पुस्‍तक समीक्षा : आदिवासी प्रश्नों को समझने में मददगार

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रजनीश आनंद

'आदिवासी एंड देअर फॉरेस्ट’ नामक यह किताब झारखंड में ऐसे समय में लॉन्च हुई है जब पूरे प्रदेश में पथलगड़ी का मामला गरमाया हुआ है. साथ ही यह चर्चा भी गर्म है कि आखिर क्यों झारखंड के आदिवासी और सरकार के बीच हमेशा तकरार की स्थिति बन जाती है. वे कौन-सी वजहें हैं कि आदिवासियों को ऐसा लगता है कि सरकार उनके खिलाफ है.

‘आदिवासी एंड देअर फॉरेस्ट’ किताब के लेखक ग्लैडसन डुंगडुग हैं. उन्होंने बहुत ही सहज और सरल तरीके से आदिवासियों के मसलों पर चर्चा की है और यह बताया है कि आखिर पेच कहां फंसता है.

झारखंड में हमेशा से जल, जंगल और जमीन की बात होती रहती है. लेकिन आज भी आदिवासी समुदाय के लोगों का यह दावा है कि वे इसपर अधिकार से वंचित हैं. ग्लैडसन डुंगडुग ने अपनी किताब में न सिर्फ कानूनों की बात की है, बल्कि उन्होंने इतिहास का भी जिक्र किया है और बताया है कि किस तरह जंगल पर उनका अधिकार है. वे बताते हैं कि आदिवासी जंगल से उतना ही लेता है जितने की उसे जरूरत है. वह जंगल का दोहन नहीं करता, बल्कि उसका संवर्द्धन करता है.

किताब में यह बखूबी बताया गया है कि आदिवासियों के पूर्वजों ने किस तरह जंगलों को रहने लायक बनाया और इस नाते उनका न सिर्फ जंगल, बल्कि उसके प्राकृतिक संसाधनों पर भी उनका अधिकार है.

यह किताब 30 चैप्टरों में विभाजित करके लिखी गयी है और हर चैप्टर में विस्तार से यह बताया गया है कि जंगल और आदिवासी के संबंध क्या हैं? आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है? कानून क्या हैं? जंगल पर अधिकार को लेकर किस तरह की राजनीति हो रही है? किस तरह जबरन आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदख किया गया जैसे मुद्दों पर यह किताब ध्यान आकृष्ट कराती है.

ग्लैडसन डुंगडुंग की यह किताब इसलिए भी बहुत खास है क्योंकि इसमें आदिवासियों के दृष्टिकोण से उनकी पीड़ा को बताया गया है. ग्लैडसन ने हर चैप्टर के पहले एक कोट डाला है, जिसमें आदिवासियों की पीड़ा के साथ-साथ उनके हक को मजबूती भी दी गयी है.

फारेस्ट राइट एक्ट के चैप्टर में ग्लैडसन ने केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम का कोट डाला है, जिसमें वे कहते हैं- 'मेरा मंत्रालय यह देखेगा, कि आदिवासियों के किसी भी अधिकार का हनन न हो, यह हमारा कर्तव्य है कि हम यह सुनिश्चित करें कि फॉरेस्ट राइट एक्ट का सही तरीके से पालन हो.' किताब में यह कहा गया है कि आदिवासियों का प्रकृति और जंगल से सहजीविता का संबंध है. लेकिन समय के साथ किस तरह उनका जंगल पर से अधिकार छीना गया, उन्हें प्रताड़ित किया गया, इसे लेकर राजनीति हुई और आदिवासी क्यों और कैसे जंगल पर अधिकार को लेकर मुखर हुआ.

इस किताब के निष्कर्ष में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि हम (आदिवासी) अपने क्षेत्र में जंगल का संवर्धन करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं, फिर कैसे उसपर से हमारा अधिकार छीन कर बिना हमारी मर्जी के किसी कॉरपोरेट को सौंपा जा सकता है. यह आदिवासियों की व्यथा तो है ही साथ ही उनके संघर्ष का आधार भी है. आदिवासी इस बात को आज बहुत ही मजबूती के साथ कहने की स्थिति में है कि वे जंगल के अधिकारी और इसके संरक्षक हैं, साथ ही वे जंगल की संपदा और वाइल्डलाइफ के सबसे बड़े संरक्षक है. आदिवासियों के दृष्टिकोण और उनके मुद्दों को समझने के लिए यह किताब बहुत ही उपयोगी है.

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