प्रभात खबर के 34 वर्ष पर विशेष : हमें माफ किया जाये, रेत को रेत कहने दिया जाये
Updated at : 14 Aug 2018 7:03 AM (IST)
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संजय रांची : मौजूदा समय पत्रकारिता से ज्यादा पत्रकार पर संकट का है. खुले बाजार में वही अपने उस उत्पाद का एजेंट है, जिसे मीडिया कहा जाता है. सेलिंग व प्रमोशनल एजेंट दोनों. जो खबरें लाने के साथ-साथ संबंधित मीडिया हाउस की अस्मिता व पहचान बना फिरता है. गांव, समाज व सरकार के सूचना दाता […]
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संजय
रांची : मौजूदा समय पत्रकारिता से ज्यादा पत्रकार पर संकट का है. खुले बाजार में वही अपने उस उत्पाद का एजेंट है, जिसे मीडिया कहा जाता है. सेलिंग व प्रमोशनल एजेंट दोनों. जो खबरें लाने के साथ-साथ संबंधित मीडिया हाउस की अस्मिता व पहचान बना फिरता है. गांव, समाज व सरकार के सूचना दाता इसे दो अौर दो बताते हैं. वह इसे जोड़ कर चार बनाता है. पर कई बार यह साढ़े तीन या पांच छपता-दिखता है. एेसे में यह कहना कि हमें माफ किया जाये तथा जल को जल व रेत को रेत कहने दिया जाये, भी बेअदबी मानी जाती है. दरअसल इस लुंपेन मीडिया संस्कृति के जनक घर के बाहर हैं अौर घर के भीतर भी. बाहर किसी को सत्ता बचानी है, किसी को अपने कुकर्म छिपाने हैं.
वहीं भीतर पत्रकारिता, ठेकेदारी व व्यवसाय साथ-साथ चलने की समस्या है. पर इस अंधकार में भी पत्रकारिता का मूल जिंदा है, तो इसका श्रेय पत्रकार को ही जाता है. एक बात तय है कि इस पेशे में अब भी धारदार सिपाहियों की कमी नहीं है. बाहर जिनका काम गवर्नेंस चलाना है, वैसे लोग अखबार चलाने की कोशिश कर रहे हैं. कमी तो अंदर भी है. तरह-तरह के धंधेबाज अब मीडिया लाइन में हैं. कोई तिजोरी भरने व धंधे बचाने में लगा है, तो कोई ब्रजेश ठाकुर टाइप संस्कृति के मजे मार रहा है.
इनका देश-समाज हित, लोगों की फजीहत व सच्ची खबरों से कोई वास्ता भला होगा कहां? अब इसमें ठाकुर साहब के विभिन्न अखबारों के संवाददाताअों की क्या खता? जिन्हें अाज लोकलाज का भय सताता होगा. तो संकट दरअसल अंदर वाला ज्यादा गहरा है. कमजोर व डरपोक लोग कुछ अौर कर लें, मीडिया से न जुड़ें. मीडिया कर्मी धनाढ्य व बड़ा बनने की फिराक में रहेंगे, तो लोकतंत्र का यह स्तंभ चरमरायेगा ही. अवसरवादियों के साथ नातेदारी, रिश्तेदारी व पहचान से टैबूज (निषिद्ध क्षेत्र या लोग, जिनके बारे लिखना-दिखाना मुश्किल हो) बनते हैं.
इससे अाम लोगों के साथ न्याय करने के बजाय सिपाही व कमांडर दोनों रिश्तेदारी निभाने में लग जाते हैं तथा नुकसान लोकतंत्र, पाठकों व दर्शकों का होता है. घोड़ा घास से दोस्ती करे, तो खायेगा क्या? हमसे निर्विकार रह कर खबरें लिखने-दिखाने की अपेक्षा की जाती है.
हम खींसे निपोरने के लिए नहीं हैं. समाज के कुछ अंग भी मीडिया संकट को जाने-अनजाने गहरा रहे हैं. खुद के अौर परिवार के फोटो छपाने के अवसर ढ़ूंढ़ते ऐसे लोग बहुजन व सर्वहारा के हिस्से की भी जगह ले लेते हैं. पर अभी हालात सुधरते नहीं लगते किसी सूरत. इंतजार करें व दुआ भी कि बाहर वालों में निंदक नियरे राखिये….का भाव आये तथा अंदर वालों को मौला थोड़ी समझ दें व साहस भी.
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