जॉर्ज फर्नांडिस स्मृति-शेष : सड़क से संसद तक संघर्ष करनेवाले समाजवादी नायक

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Jan 2019 5:46 AM

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डॉ सुनीलम राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम कल सुबह जॉर्ज साहब की पारिवारिक मित्र पत्रकार रुचिरा गुप्ता जी का फोन आया, पूछा जॉर्ज साहब की तबीयत ज्यादा खराब है क्या? मैंने कहा, पता लगाता हूं. तभी पंजाब के मोगा से अजय सूद जी का फोन आया, उन्होंने बताया कि मुंबई टैक्सी मैन यूनियन के नेता फ्रेड्डी […]

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डॉ सुनीलम

राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम

कल सुबह जॉर्ज साहब की पारिवारिक मित्र पत्रकार रुचिरा गुप्ता जी का फोन आया, पूछा जॉर्ज साहब की तबीयत ज्यादा खराब है क्या? मैंने कहा, पता लगाता हूं.

तभी पंजाब के मोगा से अजय सूद जी का फोन आया, उन्होंने बताया कि मुंबई टैक्सी मैन यूनियन के नेता फ्रेड्डी ने उन्हें बताया है कि जॉर्ज साहब का देहांत हो गया है. मुझे भरोसा नहीं हुआ, उनकी पत्नी लैला फर्नांडिस जी को फोन लगाया, लेकिन कोई खबर नहीं मिली. सो निकटस्थ सहयोगी जया जी को फोन लगाया, तो उन्होंने बताया कि वे लैला जी के साथ हैं और उनका देहांत हो गया है.

जॉर्ज साहब का जन्म मंगलौर (कर्नाटक) में हुआ था. पिता जी उन्हें पादरी बनाना चाहते थे, परंतु समाजवादियों के संपर्क में आने, विशेष तौर पर श्रमिक नेता पी डिमैलो से मिलने के बाद वे मुंबई आ गये और ट्रेड यूनियन से जुड़ गये. यहां कार्यालय के बेंच पर सोकर कई वर्ष गुजारे. जब वकील रंजीत भानु से मुलाकात हुई तो यूनियन के कार्यालय की जगह एक कमरा रहने को मिल गया. यहां रहते हुए होटल के बैरों व गुमटीवालों को संगठित किया और शक्तिशाली मजदूर संगठन बनाया.

इसके अलावा उन्होंने म्युनिसिपल यूनियन गठित की, टैक्सी मैन यूनियन बनायी, श्रमिकों का सहकारी बैंक की बुनियाद डाली. इस प्रकार समाजवादी आंदोलन के बड़े नेताओं से उनका संपर्क हो गया. कांग्रेस के कद्दावर नेता एसके पाटिल को हराकर मुंबई से सांसद बने. उन्हें जायंट किलर कहा जाने लगा. वे सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष भी रहे. उन्होंने डॉ लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद के विचार को मूर्त रूप दिया.

वे हिंद मजदूर किसान पंचायत और हिंद मजदूर सभा के अध्यक्ष भी रहे. उनके ही नेतृत्व में देश में ऐतिहासिक रेल हड़ताल हुई. जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगायी तो जॉर्ज फर्नांडिस ने भूमिगत रहकर इसका विरोध किया. वे पकड़े गये. पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया गया. उन पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर उन्हें डाइनामाइट कांड में फंसाने की कोशिश भी हुई. इसके बाद जेल में रहते हुए ही वे मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़े और जीते.

जनता पार्टी बनाने के लिए वे सोशलिस्ट पार्टी के विलय को तैयार नहीं थे, लेकिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के आदेश पर पार्टी का विलय हो गया, जिसका पश्चाताप जीवनभर उन्हें रहा. इसी कारण बाद में उन्होंने 14 सांसदों के साथ समता पार्टी बनायी.

जनता पार्टी सरकार में वे उद्योग मंत्री बनाये गये. इस दौरान उन्होंने कोका कोला और आईबीएम जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश से निकाल बाहर किया व जिला उद्योग केंद्र बनाकर छोटे उद्योगों में नयी जान फूंकी. संसद में जब अविश्वास प्रस्ताव आया, तब उन्होंने सरकार का बचाव किया. बाद में मधु लिमये एवं अन्य समाजवादियों के सुझाव पर इस्तीफा दे दिया. जनता दल के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. वे रक्षा मंत्री बनाये गये.

जब मंदिर-मस्जिद विवाद खड़ा हुआ, तब जॉर्ज साहब मुसलमानों के साथ वैसे ही खड़े रहे, जैसे वे सिखों के साथ आॅपरेशन ब्लू स्टार के बाद खड़े रहे थे. वे वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के प्रखर विरोधी रहे.

समता पार्टी बनाकर बिहार में लालू यादव का विकल्प खड़ा किया और नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति में स्थापित किया, उन्हें मुख्यमंत्री बनाया. उनके बिना एनडीए गठबंधन बन ही नहीं सकता था, वे इस गठबंधन की रीढ़ थे. इस तरह वे जीवनभर गैर-कांग्रेसवाद के झंडाबरदार बने रहे. भले ही उन्होंने सबसे अधिक बिहार का प्रतिनिधित्व किया हो, लेकिन वे देश के नेता थे.

जॉर्ज साहब से मैंने संघर्ष के तौर-तरीके सीखे. वे मानते थे कि संघर्ष के लिए संख्या महत्वहीन होती है. जब उन्होंने चार लोगों के साथ जंतर-मंतर पर राष्ट्रमंडल खेलों के विरोध में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी थी, तब मैं भी उनके साथ था. उनकी मौत से अंतरराष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन को अपूरणीय क्षति हुई है. जॉर्ज साहब का संघर्ष आनेवाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा.

जॉर्ज फर्नांडिस द्वारा लिखित पुस्तकें व संपादित पत्रिकाएं

पुस्तकें

व्हाट एल्स द सोशलिस्ट्स (1972)

सोशलिस्ट कम्युनिस्ट इंटरैक्शन इन इंडिया (1981)

इन द ईयर ऑफ डिसेबल्ड: इंडियाज डिसेबल्ड गवर्नमेंट (1981)

डिग्निटी फॉर आल (1991)

जॉर्ज फर्नांडिस स्पीक्स (1991)

पत्रिकाएं

कोंकणी युवक (कोंकणी) (1949)

रैथवानी वीकली (कन्नड़) (1949)

द डॉकमैन (अंग्रेजी) (1952-53)

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