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मस्तिष्क में नये प्रकार की कोशिकाओं की पहचान से समय रहते पता चलेगी दिमागी बीमारी!

Updated at : 24 Aug 2017 6:38 AM (IST)
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मस्तिष्क में नये प्रकार की कोशिकाओं की पहचान से समय रहते पता चलेगी दिमागी बीमारी!

मेडिकल वैज्ञानिकों ने इनसान के मस्तिष्क में नये प्रकार की कोशिकाओं की खोज की है, जिससे ब्रेन मैपिंग की प्रक्रिया को अब नये सिरे से अंजाम दिया जा सकता है. इससे वैज्ञानिकों को मस्तिष्क का व्यापक अध्ययन करने और विविध विकृतियों को दूर करने में कामयाबी मिलेगी. दूसरी ओर, माइक्रोमोटर बोट्स का विकास पेट की […]

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मेडिकल वैज्ञानिकों ने इनसान के मस्तिष्क में नये प्रकार की कोशिकाओं की खोज की है, जिससे ब्रेन मैपिंग की प्रक्रिया को अब नये सिरे से अंजाम दिया जा सकता है. इससे वैज्ञानिकों को मस्तिष्क का व्यापक अध्ययन करने और विविध विकृतियों को दूर करने में कामयाबी मिलेगी.
दूसरी ओर, माइक्रोमोटर बोट्स का विकास पेट की जटिल बीमारी वाले मरीजों के लिए एक नयी उम्मीद लेकर आया है, क्योंकि इनके जरिये पेट में दवाओं को सटीक जगह तक पहुंचाया जा सकेगा. साथ ही, इससे अनेक अन्य बीमारियों के इलाज में भी आसानी होगी. मस्तिष्क में नये प्रकार की कोशिकाओं की खोज और उससे होनेवाले असर समेत माइक्रोमोटर बोट्स व इसकी गतिविधियों के बारे में बता रहा है आज का मेडिकल हेल्थ पेज….
वैज्ञानिकों ने न्यूरॉन्स यानी तंत्रिका कोशिकाओं को आण्विक स्तर (मोलेकुलर लेवल) तक वर्गीकृत करने का नया तरीका खोज निकाला है. इससे वैज्ञानिकों को मस्तिष्क में मौजूदा ‘पुर्जों की सूची’ बनाने में मदद मिलेगी, जिससे संभवत: ऐसा इंटरफेस बनाया जा सकता है, जो अपनी कार्यक्षमता में सुधार कर सके. इस पूरे सिस्टम की मैपिंग करने से सटीक तौर पर यह पता लगाया जा सकता है कि इनसान का मस्तिष्क काम किस तरह से करता है, जो शायद इस तथ्य को समझने के लिहाज से एक बड़ा कदम होगा कि मौलिक स्तर पर इनसान के भीतर की संचालन गतिविधियों में किस तरह से बदलाव आता है.
आण्विक स्तर पर विवेकशील मस्तिष्क की गतिविधियां हमें तंत्रिका संबंधी बीमारियों से लड़ने के लिए नयी राह दिखाने और यहां तक कि इनसान की बुद्धिमत्ता को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं. हालांकि, दुनियाभर में अनेक इनोवेटर पहले से ही ऐसी तकनीक विकसित करने में जुटे हैं, जिसे मस्तिष्क से जोड़ कर उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाया जा सके. लेकिन, ऐसी किसी भी तकनीक को विकसित करने से पहले हमें समग्रता से यह जानना होगा कि हमारा मस्तिष्क काम किस तरह से करता है. और हम इस तलाश के बिलकुल करीब पहुंच चुके हैं.
नयी तकनीक से कामयाबी
प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका ‘फ्यूचरिज्म’ में मूल रूप से प्रकाशित आलेख के हवाले से ‘साइंस एलर्ट’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि साक इंस्टिट्यूट और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो के शोधकर्ताओं की टीम ने हाल ही में यह घोषणा की है कि उन्होंने इस मामले में बड़ी कामयाबी हासिल की है. अपेक्षाकृत नयी तकनीक के जरिये वैज्ञानिक मस्तिष्क कोशिकाओं के नये प्रकारों को खोजने में सक्षम हुए हैं. न्यूरॉन्स की आण्विक संरचना को अनुक्रमण करने पर जैसा वे माइक्रोस्कोप के भीतर दिखाई देते हैं, उन्हें विविध समूहों में बांटा जा सकता है. ऐसा करने से प्रत्येक समूह की गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.
खास न्यूरॉन्स में आपसी फर्क
जिनोमिक एनालिसिस लैबोरेटरी और होवार्ड ह्यूज मेडिकल इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर व डायरेक्टर जोसेफ एकर कहते हैं, हमें लगता है कि यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि विविध कोशिकाओं को मस्तिष्क में हम अलग कर सकते हैं. साथ ही उनके मिथाइलोम्स की सिक्वेंसिंग और बहुत सी नयी कोशिकाओं की पहचान के साथ उनके जीन रेगुलेटरी एलीमेंट्स और जेनेटिक तथ्य ऐसी चीजें हैं, जो न्यूरॉन्स में एक-दूसरे के बीच का फर्क बताते हैं.
बीमारियों का इलाज
