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नेपाल में फिर गहराया राजनीतिक संकट, प्रधानमंत्री पद से केपी ओली का इस्तीफा

Updated at : 24 Jul 2016 6:23 PM (IST)
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नेपाल में फिर गहराया राजनीतिक संकट, प्रधानमंत्री पद से केपी ओली का इस्तीफा

काठमांडो : अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले ही नेपाल के प्रधानमंत्री पद से केपी ओली के इस्तीफे के बाद देश में राजनीतिक संकट एक बार फिर गहरा गया है. ओली ने अविश्वास प्रस्ताव को देश को ‘‘प्रयोगशाला’ मेंं बदलने और नये संविधान को लागू करने में रोड़े अटकाने की ‘‘विदेशी ताकतों’ की साजिश करार […]

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काठमांडो : अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले ही नेपाल के प्रधानमंत्री पद से केपी ओली के इस्तीफे के बाद देश में राजनीतिक संकट एक बार फिर गहरा गया है. ओली ने अविश्वास प्रस्ताव को देश को ‘‘प्रयोगशाला’ मेंं बदलने और नये संविधान को लागू करने में रोड़े अटकाने की ‘‘विदेशी ताकतों’ की साजिश करार दिया.

पिछले 10 साल के दौरान बनी नेपाल की आठवीं सरकार की अगुवाई करने के लिए ओली पिछले अक्तूबर में प्रधानमंत्री बने थे. गठबंधन सरकार से माओवादियों द्वारा समर्थन वापस ले लिए जाने के बाद ओली अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे थे. अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के लिए तैयार बैठे सांसदों से 64 साल के ओली ने कहा, ‘‘मैंने इस संसद में एक नये प्रधानमंत्री के चुनाव का रास्ता साफ करने का फैसला किया है और मैंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया है.’

ओली ने इस्तीफा उस वक्त दिया जब सत्ता में साझेदार दो अहम पार्टियों – मधेसी पीपुल्स राइट्स फोरम-डेमोक्रेटिक और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी – ने नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की अगुवाई वाली सीपीएन-माओइस्ट सेंटर की ओर से उनके खिलाफ पेश कियेगये अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने का फैसला किया.

इन पार्टियों ने ओली पर आरोप लगाया था कि उन्होंने पिछली प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की. ओली की जगह लेने के लिए प्रबल दावेदार बताये जा रहे माओवादी प्रमुख प्रचंड ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया था कि वह अहंकारी और आत्मकेंद्रित हैं. उन्होंने कहा, ‘‘इससे उनके साथ काम करते रहना संभव नहीं रह गया था.’

बहरहाल, 598 सदस्यों वाली संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए ओली ने प्रचंड एवं अन्य की ओर से लगायेगये सभी आरोपों को खारिज कर दिया. उन्होंने देश के नये संविधान का विरोध कर रहे मधेसियों, जिनमें ज्यादातर भारतीय मूल के हैं, की शिकायतों के निदान के लिए वार्ता का समर्थन किया. मधेसियों ने कुछ महीने पहले प्रदर्शन शुरू किये थे जिससे भारत से वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई थी.

ओली ने कहा, ‘‘आंदोलनकारी मधेसी पार्टियों की मांगों के मामले का निदान शांतिपूर्ण तरीकों से किया जा सकता है और उनकी मांगें पूरी करने के लिए संविधान में संशोधन किया जा सकता है.’ उन्होंने मधेसी पार्टियों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘फिर से आंदोलन की कोई जरूरत नहीं है.’ उन्होंने देश को ‘‘पीछे की तरफ’ खींचने के लिए रची जा रही साजिश के खिलाफ भी लोगों को आगाह किया. ओली ने कहा कि उनके इस्तीफे के देश पर दूरगामी परिणाम होंगे और इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी.

उन्होंने कहा, ‘‘कई ऐसे मौके होते हैं जब सच बोलने वालों को दंडित किया जाता है और देशभक्ति के लिए खड़े होने वालों को सजा दी जाती है.’ संभवत: भारत की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘नेपाल को एक प्रयोगशाला के तौर पर विकसित किया जा रहा है और विदेशी ताकतें ऐसी साजिश कर रही हैं जिससे संविधान लागू नहीं किया जा सके.’

