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छठ के मूल सत्व को बचाएं घाट पर जाएं

Updated at : 26 Oct 2017 6:16 AM (IST)
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छठ के मूल सत्व को बचाएं घाट पर जाएं

राजेश कुमार सच कहिए तो छठ मेरे लिए एक सबक की तरह रहा है. बचपन में मैं जब घाट पर जाता था, तो यह बात मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती थी कि लोग डूबते सूर्य को अर्घ दे रहे हैं. यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि व्यवहारगत हकीकत है कि लोग (और समाज भी) उगते हुए […]

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राजेश कुमार
सच कहिए तो छठ मेरे लिए एक सबक की तरह रहा है. बचपन में मैं जब घाट पर जाता था, तो यह बात मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती थी कि लोग डूबते सूर्य को अर्घ दे रहे हैं. यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि व्यवहारगत हकीकत है कि लोग (और समाज भी) उगते हुए को ही सलाम करते हैं. छठ इस मामले में हमारे व्यावहारिक सोच को भी बदलने पर मजबूर करता है.
छठ में हमउगते सूर्य की वंदना बाद में करते हैं, पहले अस्ताचलगामी सूर्य के प्रति उतनी ही विनम्रता और श्रद्धा के साथ शीश झुकाते हैं सामूहिकता का उत्सव : छठ हमें सीख देता है कि प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए. हवा, पानी, नदी, तालाब, पेड़-पौधे और ऊर्जा के अनंत स्रोत सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना छठ का सार तत्व है. यह सच भी है कि प्रकृति में ये सब चीजें न हों, तो आदमी का अस्तित्व नहीं रहेगा. लेकिन, आज का मनुष्य क्या कर रहा है? रास्ता भटके समाज को छठ के गीत याद दिलाते हैं कि हमें कैसा होना चाहिए. हम व्यक्ति और प्रकृति, सबका सम्मान करें.
किसी भी तरह का भेदभाव न होने दें. छठ के गीत तो क्रांति गीत की तरह लगते हैं. समाज के एक-एक वर्ग के प्रतिनिधित्व को यह सामूहिक उत्सव में बदल देता है. यही छठ की ताकत है.
आप देखेंगे कि नदी घाटों पर हजारों (कहीं-कहीं लाखों) की भीड़ जुटती है, फिर भी सब कुछ शांति और प्रेम से संपन्न हो जाता है. इसलिए कि छठ एक ऐसा फेस्टिवल है, जिसमें सभी दूसरे की मदद के लिए आगे रहते हैं. हजारों-लाखों लोग साथ में खड़े होते हैं, और सबका राग, ताल, सुर एक सा होता है. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है. यह त्योहार प्रकृति से गहरे जुड़ा हुआ है.अर्घ में चढ़नेवाले फूल-फल इस बात के गवाह हैं. फूल-फल ही नहीं, संगीत की परंपरा भी इसे खास बनाती है.
वक्त के साथ बदलाव : छठ सामूहिकता का पर्व रहा है, लेकिन बदलते वक्त के साथ इसमें कुछ बदलाव भी आ रहा है. हमलोग सेल्फ सेंटर्ड हो रहे हैं. हमारे परिवार अब एकल हो गये हैं. इसका असर अब छठ पूजा पर भी दिख रहा है. मेरे बचपन के दिनों में इक्का-दुक्का लोग ही घर में छठ करते थे. अब तो घर में ही अर्घ देने का चलन बढ़ रहा है. कोई स्विमिंग पूल में, कोई छत पर, तो कोई घर में ही प्लास्टिक के टब में पानी भर कर अर्घ दे रहा है. इस नये चलन ने कहीं-न-कहीं छठ पूजा के असल मायनों को कम किया है.
आप देखेंगे, पहले महिलाओं का बड़ा सा ग्रुप छठ पूजा के लोकगीत को सामूहिक स्वर में गाता था. इससे छठ पूजा की खास किस्म की गरिमा का एहसास होता था. आज की पीढ़ी की महिलाएं अपने लोकगीतों से अनजान हो गयी हैं. अब तो छठ पूजा के पारंपरिक गीतों के बजाय छठ के डीजे वाले गीत भी बजने लगे हैं.
बदलाव तो हर दौर में लाजिमी है, पर जरूरी है कि उसका मूल अर्थ न खोने पाये.गंगा घाट की रौनक कम हुई है : अनदेखी की वजह से गंगा के पानी का स्तर कम होता गया है, जिससे वह रौनक चली गयी है, जो आज से 15-20 साल पहले सुबह घाट पर अर्घ देते हुए दिखती थी. उगते सूर्य की लालिमा जब पानी पर पड़ती थी, तो सबकुछ केसरिया रंग में नजर आता था. अब तो एक खास एंगल में खड़े होने पर ही सूरज की वो लालिमा पानी पर दिखती है. अभी भी वक्त है, हमें गंगाजी को बचाने और गंगा घाट पर अर्घ देने के चलन को समृद्ध करने के उपाय तलाशने होंगे, तभी छठ पर्व का महत्व बना रहेगा.
(पटना निवासी राजेश कुमार कई लोकप्रिय टीवी शो का हिस्सा रह चुके हैं.)
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