इस शोध से वैज्ञानिकों को प्रत्येक न्यूरॉन्स और उसके कार्यों की समग्र पार्ट्स लिस्ट यानी पुरजों की सूची तैयार करने में मदद मिलेगी. जैसा कि पहले बताया जा चुका है, हासिल किये गये इन तथ्यों से हमें न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का इलाज तलाशने में मदद मिल सकती है. अगले चरण में वैज्ञानिक मस्तिष्क में सेहतमंद और विकृत चीजों के आण्विक फर्क को समझेंगे, ताकि मस्तिष्क की संभावित बीमारी से बचा जा सके. विशेषज्ञों ने इसके सफल होने की पूरी उम्मीद जतायी है़
कोशिका के अस्तित्व की समझ
शोधकर्ता एक बीमारी विशेष के लिए जिम्मेदार कोशिका के सटीक प्रकार को इंगित करने में सक्षम होंगे. इस ज्ञान की सहायता से भविष्य में इस असामान्यता से निबटने की क्षमता हासिल की जा सकती है. ऐसे में इस नयी तकनीक के जरिये खास कोशिका के अस्तित्व में आने के कारणों को सटीक रूप से जाना जा सकेगा.
पेट में सटीक जगह दवा पहुचायेंगे छोटे रोबोट
माइक्रोमोटर बोट्स यानी बेहद छोटे रोबोट के जरिये इनसान के पेट में दवाओं को सटीक जगह तक पहुंचाया जा सकेगा. इससे अल्सर समेत कुछ अन्य बीमारियों के इलाज में भरपूर मदद मिलेगी. आकार में इनसान के बाल की चौड़ाई के आधे इन बोट्स का चूहों के जीवित अंगों में परीक्षण किया गया है.
दरअसल, पेट में मौजूद एसिड पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाओं के असर को कुंद कर देते हैं, लेकिन इस लिहाज से किये गये परीक्षण के दौरान यह दर्शाया गया है कि ये छोटे बोट्स बैक्टीरियल इंफेक्शन तक दवाओं को सटीक तरीके से पहुंचाने में कारगर रहे हैं. अध्ययन करनेवाली यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो की टीम का कहना है कि माइक्रोमोटर एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट से यह साबित हुआ है कि मौजूदा तरीकों के मुकाबले यह ज्यादा प्रभावी है.
पेट में घुलनशील : इस मैथॉड का सबसे स्मार्ट हिस्सा यह है कि इन छोटे बोट्स को गैस्ट्रिक एसिड के जरिये संचालित किया जाता है. इनके मैग्निशियम कोर एसिड से प्रतिक्रिया के दौरान हाइड्रोजन बबल्स पैदा करते हैं, जिससे माइक्रोमोटर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है.
छोटे बैक्टीरिया बस्टर्स को अन्य मैटेरियल के साथ लेपित किया जाता है, ताकि पेट की दीवारों में उन्हें चिपकने से बचाया जा सके. रासायनिक प्रतिक्रिया से न केवल माइक्रोमोटर्स को आगे बढ़ने की ताकत मिलती है, बल्कि यह पेट में एसिडिटी को भी कम करता है.
बोट्स पर लगाये गये एंटीबायोटिक परत एसिड के प्रति संवेदनशील होते हैं. तब पेट में पीएच का स्तर 24 घंटे में सामान्य हो जाता है और बिना कोई हानिकारक अपशिष्ट छोड़े हुए बायोडिग्रेडेबल माइक्रोमोटर्स भीतर में ही घुलनशील होते हैं.
पारंपरिक दवाओं का साइड इफेक्ट : पेट के अल्सर की पारंपरिक दवाएं मुंह के माध्यम से लेने पर मरीज को अक्सर प्रोटोन पंप इनहिबिटर्स भी लेना होता है, ताकि गैस्ट्रिक एसिड को दबाया जा सके और दवा सटीक तरीके से अपना काम कर सके. इसमें बड़ा जोखिम यह है कि इन इनहिबिटर्स से साइड इफेक्ट के तौर पर सिरदर्द, डायरिया और यहां तक कि डिप्रेशन जैसी बीमारी होने का जोखिम रहता है. ऐसे में ये माइक्रोस्कोपिक रोबोट सेना इस बीमारी के इलाज के लिए बेहतर समाधान साबित हो सकती है.
विशेषज्ञ की राय
दशकों पहले, न्यूरॉन्स को उनके आकार द्वारा पहचाना गया था. अब हम इसे आण्विक नजरिये से समझने की कोशिश में जुटे हैं. कोशिकाओं के बीच मिथाइलेशन प्रोफाइल के मॉडिफिकेशन को देखते हुए यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किस प्रकार की कोशिका सटीक अवस्था में है.
– जोसेफ एकर, प्रोफेसर व डायरेक्टर, जिनोमिक एनालिसिस लैबोरेटरी और होवार्ड ह्यूज मेडिकल इंस्टिट्यूट
इनसान के मस्तिष्क में हजार नहीं, तो सैकड़ों प्रकार की कोशिकाएं होती ही हैं, जिनके विविध कार्य होते हैं और व्यवहार में भिन्नताएं होती हैं. यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन सभी प्रकारों को समझना चाहिए कि मस्तिष्क कैसे काम करता है. यदि कोशिकाओं के सिर्फ एक फीसदी में भी कोई दोष है, तो हमें इसे इस नयी पद्धति से देखने में सक्षम होना चाहिए, ऐसी उम्मीद है़
– चोंगयान लुओ, एसोसिएट,
साक इंस्टिट्यूट
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