भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर नहीं हैं : उमर अब्दुल्ला

Updated at : 22 Oct 2016 2:39 PM (IST)
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भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर नहीं  हैं : उमर अब्दुल्ला

न्यूयार्क : जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का मानना है कि नियंत्रण रेखा पर तनाव बढने के बावजूद भारत एवं पाकिस्तान युद्ध के कगार पर नहीं है और दोनों देश युद्ध की आशंका को लेकर उससे ‘‘कहीं अधिक सावधान’ है, जितना कि कुछ समाचार चैनल उन्हें देखना चाहेंगे. अब्दुल्ला ने कल यहां ‘भारत […]

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न्यूयार्क : जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का मानना है कि नियंत्रण रेखा पर तनाव बढने के बावजूद भारत एवं पाकिस्तान युद्ध के कगार पर नहीं है और दोनों देश युद्ध की आशंका को लेकर उससे ‘‘कहीं अधिक सावधान’ है, जितना कि कुछ समाचार चैनल उन्हें देखना चाहेंगे. अब्दुल्ला ने कल यहां ‘भारत एवं पाकिस्तान: एक उपमहाद्वीपीय मामला’ विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में कहा, ‘‘मैं उन लोगों में से नहीं हूं जिनका मानना है कि उप महाद्वीप में जल्द युद्ध होने का खतरा मंडरा रहा है.

मैं यह मानता हूं कि नयी दिल्ली एवं इस्लामाबाद दोनों सरकारें युद्ध की आशंका के बारे में उससे कहीं अधिक सावधान है, जितना कि हमारे कुछ टीवी चैनल शायद उन्हें देखना चाहते हैं.’ इस सम्मेलन का आयोजन न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के छात्रों ने किया . पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ भी इस सम्मेलन में भाषण देने वाले थे लेकिन उन्होंने ‘‘सुरक्षा संबंधी चिंताओं’ का हवाला देते हुए अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया.

अब्दुल्ला ने करीब एक घंटे की चर्चा के दौरान कश्मीर, भारत के सर्जिकल हमलों, हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी बुरहान वानी, पाकिस्तान के साथ तनाव, कश्मीरी पंडितों की स्थिति एवं अनुच्छेद 370 समेत कई विषयों पर बात की. उन्होंने कहा कि नियंत्रण रेखा पर तनाव है और पिछले साल इसी समय की तुलना में संघर्षविराम को लेकर ‘‘कहीं अधिक दबाव’ है लेकिन भारत एवं पाकिस्तान युद्ध के कगार पर नहीं हैं
अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘भारत सरकार ने बहुत सावधानी से इस बारे में बताया है कि उसने उरी आतंकवादी हमले के बाद क्या किया.
उन्होंने दुनिया को बताया कि यह (सर्जिकल हमला) नियंत्रण रेखा के पास किया गया आतंकवाद विरोधी अभियान था.’ उन्होंने कहा कि सरकार ने इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं दी कि वे नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कहां तक गए और हमलों में कितने लोग मारे गए. उन्होंने कहा कि यदि भारत सरकार ने यह जानकारी दी होती तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर जवाबी कार्रवाई करने का ‘‘अत्यधिक दबाव’ होता.
अब्दुल्ला ने कहा कि भारत एवं पाकिस्तान के बीच बढे हुए तनाव से घाटी में ‘‘निराशा का माहौल’ बढता है क्योंकि ‘‘भारत एवं पाकिस्तान के बीच संबंधों में तनाव बढने से कोई भी राज्य जम्मू-कश्मीर से अधिक प्रभावित नहीं होता.’ कश्मीर घाटी में वानी के मारे जाने के मद्देनजर पिछले 100 से अधिक दिनों से अशांति है और ‘‘दुर्भाग्यवश मौजूदा समस्या का अंत नजर नहीं आ रहा.’ उन्होंने कहा कि कश्मीर में मौजूदा स्थिति एक ‘‘राजनीतिक समस्या’ है जिसका राजनीतिक समाधान खोजे जाने की आवश्यकता है. नौकरी न होना, कट्टरपंथी इस्लाम के तत्व भी हैं लेकिन ये छोटे तत्व हैं. उन्होंने कहा, ‘‘यह बडे स्तर पर जम्मू कश्मीर की राजनीति का परिणाम है… यह एक राजनीतिक समस्या है जिसके लिए राजनीतिक समाधान चाहिए और इसके लिए वार्ता जरुरी है.’
कश्मीर समस्या के अल्पकालीन समाधान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि यह समाधान समस्या को पहचानना और ‘‘यह स्वीकार करना है कि हमारे सामने एक समस्या है. अभी केवल यह स्वीकार करना है कि वार्ता जरुरी है और जो भी हितधारक आपके साथ वार्ता करना चाहते है, उनके साथ बातचीत आवश्यक है.’
अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से हमने विभिन्न मामलों में यह निर्णय लिया है कि हम इस बात से इनकार करना चाहते हैं कि कोई समस्या है. यदि हम समस्या को स्वीकार कर भी लेते हैं, तो भी हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि यह एक राजनीतिक समस्या है जिसके राजनीतिक समाधान की आवश्यकता है.
हम सामाजिक या कानून व्यवस्था समस्या के रुप में इन पर बात करेंगे.’ अब्दुल्ला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद जब शपथ ग्रहण में शरीफ को आमंत्रित किया और पिछले साल दिसंबर में लाहौर की अचानक यात्रा की तो इससे कुछ उम्मीद जगी थी. कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा प्रस्तावों के बारे में प्रश्न पूछे जाने पर अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि हम भारत में इस बात को लेकर इतना खेद क्यों महसूस करते हैं कि संयुक्त राष्ट्र जनमत संग्रह कभी नहीं हो पाया.
उस जनमत संग्रह के लिए परिस्थितियां पैदा करने का काम भारत का नहीं था.’ उन्होंने कहा कि यूएनएससी के प्रस्ताव के अनुसार इस प्रकार के जनमत संग्रह के लिए पाकिस्तान को पहला कदम उठाना होगा. उसे उन सभी क्षेत्रों को खाली करना होगा जो उसने अगस्त 1947 के बाद कब्जाए थे और उसे जम्मू कश्मीर की क्षेत्रीय सीमाओं से नियमित एवं अनियमित बलों को हटाना हेागा. अब्दुल्ला ने कहा कि इसके बाद भारत को जम्मू कश्मीर में अपनी मौजूदगी को प्रबंधनीय स्तर तक कम करना होना, न कि रद्द करना होगा और उसी के बाद जनमत संग्रह हो सकता है.
उन्होंने कहा, ‘‘यदि पाकिस्तान पहला कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है, तो दूसरा कदम उठाने की जिम्मेदारी भारत पर कैसे हो सकती है? इन वर्षों में किसी कारण से हमने दुनिया को यह मानने की अनुमति दी है कि जम्मू कश्मीर के लोगों को चयन का अधिकार देने से किसी न किसी तरह वंचित रखा गया है क्योंकि भारत ने उन्हें यह अधिकार नहीं देने का चयन किया, जो सच नहीं है.’
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