वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ : बनना चाहते थे गायक, बन गये लेखक

Published at :17 Nov 2017 8:03 AM (IST)
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वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ : बनना चाहते थे गायक, बन गये लेखक

महादेव टोप्पो इसी हफ्ते झारखंड के प्रमुख साहित्यकार ‘वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ मुजफ्फरपुर में ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान-2017’ से सम्मानित हुए हैं. पुरस्कार समिति ने वाल्टर भेंगरा तरुण लिखित तीन किताबों को महत्वपूर्ण माना जिनमें दो कहानी संग्रह – ‘अपना अपना युद्ध’ और ‘जंगल की ललकार’ तथा उपन्यास ‘लौटते हुए’ शामिल है. त्रण है. इन […]

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महादेव टोप्पो

इसी हफ्ते झारखंड के प्रमुख साहित्यकार ‘वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ मुजफ्फरपुर में ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान-2017’ से सम्मानित हुए हैं. पुरस्कार समिति ने वाल्टर भेंगरा तरुण लिखित तीन किताबों को महत्वपूर्ण माना जिनमें दो कहानी संग्रह – ‘अपना अपना युद्ध’ और ‘जंगल की ललकार’ तथा उपन्यास ‘लौटते हुए’ शामिल है. त्रण है.

इन रचनाओं में आदिवासी पात्र अपनी कमजोरियों एवं ताकत के साथ उपस्थित हैं. ‘लौटते हुए’ उपन्यास के बारे में डॉ वीर भारत तलवार ने कहा कि – “हिंदी में लिखा गया यह ऐसा पहला उपन्यास है, जहां झारखंड से दिल्ली दाई, आया के काम करने लाई गई युवतियों की संघर्ष की दारुण कथा है. उपन्यास में उनकी तकलीफों और संघर्ष को सजीव ढंग से चित्रित किया गया है.

वाल्टर भेंगरा बचपन में एक गायक बनना चाहते थे. लेकिन, संगीत सीखने के लिए मासिक शुल्क दस रुपये देने के लिए अभिभावक सक्षम नहीं थे. फलतः, निराश होकर वे लेखन की ओर आकर्षित हुए. वाल्टर जी का जन्म 10 मई 1947 अमृतपुर, खूंटी में हुआ. बचपन में पिताजी का साया सिर से उठ गया था अतः, पढ़ाई जारी रखने में कई बार बाधाएं आयीं और स्कूल जाने का सिलसिला भी टूटा. फिर भी वह वर्ष 1970 में संत जेवियर कॉलेज रांची से बीए की परीक्षा पास करने में सफल रहे और 1972 में दिल्ली से पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पूरा किया. तत्पश्चात वह पटना आये और यहां ‘कृतसंकल्प’ मासिक का आठ साल तक संपादन किया और अनेक नवोदित लेखकों को उभरने का अवसर दिया.

इनमें से कई, आज हिंदी के प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार हैं. प्रबंधन द्वारा ‘कृतसंकल्प’ बंद किये जाने के बाद वे रांची आये और यहां से ‘जग ज्योति’ पाक्षिक पत्र का प्रकाशन, संपादन किया. इस बीच उनका चयन दूरदर्शन में संवाददाता के रूप में हुआ और उन्होंने कोलकाता, जयपुर, रांची आदि शहरों में रहकर काम किया. उन्हें पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा के साथ विदेश यात्रा करने अवसर मिला और उन्होंने विदेश से कई प्रभावशाली रिपोर्ट प्रस्तुत की. इन रिपोर्टों को कई विशेषज्ञों ने सराहा.

वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ की पहली कहानी 4 अगस्त 1963 को ‘साप्ताहिक संजीवन’ में ‘वह कौन थी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी. तब से अब तक उनके लगभग दर्जन भर उपन्यास और कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इसमें एक पुस्तक युवाओं के लिए रोजगार से संबंधित है. इसके अतिरिक्त वे महत्वपूर्ण अनुवाद का काम भी कर चुके हैं.

इन दिनों क्या कर रहे हैं? प्रश्न के जबाव में उन्होंने बताया कि वह अपने अगली उपन्यास एवं कहानी संग्रह को अंतिम रूप दे रहे हैं. साथ ही उन्होंने दुख प्रकट करते कहा कि वह अपनी कहानियों को मातृभाषा मुंडारी में प्रकाशित नहीं करा सके हैं. डॉ रामदयाल मुंडा इसके लिए बार-बार जोर देते रहते थे और हर मुलाकात में इसके बारे पूछा करते थे.

दूरदर्शन से सेवानिवृत्ति के बाद वे संत जेवियर कॉलेज रांची में पत्रकारिता एवं वीडियो प्रशिक्षण विभाग में विभागाध्यक्ष के रूप में पांच साल काम किया और अब वहां से मुक्त होकर अपने गांव अमृतपुर खूंटी में पत्नी ‘ललिता अलफोन्सा’ के साथ कृषि-कार्य एवं लेखन कार्य में समय बिता रहे हैं.

झारखंड आंदोलन से जुड़े विद्वान वीर भारत तलवार ‘आदिवासी साहित्य’ को भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी देन मानते हैं. साथ ही उनका मानना है कि भारत के ‘आदिवासी साहित्य’ समझे बगैर संपूर्ण भारत को समझना कठिन है. इसलिए वाल्टर भेंगरा जैसे और भी अन्य आदिवासी लेखकों को समझने का प्रयास होना चाहिए.

निश्चय ही इस पुरस्कार से आदिवासी साहित्य को प्रोत्साहन मिलेगा और अब तक उपेक्षित, वंचित, प्रताड़ित समुदायों की आवाजें और सुनी एवं समझी जा सकेंगी. अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान समिति के डॉ वीरेन नंदा, रविकुमार रवि आदि का यह कार्य इसलिए सराहनीय है क्योंकि यह पुरस्कार किसी से अनुदान या अन्य सहायता नहीं लेता है.

आदिवासी एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ गिरिधारी राम गौंझू ने इस पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए बताया कि लिखने के आरंभिक दिनों में वाल्टर जी ने उनकी अनेक रचनाओं को कृतसंकल्प में प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहित किया था. गिरिधारी राम गौंझू जैसे अनेक रचनाकार कृतज्ञ हैं कि पहले-पहल उन्हें वाल्टर भेंगरा ने अपने मासिक पत्र ‘कृतसंकल्प’ में स्थान दिया. अतः वे एक समर्थ रचनाकार के अलावा प्रतिभाखोजी एक कुशल संपादक भी रहे जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी को फलने-फूलने का मौका भी दिया.

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