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आजादी के 70 साल : सौ साल पुरानी किताब का खौफ आज भी

Updated at : 14 Aug 2017 9:28 AM (IST)
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आजादी के 70 साल : सौ साल पुरानी किताब का खौफ आज भी

शाह आलम इस 15 अगस्त को भारतीय स्वाधीनता के 70 ‌वर्ष पूरे हो जायेंगे. असंख्य कुर्बानियों से हासिल हुई आजादी के असंख्य किस्से अभी भी आम जनों को मालूम नहीं हैं. पहली कड़ी में आज पढ़िए कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के दस्तावेजों की स्थिति के बारे में. भारतीय […]

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शाह आलम
इस 15 अगस्त को भारतीय स्वाधीनता के 70 ‌वर्ष पूरे हो जायेंगे. असंख्य कुर्बानियों से हासिल हुई आजादी के असंख्य किस्से अभी भी आम जनों को मालूम नहीं हैं. पहली कड़ी में आज पढ़िए कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के दस्तावेजों की स्थिति के बारे में.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े गुप्त क्रांतिकारी दल मातृवेदी के दस्तावेज लापता हैं. देश के 127 साल पुराने राष्ट्रीय अभिलेखागार में संरक्षित मातृवेदी दल की प्रेरक पुस्तक ‘अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली’ का जायजा लेने पर उसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी जा रही है. यह वही किताब है, जिसने कभी अंगरेजों की नाक में दम कर दिया था, लेकिन अंगरेजी राज से मुक्ति के 70 वर्ष बाद भी उस पर से पर्दा नहीं उठ पा रहा है. न जाने कौन-सा डर उसके पन्नों में दर्ज है, जिसको लेकर आजाद भारत की सरकारें आज भी डरती हैं. यह किताब गुप्त क्रांतिकारियों से जुड़े दो अहम् दस्तावेजों में शामिल है, जिसे जब्त हुए 2018 में 100 साल पूरे हो जायेंगे. इसे तीन अक्तूबर, 1918 को दिल्ली में जब्त किया गया था. जब्‍ती के आदेश की प्रति, किताब व पकड़े गये क्रांतिकारियों के बयान दो फाइलों में मौजूद थे. ये दो फाइलें तत्कालीन होम डिपार्टमेंट के तहत आनेवाली पॉलिटिकल ब्रांच की 87बी और 3पार्ट-बी हैं. इनका आज कोई अता-पता नहीं है.
‘अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली’ नामक पुस्तक के जरिये नौजवान क्रांतिकारी बनने का ककहरा सीखते थे. इस पुस्तक को रामप्रसाद बिस्मिल के सहयोग से देवनारायण भारतीय ने संकलित करके प्रकाशित कराया था. पुस्तक में सशस्त्र क्रांति के जरिये अंगरेजी शासन को देश से खदेड़ देने की सीख नौजवानों को दी जाती थी. इसकी बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाई तत्कालीन संयुक्त प्रांत (अब यूपी) की सरकार ने इसे 24 सितंबर, 1918 को जब्त कर लिया था. यूपी में जब्ती के बाद गुप्त क्रांतिकारियों ने दिल्ली कांग्रेस के अधिवेशन में इसकी बची हुई प्रतियों का स्टॉल लगाया था. इसकी सूचना मिलते ही दिल्ली में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई और बची प्रतियां भी जब्त कर ली गयीं. बिस्मिल ने व्यापार करने के बहाने अपनी मां से 200 रुपये लेकर मार्च 1918 में यह पुस्तक छपवायी थी. किताब के आवरण पर लिखा था- ‘हे वीर भारतीयों, उठो, अस्त्र उठाओ, अपनी तलवार खोलो और साहस के साथ आगे बढ़ो. विजय प्राप्त करो या युद्ध क्षेत्र पर अपने जीवन का बलिदान करो. विदेशी शासन ही अकाल और भारत की सब आपत्तियों का उत्तरदायी है.’
हुआ यूं कि कालापानी की सजा काटकर आये क्रांतिकारी रामचरण लाल ने जब दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पुलिस को शिवचरण लाल के स्टॉल पर देखा, तो तत्काल पंडाल में जाकर उन्हें सूचना दे दी.
शिवचरण लाल भागते हुए रामप्रसाद बिस्मिल और साथियों को पुलिस की नजरों से बचाने के बाद अपनी दुकान पर पहुंचे और गिरफ्तार कर लिये गये. उनके साथ देवी दयाल, जो उस समय दुकान की देखभाल कर रहे थे, भी गिरफ्तार कर लिये गये. थोड़ी देर बाद सोमदेव दुकान देखने गये और वे भी धर लिये गये. थाने में इन तीनों के बयान लिये गये और किताबें जब्त कर ली गयीं. एक दिसंबर, 1918 को मुखबिर दलपत सिंह ने मैनपुरी के जिलाधिकारी राधारमन के सामने कुछ खुलासा किया, जिसके बाद जगह-जगह तलाशियां ली गयीं और सदस्यों की धर-पकड़ शुरू हो गयी थी. शिवचरण लाल के मातृवेदी नामक संगठन के साथ जुड़े होने के विषय में पुलिस को तब पता चला जब उनके दो पत्र, जो उन्होंने दल के एक अन्य सदस्य कालीचरण को लिखे थे, बरामद हुए.
दिल्ली की जेल से रिहा होने के बाद शिवचरण लाल मैनपुरी पहुंचे थे, जहां मैनपुरी षडयंत्र का मुकदमा चल रहा था. वह अपने साथ ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी से एक पत्र लेकर गये थे, जिसमें उन्‍हें अखबार का वरिष्‍ठ संवाददाता बताया गया था और इस हैसियत से उन्हें मैनपुरी षडयंत्र केस पर रिपोर्ट देने की इजाजत की मांग की गयी थी. सीआइडी का सुपरिटेंडेंट सैंड्स, जो मैनपुरी षडयंत्र की जांच पड़ताल कर रहा था, उसने फौरन शिवचरण लाल की गिरफ्तारी के आदेश दे दिये.
सैंड्स को पता चल गया था कि यह शिवचरण लाल वही हैं, जिनका नाम दिल्ली कांग्रेस में हुई गिरफ्तारी के सिलसिले में उनके पास आया था और इनके नाम के साथ रामप्रसाद बिस्मिल, देव नारायण भारतीय और सोमदेव के नाम भी थे. लिहाजा 25 जनवरी, 1919 को शिवचरण लाल और 28 जनवरी को सोमदेव की गिरफ्तारी हुई. (क्रमश:)
(लेखक भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के जानकार हैं)
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