स्थित बाबा ब्रह्मदेव स्थान में धार्मिक आयोजन की तैयारियां जोरों पर.

Aaj Ka Darshan: बांका के करनावै स्थित बाबा ब्रह्मदेव स्थान में 1 जुलाई को वार्षिक पूजा व भंडारा होगा. पांच दिवसीय आरती व भक्ति कार्यक्रम की तैयारी तेज है.

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बांका से चंदन कुमार की रिपोर्ट :

Aaj Ka Darshan: जिले के सदर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत करमा पंचायत के करनावै गांव स्थित ऐतिहासिक बाबा ब्रह्मदेव स्थान में वार्षिक पूजा एवं भंडारा को लेकर तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं. पूजा समिति के सदस्य साफ-सफाई और पूजा सामग्री जुटाने में सक्रिय हैं. वहीं आगामी कार्यक्रम को लेकर पूरे गांव में धार्मिक उत्साह का माहौल बना हुआ है. यहां हर वर्ष अदरा नक्षत्र के दौरान भव्य भंडारा और वार्षिक पूजा का आयोजन किया जाता है. इस वर्ष अदरा नक्षत्र 22 जून से शुरू हो रहा है, जिसके साथ ही 27 जून से पांच दिवसीय संध्या आरती एवं भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाएगा. मुख्य वार्षिक पूजा और भंडारा कार्यक्रम 1 जुलाई को आयोजित होगा. पूजा के दौरान स्थानीय महिलाएं प्रतिदिन संध्या आरती और भजन-कीर्तन करेंगी, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहेगा. आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं और बाबा ब्रह्मदेव को दूध, पान, लड्डू, बतासा, सुपाड़ी और जनेऊ अर्पित किया जाता है. सैकड़ों लीटर दूध से खीर बनाकर बाबा को भोग लगाया जाता है, जिसके बाद उसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है.

आस्था का अनूठा केंद्र

करनावै स्थित यह स्थल जिला मुख्यालय से लगभग पांच किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित है. मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. यही कारण है कि यहां विषैले सर्पदंश, बिच्छू काटने, गंभीर बीमारी और अन्य शारीरिक कष्टों से पीड़ित लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं. भक्तों का विश्वास है कि बाबा ब्रह्मदेव स्थान में सच्चे मन से की गई पूजा से हर संकट दूर हो जाता है. यहां हर रविवार को भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.

पौराणिक कथा

स्थानीय पंडित भूदी झा के अनुसार, लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व यह क्षेत्र घने जंगल और विशाल वट वृक्ष से घिरा हुआ था. उसी वृक्ष के नीचे ब्रह्मदेव अपने परिवार के साथ कामधेनु गाय का पालन करते थे. एक घटना के बाद ब्रह्मदेव ने जीवन त्याग दिया और उनके छह भाइयों ने भी उसी स्थान पर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी. इसके बाद इस स्थान को शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाने लगा और आज यह क्षेत्र आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है.

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