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आत्मावलोकन करें

By विजय बहादुर
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर.
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मेरी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हुआ. मुझे जीवन में जिन ऊंचाइयों पर होना चाहिए था, मैं वहां नहीं हूं. मेरे साथ काम करने वाले मुझसे आगे निकल गये, जबकि मैं उनसे बेहतर हूं. मैं जो करना चाहता था, उसका अवसर मुझे नहीं मिल पाया. मेरी प्रतिभा को दमित कर दिया गया. मैंने इतनी ऊर्जा खर्च की, मुझे हासिल क्या हुआ?

इस तरह के तमाम नकारात्मक सवाल इंसान को अंदर तक कचोटते रहते हैं और ये लाजमी भी है. किसी भी इंसान के आगे बढ़ने के बहुत सारे कारक होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है खुद को जानना. इसलिए सबसे जरूरी है आत्मावलोकन करना. विरले ही होते हैं, जो अपनी कमियों को दुनिया के सामने स्वीकार कर पाने का साहस कर पाते हैं, लेकिन इंसान अपनी कमियों को जानता है. इंसान दुनिया के सामने झूठ बोल सकता है, लेकिन खुद से झूठ नहीं बोल सकता है क्योंकि उसे खुद की हकीकत का एहसास होता है. जब भी ऐसा लगे कि मैंने जीवन में बहुत मेहनत की है या अर्जित किया है, तो अपनी उपलब्धियों को पीछे मुड़कर देखने की बजाय सामने देखें. आपको वैसे बहुत सारे लोग नजर आयेंगे, जिन्होंने आपसे बहुत लंबी लकीर खींच रखी है. तब आपको अपनी सूक्ष्मता (लघुता) का एहसास होगा और शायद महसूस हो कि अभी तो मुझे बहुत दूर तक चलते जाना है.

बार-बार ऐसा लगता है कि मैं लगातार कोशिश किये जा रहा हूं, लेकिन आगे की तरफ नहीं बढ़ पा रहा हूं. मेरा मानना है कि जीवन में सफलता की सीढ़ी ब्रह्मांड के ऑर्बिट्स की तरह है. ऑर्बिट्स के चारों तरफ पार्टिकल चक्कर लगाते रहते हैं और घूमते- घूमते ये पार्टिकल एक ऑर्बिट से दूसरे ऑर्बिट में चले जाते हैं. इसी तरह जब हम लगातार अपना कार्य पूरी शिद्दत से करते हैं, तो निश्चित तौर पर सफलता के नये ऑर्बिट में चले जाते हैं. ये अलग बात है हरेक को एक ऑर्बिट से दूसरे ऑर्बिट में जाने में ज्यादा या काम समय लग सकता है.

हम कहीं नौकरी कर रहे हैं या कोई स्वरोजगार. निश्चित तौर पर हमें एक काल खंड के बाद आंकलन करना चाहिए कि हम प्रगति के पथ पर हैं या नहीं. अगर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हैं, तो समझें कि आप जिस कार्ययोजना के साथ काम कर रहे हैं, वो सही है और उसे सिर्फ समय- समय पर थोड़ा दुरुस्त करते रहना है और तमाम प्रयास के बावजूद अगर कुछ भी सही नहीं हो पा रहा है, तो इसका मतलब है कि आपको अपनी कार्ययोजना में बड़ा बदलाव करने की जरूरत है. बड़ा बदलाव करने के खतरे भी हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं है क्योंकि बिना प्रयास किये इंसान वैसे भी धीमी गति से खत्म हो जाता है और अगर रिस्क लेता है तो एक संभावना जरूर रहती है कि कुछ बेहतर भी हो सकता है.

कार्य क्षेत्र में अपना 100 प्रतिशत दें. काबिलियत पर विश्वास रखें. समय के साथ हो रहे तकनीकी और अन्य बदलाव के साथ इंटीग्रेट करें. इसके बाद भी अगर आपको लगता है कि आपके साथ न्याय नहीं हो रहा है तो आप बदलाव (विकल्प) का रास्ता जरूर अख्तियार करें क्योंकि जिस संस्थान में प्रतिभा की कद्र नहीं है, वो संस्थान ना सिर्फ अपने बेहतरीन लोगों को खो देता है बल्कि अपना भविष्य भी बेहतर करने की संभावना खो देता है. जिस संस्थान का भविष्य अनिश्चित है, उसके साथ जुड़े रहना अपने आप को अनिश्चितता में डालना है.

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