श्रद्धांजलि : डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी एक स्वाभिमानी लेखक, सामाजिक मुद्दों को बनाया अपनी रचना का केंद्र

Author : Rajneesh Anand Published by : Prabhat Khabar Updated At : 11 Apr 2020 4:41 PM

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वरिष्ठ साहित्यकार डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी का आज सुबह निधन हो गया. वे 84 वर्ष के थे. डॉ गोस्वामी काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे. डॉ गोस्वामी के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत ही सहज और सौम्य थे. यही कारण है कि उनके जाने से हर वो शख्स दुखी है […]

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वरिष्ठ साहित्यकार डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी का आज सुबह निधन हो गया. वे 84 वर्ष के थे. डॉ गोस्वामी काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे. डॉ गोस्वामी के बारे में कहा जाता है कि वे बहुत ही सहज और सौम्य थे. यही कारण है कि उनके जाने से हर वो शख्स दुखी है जो उन्हें थोड़ा बहुत भी जानता था. उनके करीबी तो इस खबर से स्तब्ध हैं. उनके सहपाठी और सहकर्मी रहे वरिष्ठ साहित्यकार अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि आज मुझे यह सूचना वरिष्ठ पत्रकार बलबीर दत्त ने दी. असल में लॉकडाउन के कारण उनका परिवार परेशान था कि कैसे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होगी.

अशोक प्रियदर्शी ने बताया कि हम दोनों ऑनर्स से एमए तक साथ पढ़े थे. उनका पुश्तैनी मकान रांची के मेनरोड में था. अभी जहां पर गुरुद्वारा और सरकार बूट हाउस है वहीं पर. वे काफी स्वाभिमानी व्यक्ति थे. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत में एचईसी में एलडीसी का काम किया था. फिर वे डोरंडा कॉलेज में हिंदी विभाग में लेक्चरर हो गये थे. वे नागपुरी के पहले पीएचडी थे. वे अपना कैरियर इसी में बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें इस क्षेत्र में ज्यादा महत्व नहीं मिला तो वे हिंदी की तरफ आ गये. डोरंडा कॉलेज के बाद वे हिंदी विभाग रांची विश्वविद्यालय आ गये. राजकमल प्रकाशन ने उनके उपन्यास ‘जंगलतंत्रम’ को छापा था. वह राजनीति पर व्यंग्य है पंचतत्र की तरह इसे लिखा गया है. इसी लेखन के लिए उन्हें राधाकृष्ण पुरस्कार दिया गया था.

उनकी तबीयत काफी वर्षों से खराब थी. वे डालटनगंज गये थे एक कार्यक्रम में, वहीं उनकी तबीयत बिगड़ी. फिर वे बस से रांची आये, फिर ऑटो से घर और बताया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. परिवार वाले उन्हें डॉक्टर केके सिन्हा के पास ले गये. जहां डॉक्टर ने बताया कि वे सबकुछ भूल चुके हैं. उन्हें क ख ग से शुरुआत करनी होगी. अशोक प्रियदर्शी ने बताया कि मैं उनसे मिलने गया था, तो कहा सब ठीक है गोस्वामी जी. कुछ नहीं हुआ, तो वे ना में सिर हिलाते रहे. दो-तीन बार के बाद कहा कि जिसे अपनी किताब तक का नाम याद नहीं उसे क्या याद है. हालांकि दवा लेने के बाद वे ठीक हो गये थे. फिर पाखी वाला विवाद भी हुआ. लेकिन पिछले कुछ समय से काफी बीमार थे. उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर ही लिखा. सामाजिक समस्याओं पर लिखा. वे एक स्वाभिमानी व्यक्ति थे.

डॉ गोस्वामी रांची के डोरंडा कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे, हालांकि वे रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त हुए थे. रांची विश्वविद्यालय में उनके द्वारा लिखी गयी नागपुरी व्याकरण की किताब पढ़ाई जाती थी. उनकी सबसे चर्चित रचना ‘जंगलतंत्रम’ है. यह उपन्यास काफी चर्चित रहा और इसने डॉ गोस्वामी की ख्याति पूरे देश में फैला दी. इसके अतिरिक्त ‘एक छोटी सी नगरी की लंबी कहानी’ नाम से उन्होंने रांची का का पूरा इतिहास लिखा था. वे हिंदी और नागपुरी में लिखते थे.

डॉ गोस्वामी के निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक है. उनकी दो बेटियां और एक पुत्र हैं. डॉ गोस्वामी के निधन पर शोक जताते हुए साहित्याकार रणेंद्र ने कहा कि वे उन साहित्यकार में शुमार थे, जिन्हें झारखंड से बाहर पूरे देश में ख्याति मिली. उनका उपन्यास ‘जंगल तंत्रम’ काफी प्रसिद्ध है और इसे काफी पढ़ा गया. जब भी यह उपन्यास हमारे सिरहाने रहेगा, डॉ गोस्वामी की याद ताजा रहेगी. वे एक विद्वान व्यक्ति थे, लेकिन बहुत ही सहज और सौम्य थे. उनसे कोई भी सहयोग मांगता था तो वे कभी मना नहीं करते थे. उनके पास कोई भी जाकर अपनी शंकाओं का समाधान कर सकता था. उनके पास एक समृद्ध लाइब्रेरी थी, जिसमें रेअर किताबें थीं. उनका जाना हमारे लिए बहुत बड़ी क्षति थी.

