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सीएनजी या पेट्रोल कार: सस्ती दिखने वाली सीएनजी असल में कब पड़ती है महंगी? यहां समझिए पूरा हिसाब

CNG vs. Petrol: सीएनजी गाड़ी सस्ती है या पेट्रोल? खरीद कीमत, माइलेज, मेंटेनेंस और असली खर्च का पूरा हिसाब पढ़िए. जानिए कब सीएनजी फायदेमंद है और कब पेट्रोल ज्यादा सुकून देता है

CNG vs. Petrol: देश में बढ़ते ईंधन दामों के बीच सीएनजी गाड़ियां एक सस्ते विकल्प के तौर पर खूब बेची जा रही हैं. शोरूम में कदम रखते ही अक्सर कहा जाता है- “सीएनजी लो, खर्च आधा हो जाएगा.” लेकिन क्या यह दावा हर किसी के लिए सही है? असलियत यह है कि सीएनजी और पेट्रोल की लड़ाई सिर्फ माइलेज की नहीं, बल्कि खरीद कीमत, इस्तेमाल, सुविधा और लंबे खर्च की भी है. नीचे पूरा हिसाब आसान भाषा में समझिए, ताकि फैसला भावनाओं से नहीं, गणित से हो.

1. खरीदते ही पहला झटका: शोरूम कीमत का फर्क

एक ही मॉडल में पेट्रोल और सीएनजी वर्जन की कीमतों में बड़ा अंतर होता है. पेट्रोल गाड़ी जहां बजट में आ जाती है, वहीं सीएनजी वर्जन औसतन ₹90 हजार से ₹1.20 लाख तक महंगा पड़ताहै. यानी गाड़ी चलाने से पहले ही आपकी जेब से ज्यादा पैसा निकल चुका होता है. यही सीएनजी का सबसे बड़ा नेगेटिव प्वाइंट है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

2. माइलेज का गणित: पैसा वसूल होने में कितनी दौड़ लगेगी

कागज पर सीएनजी बेहद फायदे का सौदा दिखती है. पेट्रोल अगर करीब ₹7.5 प्रति किलोमीटर पड़ता है और सीएनजी ₹3.4 प्रति किलोमीटर, तो हर किलोमीटर पर लगभग ₹4 की बचत बनती है.

अब असली सवाल- अगर सीएनजी गाड़ी₹1 लाख महंगी है, तो यह रकम निकालने के लिए आपको करीब 25,000 किलोमीटर चलाना होगा. जो लोग साल में कम गाड़ी चलाते हैं, उनके लिए यह फायदा सालों में भी पूरा नहीं हो पाता.

3. रोजमर्रा की परेशानी: जगह, पावर और आराम की कमी

सीएनजी सिलेंडर गाड़ी की पूरी डिग्गी निगल जाता है. परिवार के साथ लंबा सफर हो या सामान ज्यादा हो, यहीं से दिक्कत शुरू होती है. ऊपर से पिकअप कमजोर, ओवरटेक में हिचक और एसी चालू करते ही गाड़ी सुस्त लगने लगती है. ट्रैफिक और चढ़ाई पर यह कमी और ज्यादा महसूस होती है.

4. इंजन और मेंटेनेंस का छुपा खर्च

सीएनजी को सूखा ईंधन माना जाता है, जिससे इंजन के वाल्व और हेड पर ज्यादा दबाव पड़ताहै. समय के साथ स्पार्क प्लग जल्दी बदलने पड़ते हैं, ट्यूनिंग की जरूरत बढ़ती है और कभी-कभी सर्विस सेंटर भी “सीएनजी की वजह” बताकर जिम्मेदारी से बचते नजर आते हैं. ऊपर से सिलेंडर की एक्सपायरी और टेस्टिंग का खर्च अलग.

5. सुविधा बनाम सुकून: लंबी दूरी में कौन आगे

सीएनजी स्टेशन की लंबी लाइन, हर जगह उपलब्ध न होना और अंडरग्राउंड पार्किंग में एंट्री की पाबंदी- ये सब रोजमर्रा की टेंशन बढ़ाते हैं. वजन ज्यादा होने से सस्पेंशन और टायर पर असर पड़ता है, और रीसेल के वक्त खरीदार भी कम मिलते हैं. ड्राइविंग का मजा चाहने वालों के लिए पेट्रोल अब भी ज्यादा सुकून देता है.

फैसला आपका

अगर आपकी ड्राइविंग बहुत ज्यादा है, शहर में रोज लंबा चलना है और खर्च ही सबसे बड़ा मुद्दा है- तब सीएनजी समझदारी हो सकती है.

लेकिन अगर चलाना कम है, परिवार के साथ सफर करना है और पावर व आराम चाहिए- तो पेट्रोल गाड़ी कई बार ज्यादा सस्ती और ज्यादा आरामदायक साबित होती है.

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Rajeev Kumar
Rajeev Kumar
राजीव, 14 वर्षों से मल्टीमीडिया जर्नलिज्म में एक्टिव हैं. टेक्नोलॉजी में खास इंटरेस्ट है. इन्होंने एआई, एमएल, आईओटी, टेलीकॉम, गैजेट्स, सहित तकनीक की बदलती दुनिया को नजदीक से देखा, समझा और यूजर्स के लिए उसे आसान भाषा में पेश किया है. वर्तमान में ये टेक-मैटर्स पर रिपोर्ट, रिव्यू, एनालिसिस और एक्सप्लेनर लिखते हैं. ये किसी भी विषय की गहराई में जाकर उसकी परतें उधेड़ने का हुनर रखते हैं. इनकी कलम का संतुलन, कंटेंट को एसईओ फ्रेंडली बनाता और पाठकों के दिलों में उतारता है. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर

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