क्या बैंक निजीकरण से निकल सकती है राह

तेजी से बढ़ती किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए फंडिंग की सुनिश्चित आपूर्ति एक अच्छी वृद्धि दर के लिए पहली जरूरत होती है. भारत में यह कार्य हमेशा से बैंकों ने किया है. इसके लिए दो शर्तें होती हैं: पहली, देश में अच्छी घरेलू बचत दर और जमाकर्ताओं का बैंकों में भरोसा, और दूसरी, बैंकों का […]
तेजी से बढ़ती किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए फंडिंग की सुनिश्चित आपूर्ति एक अच्छी वृद्धि दर के लिए पहली जरूरत होती है. भारत में यह कार्य हमेशा से बैंकों ने किया है. इसके लिए दो शर्तें होती हैं: पहली, देश में अच्छी घरेलू बचत दर और जमाकर्ताओं का बैंकों में भरोसा, और दूसरी, बैंकों का जोखिम-प्रबंधन अच्छा रखते हुए लाभप्रद बने रहना.
दुर्भाग्यवश, अनेक जटिल कारणों से 2018 में भारतीय बैंकिंग व्यवस्था- जिसमें सरकारी बैंक तीन-चौथाई हिस्सेदार हैं- पूरी तरह एनपीए के बोझ तले चरमरा चुकी है. लगातार विवाद बना हुआ है कि क्या संपूर्ण व्यवस्था का निजीकरण कर दिया जाए? नीति आयोग के भूतपूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने मजबूत तर्क देते हुए हाल ही में कहा कि शायद एसबीआई को छोड़कर सभी सरकारी बैंकों को तुरंत निजीकरण हेतु बाजार में उतार देना चाहिए. ऐसी स्थिति में विविध सामाजिक क्षेत्र पहलों का क्या होगा, इस सवाल पर अरविंद कहते हैं कि विनियमन से सब संभव हो जायेगा.
निजीकरण की कठिन राह
सबसे पहली तकलीफ है बैंकों की जर्जर बैलेंस शीट. किसी भी निजी क्षेत्र निवेशक के लिए यह सबसे बड़ी समस्या होगी. तो प्रथम दृष्ट्या ही बैंकों को सबसे पहले दिवालियापन संहिता के तहत चल रहे मामलों को निबटाना होगा एवं अन्य तरीकों से डूबे हुए खातों की रिकवरी करनी होगी. साल 2017 में यह उम्मीद थी कि आईबीसी कानून के तहत शीघ्र ही एनपीए निबटान होता दिखेगा, लेकिन वैसा नहीं हो रहा है. दूसरी बड़ी समस्या है बैंकों की आंतरिक रूप से कमजोर, और कुछ मामलों में तो पूर्णतः ध्वस्त, प्रबंधन प्रणाली. पीएनबी महाघोटाले ने इस भ्रम से भी पर्दा उठा दिया कि भारतीय सरकारी बैंकों को तुरंत ठीक किया जा सकता है. जब अनेक ऑडिट के बावजूद 13,000 करोड़ रुपये का घोटाला सात सालों तक चल सकता है, तो कोई जादू की छड़ी रातोंरात व्यवस्था को ठीक नहीं कर सकेगी.
बेचने निकलेंगे तो भी…
हड़बडाहट में सरकारी बैंकों को यदि आज बेचा गया, तो न केवल बेहद खराब मूल्य प्राप्त होगा वरन रातोंरात अनेक सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं, जिनके लिए सरकारी बैंक रीढ़ की हड्डी हैं, बुरी तरह से लड़खड़ा जायेंगी. तो व्यावहारिक रूप से यदि यह तर्क मान भी लिया जाये कि निजीकरण ही एक मात्र समाधान है, तो भी उस स्थिति में आते-आते दो से तीन वर्ष लग जायेंगे.
भारत की विशिष्ट जरूरतें
भारत में जहां 80 करोड़ से अधिक लोगों को विभिन्न सरकारी सामाजिक योजनाओं से लाभान्वित करना सामाजिक स्थायित्व हेतु आवश्यक है, संपूर्ण निजीकरण विनाशकारी हो सकता है. ऐसा इसलिए कि निजी बैंक बेहद कम आय वर्ग के लोगों हेतु अकाउंट खोलने एवं चलाते रहने के लिए कभी रुचि नहीं लेंगे, भले ही पनगढ़िया यह कहें कि 2019 में सरकार बनाने का दावा करनेवाली गंभीर पार्टियां अपने मसौदे में सरकारी बैंकों के निजीकरण को शामिल करें. उस प्रक्रिया मात्र से पैदा होनेवाली उथल-पुथल भूचाल ला सकती है.
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