डॉ गोस्वामी के निधन पर शोक जताते हुए साहित्याकार रणेंद्र ने कहा कि वे उन साहित्यकार में शुमार थे, जिन्हें झारखंड से बाहर पूरे देश में ख्याति मिली. उनका उपन्यास ‘जंगल तंत्रम’ काफी प्रसिद्ध है और इसे काफी पढ़ा गया. जब भी यह उपन्यास हमारे सिरहाने रहेगा, डॉ गोस्वामी की याद ताजा रहेगी. वे एक विद्वान व्यक्ति थे, लेकिन बहुत ही सहज और सौम्य थे. उनसे कोई भी सहयोग मांगता था तो वे कभी मना नहीं करते थे. उनके पास कोई भी जाकर अपनी शंकाओं का समाधान कर सकता था. उनके पास एक समृद्ध लाइब्रेरी थी, जिसमें रेअर किताबें थीं. उनका जाना हमारे लिए बहुत बड़ी क्षति थी.

महुआ माजी ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि डॉ गोस्वामी का जाना झारखंड के लिए बड़ी क्षति है. खासकर साहित्य जगत के लिए यह बड़ा नुकसान है. वे बड़े लेखक और उपन्यासकार थे. अस्वस्थ होने के कारण उनकी और कई रचनाएं सामने नहीं आ सकीं, संभवत: अगर वे स्वस्थ होते तो कई रचनाएं सामने आतीं. उनके निधन से मैं दुखी हूं और श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं.

आईपीएस और साहित्यकार प्रशांत करण ने कहा कि डॉ गोस्वामी एक विद्वान और माता सरस्वती के साधक थे, जो चकाचौंध से दूर रहे. स्वयं के प्रचार से ज्यादा महत्व उन्होंने साहित्य साधना को दिया. सीधे, सपाट, सहज, सच्चाई पसंद और विराट हृदय के स्वामी थे. छल-कपट से दूर, सबको स्नेह देने वाले ,विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे.उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है.

साहित्यकार और श्रवण कुमार गोस्वामी की शिष्या रहीं मुक्ति शाहदेव ने कहा कि वे एक बेहद सरल, सहज व्यक्तित्व के मालिक थे. उनका जाना एक पूरे युग का चला जाना है और बेहद दुखद भी है. मुझे याद आ रहा है वह वर्ष जब मैं 1994-95 में रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में नामांकन के लिए गयी थी. सर अकेले कार्यालय में बैठे थे एक मोटा रजिस्टर लेकर. किसी कारण ऑफिस का कोई कर्मचारी उपस्थित नहीं था और सर ने ही मेरा नामांकन किया था. बड़ी विनम्रता से मेरी ओर रजिस्टर घुमाया अपनी कलम दी और कहा – यहां हस्ताक्षर कर दीजिए , आपका क्रमांक एक है. मैंने धन्यवाद कह कर उनकी कलम वापस उन्हें पकड़ा दी थी. मैं पहले से जानती थी कि ‘जंगलतंत्रम’ उपन्यास के लेखक हैं सर. पहले ही दिन गुरूवर की कलम से हस्ताक्षर करना सुकून देने वाला क्षण था मेरे लिए.

सर हमें हिंदी भाषा का विकास और नागपुरी पेपर पढ़ाते थे. हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा तो है पर राजभाषा बनने के साथ किंतु/परंतुओं को पढ़ाते/बताते और अंग्रेजी की बादशाहत पर वे बेहद दुखी होते थे. उनकी शालीनता और बेहद- बेहद सरल व्यक्तित्व के हम सब कायल थे. कोई कैसे इतना सहज-सरल हो सकता है, यह बात हम छात्र-छात्राएं अक्सर चर्चा करते थे. सर की बड़ी बेटी सुजाता मेरी सहपाठी थी. मेरे बाबा और गोस्वामी सर जिला स्कूल में सहपाठी थे. यही कारण था कि गुरू के साथ- साथ उनका सान्निध्य अभिभावक-सा आभास कराता था. जब भी बाबा से उनकी मुलाकात होती दोनों नागपुरी भाषा में ही बातें करते थे.

जब मेरी शादी हुई मैं उनके मुहल्ले नयी नगरा टोली में ही भाड़े के मकान में रहती थी. कई वर्षों तक उनसे संपर्क बना रहा. आज आप चले गए और सब कुछ स्मृति पटल पर चलचित्र -सा आ-जा रहा है.

