550वां प्रकाशपर्व पर विशेष : सुल्तानपुर लोधी, जहां हैं गुरु की अहम निशानियां

By Prabhat Khabar Digital Desk
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डॉ मनजीत सिंह संधू
देश-विदेश में गुरु नानक देव जी का 550 साला जनम दिहाड़ा मनाया जा रहा है. करतारपुर कॉरिडोर तो चर्चा में है ही, सुल्तानपुर लोधी में भी देश-विदेश से लोगों का जमावड़ा हो रहा है. पूरा नगर सज-धज कर तैयार है. शहर की दीवारों पर गुरु लीला के चित्र बना दिये गये हैं, लोगों के रुकने के लिए सरकारी व्यवस्था के अलावा आस-पास के लोगों ने भी अपने कमरे सेवा के लिए तैयार किये हैं. पूरे शहर के आस-पास लंगर लग रहे हैं.
सुलतानपुर लोधी पंजाब का एक ऐतिहासिक शहर है. इस शहर में गुरु साहेब ने 14 साल, 9 महीने, 13 दिन बिताये थे. ननकाना साहेब और करतारपुर के बाद गुरु साहेब ने सबसे ज्यादा समय सुल्तानपुर लोधी में बिताया और लोगों को मिल कर रहने, बांट कर खाने (लंगर) का ज्ञान देकर उन्होंने उदासियों (प्रचार का फेरा) की शुरुआत की. यहां पर गुरु साहेब के सात महत्वपूर्ण गुरुद्वारे हैं और उनके समय की कई महत्वपूर्ण निशानियां भी मौजूद हैं.
गुरुद्वारा श्री बीबी नानकी जी : यह गुरुद्वारा बीबी नानकी जी का घर हुआ करता था. बीबी नानकी अपने छोटे भाई नानक से बहुत प्यार करती थी. उनका विवाह सुल्तान पुर लोधी के जयराम जी से हुआ. विवाह के कुछ दिनों के बाद उन्होंने अपने भाई को अपने पास बुला लिया, फिर अपने पति जयराम से कह उनकी नौकरी सुलतान दौलत खान के मोदीखाने में लगवा दी थी.
इतिहास यह भी है कि गुरु साहेब बीबी नानकी के याद करने पर आये और इसी जगह फुल्का छका था. इस गुरुद्वारे के अंदर एक अजायबघर भी है, जहां तस्वीरों के माध्यम से गुरु लीला को दर्शाया गया है. साथ ही बीबी नानकी का प्रचीन कुआं भी है, जहां से वह पानी भरा करती थीं. आज भी साध संगत इस कुएं के पानी को पीकर खुद को धन्य समझते हैं.
गुरुद्वारा श्री बेर साहिब : गुरुद्वारा श्री बेर साहिब पवित्र काली वई के किनारे है. काली वई में प्रतिदिन स्नान करने के बाद गुरु साहेब यहीं साधना करते थे. यहीं भोरा साहेब हैं, जहां गुरु नानक देव जी ने साधना की. यहां एक विशाल बेरी है. कहा जाता है कि गुरु नानक देव जी ने दातुन करके इसे लगाया था. वही दातुन आज बेर के एक विशाल वृक्ष का रूप धारण किये हुए है, इसलिए इस गुरुद्वारे को 'गुरुद्वारा श्री बेर साहिब' कहा जाता है.
अंतरजामता गुरुद्वारा साहिब : इस गुरुद्वारे के बारे में इतिहास है कि यहां पर गुरु नानक देव जी ने काजी और नवाब दौलत खान के साथ नमाज अदा की थी. नमाज के दौरान काजी और नवाब का मन कहीं और था.
उनके मन की बातें अंतर्यामी गुरु नानक देव जी ने पढ़ ली और उन्हें बताया कि नमाज के समय तुम्हारा मन अपने घर में और काबुल के घोड़ों में था. गुरु साहेब ने उन्हें नमाज का महत्व बताया था. अंतर्यामी गुरु नानक देव जी ने अंतरात्मा की बात पढ़ी थी,इसलिए इस गुरुद्वारे का नाम गुरु अंतरजामता गुरुद्वारा पड़ा. आज भी इस गुरुद्वारे में नमाज पढ़ी जाती है.
