AI से अपडेट होते जिहादी नेटवर्क: जानें AI को लेकर कैसे है प्लान, ISIS जल्द तो अल-कायदा लंबी लड़ाई की तैयारी कर रहा है

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AI और आतंकवाद: नई तकनीक, पुरानी लड़ाई (AI सांकेतिक तस्वीर)

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इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा के नेटवर्क AI को किस तरह देख रहे हैं और इनके नजरिए में क्या फर्क है?

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI शायद आतंकवाद का कोई बिल्कुल नया रूप पैदा न करे. लेकिन यह पहले से मौजूद तरीकों को तेज, सस्ता और आसान जरूर बना सकता है.

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जुलाई 2026 में अमेरिका के थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies (CSIS) की एक रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क भी यही है. आतंकवादी संगठन प्रचार, भर्ती, अनुवाद, सूचना जुटाने और अपनी ऑनलाइन गतिविधियों में AI का इस्तेमाल कर सकते हैं.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल है- क्या सभी आतंकी संगठन AI को एक ही नजर से देखते हैं?

आतंकवाद और उग्रवादी संगठनों की रणनीति का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों ने अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े प्रचार, रणनीतिक लेखों और AI के इस्तेमाल के दस्तावेजों का अध्ययन किया.

इससे एक दिलचस्प अंतर सामने आता है.

दोनों नेटवर्क AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन दोनों की सोच अलग है.

सरल शब्दों में कहें तो-

इस्लामिक स्टेट जल्दी परिणाम चाहता है, जबकि अल-कायदा लंबी लड़ाई में विश्वास करता है.

इस्लामिक स्टेट: AI को तुरंत इस्तेमाल करने का नजरिया

इस्लामिक स्टेट लंबे समय से अपनी मीडिया रणनीति और डिजिटल प्रचार के लिए जाना जाता है.

सीरिया और इराक में अपने प्रभाव के चरम दौर में संगठन ने तेज, आकर्षक और पेशेवर डिजिटल प्रचार को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था.

यही प्रवृत्ति AI के दौर में भी दिखाई देती है.

2023 के बाद इस्लामिक स्टेट समर्थकों और उससे जुड़े नेटवर्क से AI-generated सामग्री के उदाहरण सामने आए. मार्च 2024 में मॉस्को के क्रोकस सिटी हॉल हमले के बाद समर्थकों ने AI से तैयार एक नकली अरबी समाचार एंकर का इस्तेमाल करते हुए हमले का प्रचार किया.

इसके अलावा AI का इस्तेमाल तस्वीरें बनाने, भाषाओं में अनुवाद करने और अलग-अलग भाषाओं में प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए भी किया गया.

यहां AI का आकर्षण साफ है- कम समय में ज्यादा सामग्री और ज्यादा लोगों तक पहुंच.

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ISIS-K और AI: तकनीक से पीछे न रहने की सोच

इस्लामिक स्टेट के अफगानिस्तान स्थित नेटवर्क ISIS-K (Khorasan) से जुड़े मीडिया नेटवर्क ने भी AI को लेकर चर्चा की है.

जून 2025 में उसके अंग्रेजी भाषा के ऑनलाइन प्रकाशन Voice of Khorasan में AI को लेकर एक लेख प्रकाशित हुआ. इसमें AI की समझ को धार्मिक जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश की गई थी.

हालांकि बाद में इस धार्मिक दावे को हटा दिया गया, लेकिन AI से जुड़ी सामग्री बनी रही.

इस घटना से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है.

संगठन नई तकनीक को तेजी से अपनाने की कोशिश करता है, लेकिन उसके वैचारिक इस्तेमाल को लेकर बाद में अपने रुख में बदलाव भी कर सकता है.

यानी पहले प्रयोग, फिर बहस और उसके बाद वैचारिक समायोजन.

इस्लामिक स्टेट से जुड़े विमर्श में AI को मुख्यतः ऐसी तकनीक के रूप में देखा जाता है जिसे समझना जरूरी है, क्योंकि विरोधी भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं.

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अल-कायदा भी पीछे नहीं, लेकिन उसका सवाल अलग है

अल-कायदा और उससे जुड़े नेटवर्क भी AI के साथ प्रयोग कर रहे हैं.

2023 से ही उसके समर्थक नेटवर्क में AI-generated तस्वीरों के उदाहरण सामने आने लगे थे. 2024 में अल-कायदा से जुड़े Al-Malahem Electronic Army ने AI-powered chatbots के इस्तेमाल पर एक गाइड भी जारी की.

अल-कायदा से जुड़े 'अल-मलाहेम इलेक्ट्रॉनिक आर्मी' की ओर से 2024 में जारी एक गाइड का कवर पेज, जिसका शीर्षक है 'AI-पावर्ड चैटबॉट्स के इस्तेमाल के शानदार तरीके'.
अल-कायदा से जुड़े 'अल-मलाहेम इलेक्ट्रॉनिक आर्मी' की ओर से 2024 में जारी एक गाइड का कवर पेज, जिसका शीर्षक है 'AI-पावर्ड चैटबॉट्स के इस्तेमाल के शानदार तरीके'.

