इस बार माघ में नहीं गूंजेगी शहनाई... जानिए क्यों
Updated at : 02 Dec 2017 7:47 AM (IST)
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मार्कण्डेय शारदेय (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ) माघे धनवती कन्या’अर्थात् माघ में कन्या का विवाह उसके ससुराल के लिए समृद्धि-कारक माना गया है, परंतु जहां हर साल मकर संक्रांति के बाद से लगन की भरमार रहती थी, मुहल्ले-टोले, गांव-नगर शादी-ब्याह के कारण गुलजार रहते थे, वहीं इस बार माहौल सूना-सूना रहेगा. यह माह लगन से वंचित […]
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मार्कण्डेय शारदेय (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)
माघे धनवती कन्या’अर्थात् माघ में कन्या का विवाह उसके ससुराल के लिए समृद्धि-कारक माना गया है, परंतु जहां हर साल मकर संक्रांति के बाद से लगन की भरमार रहती थी, मुहल्ले-टोले, गांव-नगर शादी-ब्याह के कारण गुलजार रहते थे, वहीं इस बार माहौल सूना-सूना रहेगा. यह माह लगन से वंचित ही रह जायेगा.
आखिर ऐसा क्यों? दरअसल, मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार विवाह-मुहूर्त उत्तरायण के मकर, कुंभ, मेष, वृष एवं मिथुन तथा दक्षिणायन के वृश्चिक राशिगत सूर्य में, तदनुसार माघ, फागुन वैशाख, जेठ, आषाढ़ और अगहन, इन चंद्रमासों में ही अच्छा माना गया है. उक्त सूर्य राशियों के कारण ही कार्तिक (देवोत्थान एकादशी के बाद), पूस, चैत में भी अविहित होने पर भी कभी-कभी विवाह विहित होता है. हमारे यहां मलमास, खरमास तथा गुरु एवं शुक्र के अस्त रहने पर विवाह नहीं होता. इसी कारण उपर्युक्त सूर्य-चंद्रमासों में भी कभी-कभी लगन नहीं रहता.
वाराणसेय परंपरा के अनुसार मृत्युलोक की भद्रा तथा मृत्युबाण में विवाह मंगलकारी नहीं माना जाता, परंतु मिथिला में ऐसी मान्यता नहीं है. इसी तरह रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढा, उत्तरा भाद्रपदा एवं रेवती- ये ही विवाह-विहित चान्द्र नक्षत्र हैं, तो मिथिला में पास्कर गृह्यसूत्रोक्त ‘त्रिषु त्रिषु उत्तरादिषु’ के अनुसार इनके अतिरिक्त अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा- ये चार नक्षत्र भी विवाहार्थ मान्य हैं.
अब यदि जनवरी या माघ में लगन न होने की बात करें, तो 14 जनवरी को ही सूर्य का धनु राशि से मकर में प्रवेश हो रहा है, अर्थात् इस दिन से उत्तरायण होने से शुभ कार्यों का प्रारंभ हो जाना चाहिए. कहा भी गया है –
‘गृहप्रवेश-त्रिदश-प्रतिष्ठा – विवाह चौल-व्रतबन्ध-दीक्षा।
सौम्यायने कर्म शुभं विधेयं यद् गर्हितं तत् खलु दक्षिणे च’।।
आशय यह कि उत्तरायण सूर्य में हप्रवेश, देवप्रतिष्ठा, विवाह, मुण्डन, जनेऊ आदि शुभ कर्म होते हैं, पर इस बार ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है? इसका कारण शुक्रास्त है. इस बार 14-12-2017 से 03-02-2018 तक शुक्र ग्रह अस्त रहेगा. पुनः 03 फरवरी से 07 फरवरी की सुबह 5:30 तक बाल्यावस्था में रहेगा. शास्त्रीय नियमानुसार गुरु और शुक्र के अस्त रहने पर इनकी बाल्यावस्था तथा वृद्धावस्था में विवाह वर्जित है. महर्षि देवल का भी कथन है कि शुक्र के बाल्य-वृद्ध अवस्थाओं में व अस्त होने पर कन्या का विवाह नवदंपती का नाशक है –
बाले वृद्धे तथैवास्ते कुरुते दैत्य-मन्त्रिणि।
उद्वाहितायां कन्यायां दम्पत्योरेव नाशनम्।।
अब यदि शास्त्रकार ऐसी उद्घोषणा करेंगे, तो ऐसे कुसमय में शादी? हम तो उनके खुशहाल दाम्पत्य के लिए हर काम सोच-विचारकर करते हैं, शुभ शकुनों का ख्याल कर एक-एक वैवाहिक विधियां अपनाते हैं, तो भला वर-वधू के नाशक, वैधव्य-कारक व संतान-हानि देनेवाले समय में गठजोड़ कैसे कर सकते हैं? फिर माघ (जनवरी) न सही, फागुन (फरवरी) में तो लगन है ही. चैत में भी मीन संक्रान्ति (चैती खरमास) के पहले तक कुछ वैवाहिक मुहूर्त हैं. 2018 में आगे भी मुहूर्तों की कमी नहीं.
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