ओली ने कहा कि नौ महीने पहले जब उन्होंने सत्ता की कमान संभाली थी, उस वक्त देश गंभीर संकट से जूझ रहा था और यह ‘‘दुख’ की बात है कि सरकार ऐसे समय में बदल रही है जब यह पिछले साल आए जानलेवा भूकंप की ओर से दियेगये दर्द से उबर रही है. पिछले साल नेपाल में आये भीषण भूकंप में करीब 9,000 लोग मारे गये थे. सीपीएन-यूएमएल के नेता ओली ने कहा, इस वक्त सरकार में बदलाव का खेल रहस्यमय है. उन्होंने कहा कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी गयी.

पिछले साल सितंबर में नये संविधान को अपनाने के बाद से ही नेपाल में राजनीतिक संकट कायम है. मधेसी समुदाय नये संविधान का विरोध कर रहा है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे देश को सात प्रांतों में बांट कर उन्हें हाशिये पर डाल दिया जायेगा. करीब पांच महीने चले मधेसियों के विरोध-प्रदर्शन के कारण नेपाल में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति ठप पड़गयी थी. पुलिस के साथ झड़प में 50 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बाद यह प्रदर्शन फरवरी में समाप्त हुआ था.

नेपाल ने मधेसी संकट के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था. हालांकि, भारत ने इस आरोप को खारिज किया है. माओवादियों ने ओली को सत्ता से बेदखल करने का फैसला दो माह पहले तब किया जब उन्होंने कहा कि वह मधेसियों की चिंताएं दूर करेंगे और पिछले साल भूकंप में तबाह हुए घरों को फिर से बनायेंगे.

आज अपने संबोधन में ओली ने कहा कि पिछले साल जब उन्होंने सत्ता संभाली, उस वक्त नेपाल-भारत संबंध सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था. बहरहाल, उनके प्रयासों से स्थिति सामान्य हुई. ओली ने पिछले हफ्ते काठमांडो में हुई ‘एमिनेंट पीपुल्स ग्रुप’ की बैठक का जिक्र किया जिसमें 1950 की नेपाल-भारत शांति एवं मैत्री संधि सहित नेपाल एवं भारत के बीच हुई विभिन्न संधियों एवं समझौतों की समीक्षा केे लिए चर्चा हुई. उन्होंने कहा, ‘‘नेपाल-चीन संबंध और नेपाल-भारत संबंध खास हैं, जिनकी तुलना एक-दूसरे से नहीं की जा सकती.’ उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों से किसी एक देश पर नेपाल की आर्थिक निर्भरता कम हुई है.

ओली ने कहा कि नेपाल ने चीन के साथ परिवहन एवं ट्रांजिट संधि पर दस्तखत किये ताकि दोनों सीमाओं में इसकी पहुंच हो. अब नेपाल के लोगों को भविष्य में वैसे संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा, जैसा सीमा बाधित किए जाने के समय करना पडता था. उन्होंने कहा, ‘‘देश और लोगों के हित में नेपाल को अपने पड़ोसियों से बराबर की दूरी बनाकर रखनी चाहिए. हम अपने दोनों पड़ोसियों की संवेदनशीलता का सम्मान करते हैं और हम उनसे भी ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं.’

बहरहाल, ओली ने यह भी कहा कि ‘‘हम अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन हम अपने अंदरुनी मामलों में दखल स्वीकार नहीं कर सकते.’ उन्होंने कहा कि नये संविधान के लागू होने में रोड़े अटकाने की खातिर उनकी सरकार गिराने की कोशिशें की गई. उन्होंने चेताया कि देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.

ओली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को नेपाली कांग्रेस के 183, सीपीएन-एमसी के 70 और सीपीएन-यूनाइटेड के तीन सांसदों का समर्थन प्राप्त था. संसद में तीनों पार्टियों के कुल 292 सांसद हैं. ओली की सीपीएन-यूएमएल के अभी 175 सांसद हैं, जो विश्वास प्रस्ताव जीतने के लिए जरुरी 299 सीटों से काफी कम हैं.

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