हांगकांग की आजादी खतरे में
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Jul 2019 7:42 AM
ऑलिविया एनोस, वरिष्ठ नीति विश्लेषक, एशियाई अध्ययन केंद्र, द हेरिटेज फाउंडेशन बेसिक लॉ के तहत हांगकांग 2047 में पूरी तरह से चीन के अधीन हो जायेगा. इस समय-सीमा के निकट आने के साथ ही इस द्वीपीय शहर के कई नागरिक अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर भयभीत हैं. विरोध प्रदर्शनों की सघनता का […]
ऑलिविया एनोस, वरिष्ठ नीति विश्लेषक, एशियाई अध्ययन केंद्र, द हेरिटेज फाउंडेशन
बेसिक लॉ के तहत हांगकांग 2047 में पूरी तरह से चीन के अधीन हो जायेगा. इस समय-सीमा के निकट आने के साथ ही इस द्वीपीय शहर के कई नागरिक अपने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर भयभीत हैं. विरोध प्रदर्शनों की सघनता का एक कारण यह भी है कि जो पीढ़ी निश्चित रूप से 2047 के सत्ता-हस्तांतरण के समय जीवित रहेगी, वह अब जागरुक हो रही है.
हांगकांग की स्वतंत्रता को बचाने की आवश्यकता पर युवाओं और बुजुर्गों में आम सहमति है, लेकिन इसे हासिल करने के तौर-तरीकों को लेकर शायद सहमति नहीं है. हांगकांग के वर्तमान और भविष्य में हिस्सेदार समूहों- युवा एवं बुजुर्ग, कारोबारी एवं सामान्य जन तथा धार्मिक एवं अधार्मिक- के बीच परस्पर विश्वास और सामंजस्य स्थापित करना स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के प्रयासों की स्पष्टता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. जून के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की व्यापकता और भागीदारी को दुनिया ने अचरज से देखा था. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने और शांति-व्यवस्था के बने रहने जैसे कारकों ने उन प्रदर्शनों को बहुत अहम बना दिया था.
हिंसा की ओर आंदोलन के झुकाव ने प्रारंभिक सकारात्मक प्रभाव को कमतर किया है. स्वतंत्रता बहाल रखने के लिए हांगकांग के लोगों के शांतिपूर्ण प्रयासों को उत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें भी हिंसात्मक गतिविधियां करने से या प्रदर्शनों को लगातार जारी रखने से परहेज रखना चाहिए ताकि उनके मुख्य कारणों से ध्यान न भटके. स्वतंत्रता का संरक्षण करने और उसे बढ़ाने के प्रमुख लक्ष्य से भटकना निश्चित रूप से हानिकारक होगा.
(साभारः द नेशनल इंटेरेस्ट में छपे लेख का संपादित-अनुदित अंश)
अम्ब्रेला मूवमेंट, 2014
चीनी संसद पीपुल्स कांग्रेस की स्थायी समिति ने 31 अगस्त, 2014 को हांगकांग की चुनाव प्रणाली में बदलाव का फैसला किया था. हांगकांग के निवासियों, खासकर युवाओं, की नजर में यह कदम चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा हांगकांग के मुख्य प्रशासक के पद के उम्मीदवारों के चयन को प्रभावित करने के लिए उठाया गया था.
इसके विरोध में छात्रों ने 22 सितंबर, 2014 से हड़ताल शुरू कर दी और 26 तारीख से प्रशासनिक मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन होने लगे. दो दिन बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन भी शुरू हो गया. मुख्य कार्यालयों, चौराहों और प्रमुख स्थलों पर बड़ी संख्या में नागरिकों के जमा होने से शहर अस्त-व्यस्त हो गया.
