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यस दे कैन अभियान से प्रतिभागियों को निखार रहे सुमित

Updated at : 19 Nov 2018 1:31 PM (IST)
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यस दे कैन अभियान से प्रतिभागियों को निखार रहे सुमित

विजय बहादुर vijay@prabhatkhabar.in आपको झारखंड के महावीर फोगाट की कहानी याद है. नहीं तो, आपको थोड़ा पीछे लिए चलता हूं. आगे की कहानी समझने में आसानी होगी. कहानी वही दंगल फिल्म वाली है. बस महावीर फोगाट की जगह पश्चिमी सिंहभूम जिला अंतर्गत खूंटपानी प्रखंड के पूतीदा गांव निवासी दुंबी पूर्ति हैं. उनकी साइकिल पंक्चर मरम्मत […]

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विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in

आपको झारखंड के महावीर फोगाट की कहानी याद है. नहीं तो, आपको थोड़ा पीछे लिए चलता हूं. आगे की कहानी समझने में आसानी होगी. कहानी वही दंगल फिल्म वाली है. बस महावीर फोगाट की जगह पश्चिमी सिंहभूम जिला अंतर्गत खूंटपानी प्रखंड के पूतीदा गांव निवासी दुंबी पूर्ति हैं. उनकी साइकिल पंक्चर मरम्मत की एक छोटी-सी दुकान है. दो बेटियां, बिल्कुल गीता-बबीता की तरह. बड़ी का नाम ननिका पूर्ति और छोटी का नाम नसीमा पूर्ति है.

16 फरवरी, 2017 के अंक में आपने पढ़ा…

महावीर की तरह दुंबी ने बेटियों को खुद ट्रेनिंग दी. खुद से तीरंदाजी प्रतियोगिता के अनुरूप तीन-धनुष बनाया और खेत में बेटियों से प्रैक्टिस कराना शुरू किया. पिता दुंबी अपना सपना किसी वजह से पूरा नहीं कर सके थे. साल 1986 में उनका प्रदर्शन देखकर दिल्ली के साई सेंटर के लिए चयन हुआ. जब उन्हें पता चला, तो एक महीने बीत चुके थे. बेटी ने सपना पूरा किया. राष्ट्रीय स्तर की तीरंदाजी में दोनों बहन ननिका और नसीमा पूर्ति का चयन हुआ. यहां तक की कहानी आप 16 फरवरी, 2017 के अंक में पढ़ चुके हैं. अब इसी कड़ी में आगे की कहानी कुछ और है.

लोगों की दुआएं आती हैं का

किसी सपने को पूरा करने के पीछे सिर्फ एक हाथ नहीं होता. कई लोगों की दुआएं काम आती हैं. कई लोग इस सफलता में साथ देते हैं, सुमित कुमार इनमें से एक हैं.

सुमित का चाईबासा से अधिक लगाव

मूलत: रांची के सुमित ने इंजीनियरिंग और टाटा इंस्टीट्यूट से एमएसडब्ल्यू करने के बाद मुंबई में जेएसडब्ल्यू जैसी कंपनी में सीएसआर में काम करना शुरू किया, लेकिन सुमित को यहां मन नहीं लगा. इसे छोड़ सुमित ने पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा में प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास शोधार्थी के रूप में काम किया. बीच में कोल इंडिया में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में ज्वाइन करने का अवसर मिला, पर उसे भी छोड़ दिया. फिलहाल, सुमित दिल्ली में जे-पाल साउथ एशिया (एमआइटी, यूएसए) जैसी नामी संस्थान में मैनेजर (रिसर्च ऑपरेशन) के रूप में कार्यरत हैं. दिल्ली में रहकर सुमित का चाईबासा से लगाव और अधिक गहरा हो गया. सुमित कहते हैं कि मैं हमेशा सोचता हूं कि भारत दुनिया में युवा आबादी वाला सबसे बड़ा देश है. आखिर क्यों क्रिकेट को छोड़ कर वह दूसरे खेलों में अपनी धाक नहीं जमा पाता. इसका सबसे बड़ा कारण क्या है? सुविधाओं की कमी या योग्यता की कमी.

सुमित ने की ननिका-नसीमा की मदद

आप सोच रहे होंगे कि दुंबी पूर्ति और उनकी दो बेटियों की कहानी में सुमित कहां से आ गये. जब वह इस क्षेत्र में शोध कर रहे थे, तो उन्होंने ननिका और नसीमा पूर्ति की मदद की. सरकारी अधिकारियों से संपर्क किया और मदद की अपील की. दोनों बच्चियों को सही ट्रेनिंग मिले, इसका ध्यान रखा.

दोनों बहनों की मिली सरकारी मदद

दोनों बहनें घर में बने तीर-धनुष से निशानेबाजी की तैयारी करती थीं. सुमित बताते हैं कि इसका कारण साफ था कि उनके पास पैसे नहीं थे. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार होने के लिए उन्हें तकनीकी तौर पर सही तैयारी और सही खेल सामग्री की जरूरत थी. उच्च स्तरीय तीरंदाजी किट में कम से कम डेढ़ लाख रुपये का खर्च था. उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि सरकार इस तरह के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के लिए मदद करती है. मैं जानता था कि सरकार इनकी मदद कर सकती है. मैंने दुंबी पूर्ति से कहा कि वह एक पत्र लिखें, जिसमें मदद का जिक्र हो. इस पत्र के लगभग छह महीने बाद राज्य सरकार ने उन्हें साढ़े चार लाख रुपये की मदद भेजी. इस मदद ने उनके लिए रीढ़ की तरह काम किया.

राष्ट्रीय तीरंदाजी प्रतियोगिता के लिए हुआ चयन

ननिका और नसीमा पूर्ति का राष्ट्रीय स्कूल तीरंदाजी प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ. यह प्रतियोगिता जनवरी 2019 में दिल्ली में आयोजित होगी. सुमित बताते हैं कि पिछले तीन साल से जमीनी स्तर पर काम हो रहा है. मैंने महसूस किया है कि यहां प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है. अधिकतर आदिवासी और बच्चे खिलाड़ी हैं. उनके पास अच्छा स्टेमिना है. फोकस है. तीरंदाजी, फुटबॉल, हॉकी जैसे क्षेत्रों में इनके लिए असीम संभावनाएं हैं.

अभियान चला कर समुदाय के हित के लिए प्रेरित कर रहें हैं सुमित

झारखंड के सुदूर गांवों के इलाकों में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. इन प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए यस दे कैन अभियान के तहत सुमित की यह कोशिश कई सवालों का जवाब है. सुमित कहते हैं कि इस संस्था के तहत हम काम कर रहे हैं. फंड जमा कर रहे हैं. इन जमा पैसों से चाईबासा में 10 युवाओं को तीरंदाजी की ट्रेनिंग दे रहे हैं. सुमित न सिर्फ खेल की ट्रेनिंग दे रहे हैं, बल्कि बच्चों में नेतृत्व कौशल, धैर्य, पारस्परिक सम्मान और टीम भावना जगाने के लिए भी प्रयासरत हैं. सुमित कहते हैं कि इन बच्चों का खेल तो बेहतर हो रहा है. साथ ही ये अपने समुदाय के हित के लिए काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. कोशिश है कि नक्सल प्रभावित इन इलाकों में जहां कई तरह के खेल की संभावनाएं हैं, उन्हें बाहर लाया जाये. यह पहली बार है जब तीरंदाजी को आगे किया गया है. धीरे-धीरे दूसरे खेलों में भी यह कोशिश होगी.

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