अल-कायदा से जुड़े सोमालिया के संगठन अल-शबाब के बारे में संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई 2025 में बताया कि उसने अपनी सामग्री को कई भाषाओं में अनुवाद करने के लिए AI tools का इस्तेमाल किया.

भारत में भी AI और आतंकी गतिविधियों का सवाल जांच एजेंसियों के सामने आया है. मई 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA ने नवंबर 2025 के दिल्ली कार धमाके के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया. जांच में एक ऐसे इंजीनियर का भी उल्लेख हुआ जिसने विस्फोटकों से संबंधित जानकारी के लिए YouTube और ChatGPT का इस्तेमाल किया था.

हालांकि ऐसे मामलों में किसी तकनीक का इस्तेमाल अपने आप में आतंकवाद का कारण नहीं माना जा सकता. असली सवाल यह है कि तकनीक को किस उद्देश्य और किस नेटवर्क के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया.

लेकिन अल-कायदा की सोच सिर्फ 'टूल' तक सीमित नहीं

यहीं दोनों संगठनों के बीच सबसे दिलचस्प अंतर दिखाई देता है.

अल-कायदा से जुड़े कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म AI को केवल प्रचार या काम आसान करने वाले उपकरण के रूप में नहीं देखते. वे यह सवाल भी उठा रहे हैं कि AI युद्ध की प्रकृति को कितना बदल सकता है?

2025 में अल-कायदा समर्थक Anaziat Foundation ने Fiqh al-Harb यानी 'युद्ध के सिद्धांत' पर आधारित एक श्रृंखला में AI, साइबर युद्ध और तकनीकी बदलाव से संबंधित पश्चिमी रणनीतिक लेखों का अरबी में अनुवाद प्रकाशित किया.

इन लेखों में सवाल उठाया गया कि क्या AI भविष्य के युद्ध को बदल सकता है? क्या मशीनें मानव निर्णय की जगह ले सकती हैं? और क्या तकनीकी श्रेष्ठता किसी युद्ध का अंतिम परिणाम तय कर सकती है?

इन सवालों का महत्व इसलिए है क्योंकि ये अल-कायदा की पुरानी रणनीतिक सोच से जुड़ते हैं।

अल-कायदा बनाम ISIS: फर्क 'समय' की सोच में

दोनों संगठनों की AI रणनीति को समझने के लिए उनके संगठनात्मक चरित्र को समझना जरूरी है.

इस्लामिक स्टेट ने अपने प्रोजेक्ट को तत्काल प्रभाव, क्षेत्रीय नियंत्रण और 'खिलाफत' की स्थापना के विचार के आसपास बनाया था। इसलिए उसकी रणनीति में तेजी और दृश्य प्रभाव महत्वपूर्ण रहे हैं.

AI इस सोच के लिए स्वाभाविक रूप से उपयोगी है.

दूसरी तरफ, अल-कायदा खुद को एक लंबी पीढ़ीगत लड़ाई के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. उसकी रणनीति में धैर्य, संगठन का बिखराव, नुकसान के बाद भी बने रहना और लंबे समय तक संघर्ष जारी रखना महत्वपूर्ण रहा है.

इसलिए उसके कुछ समर्थक AI को एक अलग सवाल से देखते हैं-

क्या तकनीकी श्रेष्ठता हमेशा रणनीतिक जीत में बदलती है?

यहीं मानव इच्छा, राजनीतिक उद्देश्य और लंबे संघर्ष की क्षमता जैसे विचार सामने आते हैं.

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AI बदलेगा तरीका, लेकिन क्या युद्ध का नतीजा भी?

इस पूरे विमर्श से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है.

AI दोनों नेटवर्क के लिए उपयोगी है। दोनों इसका इस्तेमाल प्रचार, अनुवाद, सूचना और सुरक्षा से जुड़े कामों में कर रहे हैं.

लेकिन तकनीक का इस्तेमाल हमेशा संगठन की सोच से जुड़ा होता है.

इस्लामिक स्टेट के लिए सवाल अधिकतर है- AI से अभी क्या हासिल किया जा सकता है?

वहीं अल-कायदा से जुड़े कुछ रणनीतिक विमर्श में सवाल आगे बढ़कर यह हो जाता है-

AI युद्ध, शक्ति और जीत की हमारी पुरानी समझ को कितना बदल सकता है?

यानी एक ही तकनीक, लेकिन दो अलग रणनीतिक नजरिए.

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है. क्योंकि AI के कारण खतरा केवल यह नहीं है कि आतंकी संगठन नई तकनीक अपना लेंगे.

बड़ा सवाल यह है कि वे इस तकनीक को अपनी मौजूदा रणनीति, संगठनात्मक संस्कृति और लंबे समय के लक्ष्य के साथ कैसे जोड़ेंगे.

और यही आने वाले वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों और नीति निर्माताओं के सामने AI और आतंकवाद की सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है.

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