गुरुद्वारा श्री हट साहब : यह वो जगह है जहां गुरु नानक देव जी मोदीखाने में नौकरी के दौरान हट चलाया करते थे. यहीं उन्होंने ज़रूरतमंदों और फकीरों को मुफ्त में 13 -13 तोल के अनाज बांटा था. लोगों ने सुल्तान के पास शिकायत की कि गुरु नानक देव जी तो मोदीखाने का सारा अनाज लुटा दे रहे हैं. आज भी इस गुरुद्वारे में सेर, सवा सेर के बटखरे दर्शनार्थियों के दर्शन के लिए मौजूद हैं.
गुरुद्वारा श्री संत घाट : यह वही गुरुद्वारा है, जहां पर गुरु नानक देव जी ने काली वई में डुबकी लगाई और बाहर नहीं निकले. लोगों ने बीबी नानकी को कहा कि गुरु साहेब डूब गये. बीबी नानकी ने कहा- मेरा वीर तो डूबे को तारण आया है, वह डूब नहीं सकता.सच में तीन दिनों बाद गुरु नानक देव जी प्रकट हुए थे और मूल मंत्र का उच्चारण किया था. इसी जगह संत घाट गुरुद्वारा है.
गुरुद्वारा श्री गुरु का बाग : दूसरा महत्वपूर्ण गुरुद्वारा गुरु का बाग है. बीबी नानकी ने अपने भाई का विवाह बटाला शहर की बीबी सुलखणी से कराया. गुरु का बाग वह स्थान है, जहां गुरु नानक देव जी विवाह के बाद पत्नी माता सुलखनी के साथ रहते थे. उनके दो पुत्र बाबा श्री चंद और बाबा लख्मीचंद का जन्म भी यहीं हुआ था. इस गुरुद्वारे में प्राचीन काल के सिक्के और बर्तन आज भी साध संगत की दर्शन के लिए मौजूद हैं.
गुरुद्वारा श्री कोठरी साहिब : इतिहास है कि जब गुरु नानक जी ने मोदी खाने से लोगों को अनाज मुफ्त में बांटा, तो मोदी खाने के मालिक सुल्तान दौलत खान ने उन्हें तीन दिनों तक यहीं कोठरी में बंद कर दिया. बाद में पैसों के हिसाब-किताब में पाया कि हुकूमत को ही गुरु नानक देव जी के 760 रुपये की देनदारी है. जब सुल्तान, गुरु नानक देव जी को 760 रुपये देने लगे, तो गुरु नानक जी ने पैसे लेने से इंकार कर दिया और उसे गरीबों में बांट देने के लिए कहा.
जगत में झूठी देखी प्रीत
अपने ही सुखसों सब लागे, क्या दारा क्या मीत॥
मेरो मेरो सभी कहत हैं, हित सों बाध्यौ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, यह अचरज की रीत॥
मन मूरख अजहूं नहिं समुझत, सिख दै हारयो नीत।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के गीत॥
एक ओंकार सतिनाम
एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ।
निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि ।।
हुकमी उत्तम नीचु हुकमि लिखित दुखसुख पाई अहि।
इकना हुकमी बक्शीस इकि हुकमी सदा भवाई अहि ॥
सालाही सालाही एती सुरति न पाइया।
नदिआ अते वाह पवहि समुंदि न जाणी अहि ॥
पवणु गुरु पानी पिता माता धरति महतु।
दिवस रात दुई दाई दाइआ खेले सगलु जगतु ॥
अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे।
एक नूर से सब जग उपजया को भले को मंदे।।
अर्थात् सब बंदे ईश्वर के पैदा किये हुए हैं, न तो हिंदू कहलाने वाला रब की निगाह में कबूल है, न मुसलमान कहलाने वाला. रब की निगाह में वही बंदा ऊंचा है जिसका अमल नेक हो, जिसका आचरण सच्चा हो.
करमी आवै कपड़ा नदरी मोखु दुआरू।
नानक एवै जाणीऐ सभु आपे सचिआरू।।
अर्थात् अच्छे बुरे कर्मों से यह शरीर बदल जाता है, मुक्ति तो केवल प्रभु कृपा से संभव है.
हरि बिनु तेरो को न सहाई
काकी मात-पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कुछ संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दीन दयाल सदा दु:ख-भंजन, ता सिउ रुचि न बढाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ, ज्यों सुपना रैनाई॥
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