साहित्कार अनिता रश्मि ने कहा कि जब मैं रांची आयी तो ऊषा सक्सेना दी ने सुरभि महिलाओं की संस्था से जोड़ा और गोस्वामी जी से मुलाकातें प्रारंभ हुईं. फिर निकटता. फिर घर पर भी आये. मेरी दो-तीन किताबें पढ़कर उस पर आत्मीयता से लिखा भी. एकदम अनजान से बहुत परिचित में बदल गये. किताबें और फोटो प्रदर्शनी उसका माध्यम बनें. आयें दिन लैंड लाइन पर बातें भी होतीं. बेटी की शादी में भी राज दी के साथ आये. बहुत सहज, सरल, मृदुभाषी लेकिन एकदम दृढ़. कुछ सालों पूर्व बात हुई थी, तो बताया कि किसी कार्यक्रम के सिलसिले में शहर से बाहर गए थे. एकाएक अजब बीमारी से घिर गये. आना-जाना, लिखना-पढ़ना बंद. फिर सुधार के बाद भी बात की. उन्होंने खुद बताया, सुधार के बाबत. पिछले वर्ष सुरेन्दर कौर जी के साथ घर पर मिली. याद नहीं रख पाते थे कुछ, लिख भी नहीं पाते थे. लेकिन पहचान भी लिया. अपने हाथ से लिख कर भी दिया. चिर सहयोगिनी राज दी ने सहायता की. नहीं जानती, आज क्यों वे बारह बजे दिन में एक चर्चा के बीच आ गये और फिर तुरंत ही दुःखद खबर. यह था क्या, क्यों?….अब भी सोच रही हूँ.

ललन चतुर्वेदी ने कहा कि यह निश्चित रूप से साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है. वे बड़े उपन्यासकार के साथ- साथ बेहद विनम्र एवं शालीन इंसान थे. उन्होंने अपना एक मुकदमा हिन्दी माधयम से लड़ा था और विजय भी प्राप्त की थी. स्वयं उन्होंने साहित्य अमृत में इस प्रसंग में लिखा था. बैंकों में भी चेक आदि पर हस्ताक्षर करते थे. कुल मिलाकर हिंदी पढ़ने लिखने वाले ही नहीं अपितु हिंदी को जीने वाले थे.

साहित्यिक संस्था ´ शब्दकार ´ ने डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है. टीम शब्दकार की रश्मि शर्मा, नंदा पांडेय, संगीता गुज़ारा टाक व राजीव थेपड़ा की ओर से संस्था की अध्यक्ष वीना श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी व झारखंडी भाषाओं को समृद्ध करने में डॉ गोस्वामी का अतुलनीय योगदान रहा है. वे नागपुरी भाषा में पीएचडी करने वाले पहले व्यक्ति थे. उनका निधन साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है. शब्दकार संस्था सभी साहित्य-अनुरागियों की ओर से उनको सादर श्रद्धांजलि अर्पित करती है.

कुमार संजय ने डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि मेरे पिताजी स्व डॉ सिद्धनाथ कुमार के घनिष्ठ मित्र थे. जबतक पिता जी जीवित थे, डॉ गोस्वामी का मेरे घर काफी आना जाना था. उनसे जुड़ी बहुत यादें और बाते हैं. पिताजी की की मृत्यु 2008 के बाद मैंने नाटक लिखना शुरू किया था. मेरा दूसरा पूर्णकालिक नाटक हवा रोको प्रकाशित होकर आया था. गोस्वामी चाचा जी ने पढ़ा तो अत्यंत प्रसन्न हुए. उन्होंने न सिर्फ व्यक्तिगत रूप से फोन करके मेरी तारीफ की बल्कि खुद ही एक समीक्षा भी लिख दी जो आधुनिक साहित्य में प्रकाशित हुई. उनकी कमी बहुत खलेगी.

डॉ श्रवण कुमार गोस्‍वामी के निधन पर नागपुरी भाषा के लेखक, साहित्‍यकार, प्राध्‍यापक के साथ-साथ नागपुरी साहित्‍य संस्‍कृति मंच के सभी सदस्‍यों ने शोक व्‍यक्‍त किया और लॉकडाउन को ध्‍यान रखते हुए ऑन लाइन श्रद्धांजलि अर्पित की. नागपुरी भाषा परिषद की सचिव शकुंतला मिश्र ने डॉ गोस्‍वामी के बारे में बताया कि उनके द्वारा कई पुस्‍तकों की रचना की है और नागपुरी के महान साहित्‍यकार थे. डॉ उमेश नंद तिवारी ने बताया, डॉ गोस्‍वामी आकाशवाणी रांची द्वारा जुलाई 1958 से दिसंबर 1958 तक प्रसारित ‘तेतइर कर छांव’ धारावाहिक नाटक के प्रस्‍तोता भी रहे हैं. डॉ गोस्‍वामी के निधन पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के वरीय प्राध्‍यापक डॉ उमेश नंद तिवारी, नागपुरी भाषा साहित्‍य संस्‍कृति मंच की सचिव श्रीमती शकुंतला मिश्र, डॉ संजय कुमार षाड़ंगी, संतोष भगत, प्रो रामकुमार, विजय कुमार, रविंद्र ओहदार, मनोहर महंती, राकेश रमण, अंजू साहू, प्रमोद कुमार राय, अवधेश सिंह, कंचन मुंडा, प्रभा कुमारी, नंद किशोर, कुमुद बिहारी षाड़ंगी, करमी मांझी, युगेश और मनोज कच्‍छप ने श्रद्धांजलि दी.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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