Nobel Prize 2023 : मौंगी बावेंडी, लुईस ब्रूस और एलेक्सी एकिमोव को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार

शोधकर्ताओं ने क्वांटम डाट्स का उपयोग मुख्य रूप से रंगीन रोशनी बनाने के लिए किया है. उनका मानना है कि भविष्य में क्वांटम डॉट्स लचीले इलेक्ट्रॉनिक्स, छोटे सेंसर, पतले सोलर सेल के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं.
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने क्वांटम डॉट्स पर काम के लिए तीन वैज्ञानिकों मौंगी बावेंडी, लुईस ब्रूस और एलेक्सी एकिमोव को रसायन विज्ञान 2023 का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की है. क्वांटम डॉट्स बहुत ही छोटे कण होते हैं और उनका आकार उनके गुणों को निर्धारित करता है.
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The Royal Swedish Academy of Sciences has decided to award the 2023 #NobelPrize in Chemistry to Moungi G. Bawendi, Louis E. Brus and Alexei I. Ekimov “for the discovery and synthesis of quantum dots.” pic.twitter.com/qJCXc72Dj8— The Nobel Prize (@NobelPrize) October 4, 2023
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क्वांटम डॉट्स में अद्वितीय गुण होते हैं और ये टेलीविजन स्क्रीन और एलईडी लैंप में भी मौजूद रहते हैं जिनके जरिए तेज रोशनी फैलती है. ये नैनोकण रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करते हैं और उसके जरिए जो तेज रोशनी निकलती है वह एक एक सर्जन को ट्यूमर की सर्जरी में मदद करती है.शोधकर्ताओं ने क्वांटम डाट्स का उपयोग मुख्य रूप से रंगीन रोशनी बनाने के लिए किया है. उनका मानना है कि भविष्य में क्वांटम डॉट्स लचीले इलेक्ट्रॉनिक्स, छोटे सेंसर, पतले सोलर सेल के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं.
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लेखक के बारे में
By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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