पुलिस द्वारा आंसू गैस के गोले छोड़ने और प्रदर्शनकारियों के साथ जोर-जबरदस्ती करने के कारण बहुत से नागरिक भी आंदोलन का साथ देने लगे. हांगकांग प्रशासन और चीनी सरकार ने इस आंदोलन को अवैध घोषित कर दिया और इसके लिए पश्चिमी देशों को दोषी ठहराया. पर, आंदोलनकारियों पर कोई असर नहीं हुआ. प्रशासनिक क्षेत्र में 77 दिनों तक यातायात बाधित रहा और 14 दिसंबर को ही इसे खाली कराया जा सका था. हालांकि, इस आंदोलन का कोई परिणाम नहीं निकल सका था, किंतु इससे युवा और छात्र समुदाय का तेजी से राजनीतिकरण हुआ और इसी प्रक्रिया की एक कड़ी 2019 का आंदोलन है.
इस आंदोलन के दमन के प्रयासों ने हांगकांग के प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया की स्वायत्तता पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला. छातों और मोबाइल फोन के टॉर्च के व्यापक इस्तेमाल के कारण यह प्रदर्शन सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में खासा चर्चित रहा. छातों के कारण ही इसका नाम अम्ब्रेला आंदोलन पड़ा.
बीते जून माह के प्रारंभ में नये प्रत्यर्पण कानून के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का रूप ले चुका है. साथ ही हांगकांग और चीन के बीच बढ़ती नजदीकियों और इस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के भविष्य को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ गयी हैं.
हांगकांग की मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लाम ने मौजूदा संकट के लिए व्यक्तिगत रूप से माफी मांगी है और साथ ही स्वीकार किया है कि उन्होंने विवादास्पद कानून को लागू कर दिया था. प्रदर्शनकारियों ने उन पर गैर-जिम्मेदराना रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने लोगों की मांगों को दरकिनार किया है. फिलहाल, विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन जारी है.
हांगकांग को मिला है विशेष दर्जा
हांगकांग को मिला विशेष दर्जा उसे चीन के अन्य शहरों से अलग करता है. ब्रिटिश उपनिवेश का 150 साल तक हिस्सा रहे हांगकांग द्वीप को ब्रिटिश शासन ने 1997 में ‘एक देश, दो तंत्र’ नीति समेत कई विशेष प्रावधानों के साथ चीन को सौंप दिया था. चीन का हिस्सा होते हुए भी अगले 50 वर्षों के लिए हांगकांग को (विदेश और रक्षा मामलों को छोड़कर) उच्च स्तर की स्वायत्तता प्रदान की गयी है. नतीजतन, हांगकांग के पास स्वयं का विधि तंत्र, सीमा और संवैधानिक अधिकार है.
बदल रही हैं परिस्थितियां
हांगकांग के पास कुछ विशेष अधिकार हैं, जिनसे चीन की मुख्य भूमि पर रहनेवाले लोग महरूम हैं. लेकिन, अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. चीन का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, खासकर लोकतंत्र समर्थकों को निशाना बनाया जा रहा है. विरोधियों और आलोचकों की गिरफ्तारी जैसे मामले सामने आ रहे हैं. हांगकांग के सदन में बीजिंग समर्थक सदस्यों का दबदबा बढ़ रहा है. हांगकांग का संविधान और बुनियादी कानून कहता है कि सदन के नेता और विधान परिषद का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत होगा. लेकिन, इस पर असहमति बढ़ रही है और लोकतंत्र समर्थकों पर कार्रवाई की जा रही है.
हांगकांग के लोग खुद को मानते हैं चीन से अलग
हांगकांग में लोगों की चीनी नागरिकों के साथ नस्लीय समानता है, लेकिन ज्यादातर लोग खुद को चीनी नहीं मानते हैं. हांगकांग विश्वविद्यालय के एक सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि लोग खुद चीनी स्वीकार करने के बजाय स्वयं को ‘हांगकांगर्स’ के तौर पर प्रस्तुत करते हैं. मात्र 11 प्रतिशत लोग ही स्वयं को चीनी स्वीकार करते हैं. सर्वे में 71 प्रतिशत लोगों का मानना है कि चीनी नागरिक के तौर पर वे गर्व महसूस नहीं करते. हांगकांग के निवासी कानूनी, सामाजिक और सांस्कृतिक भिन्नता का भी हवाला देते हैं. चीनी हस्तक्षेप के विरोध में बीजिंग के खिलाफ हाल के वर्षों में तेजी से आक्रोश बढ़ा है.
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