एक स्त्री के नजरिये से लिव-इन रिलेशनशिप
Updated at : 10 Jun 2016 8:18 AM (IST)
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कलावंती मनुष्य का स्वभाव प्रयोगधर्मी है. वह जीवन के आनंद के लिए तरह-तरह के प्रयोग करता है. इस प्रयोग और महानगरों में आवास की दिक्कतों और खर्च तथा परिवार से दूर रहते युवाओं में साथ की चाहत ने लिव-इन रिलेशनशिप को जन्म दिया. लोग बिना विवाह किये पति-पत्नी की तरह रहने लगे. धीरे-धीरे यह महानगरों […]
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कलावंती
मनुष्य का स्वभाव प्रयोगधर्मी है. वह जीवन के आनंद के लिए तरह-तरह के प्रयोग करता है. इस प्रयोग और महानगरों में आवास की दिक्कतों और खर्च तथा परिवार से दूर रहते युवाओं में साथ की चाहत ने लिव-इन रिलेशनशिप को जन्म दिया. लोग बिना विवाह किये पति-पत्नी की तरह रहने लगे. धीरे-धीरे यह महानगरों से छोटे शहरों और कस्बों तक भी फैलने लगा. प्रसिद्ध स्त्रीवादी लेखिका साइमन द बउआर ने अपनी प्रसिद्ध कृति “द सेकेंड सेक्स” में लिखा है – “स्त्री पैदा नहीं होती, बनायी जाती है.“
इसी अवधारणा के इर्द-गिर्द शरद सिंह का उपन्यास “कसबाई सिमोन” लिखा गया है. उन्होंने अपनी किताब को समर्पित करते हुए लिखा है– उन सभी स्त्रियों के लिए जो अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहती हैं.“
उपन्यास की नायिका सुगंधा विवाह नहीं करना चाहती. उसकी स्वतंत्रता उसे प्रिय है. वह कहती है– “उफ यह विवाह की परिपाटी. गढ़ी तो गयी स्त्री के अधिकारों के लिए जिससे उसे और उसके बच्चों को सामाजिक मान्यता, आर्थिक संबल आदि मिल सके. किन्तु समाज ने ही इसे तमाशा बना कर रख दिया.“ सुगंधा, रितिक के साथ बिना विवाह किये रहने लगती है. लोगों के कौतूहल और प्रश्नों से परेशान सुगंधा बार-बार घर बदलती है. रितिक और सुंगधा सहजीवन में रहते हुए अपनी अपनी कमाई से समान रूप से गृहस्थी चलाते हैं.
सुगंधा आजाद ख्यालों की है. अपने पैरों पर खड़ी है. उसे लगता है कि वह रितिक पर आश्रिता नहीं है. पर समाज जब उसे बार-बार जताता है कि वह रितिक की रखैल है, तो वह बहुत दुखी होती है. यहां यह नोटिस करने लायक बात है कि सहजीवन में रहते हुए रितिक इतनी मानसिक यंत्रणा से नहीं गुजरता, जितना सुगंधा उद्वेलित रहती है.
समाज रितिक को इतनी खराब नज़रों से नहीं देखता जितना सुंगंधा को ताने सुनाता है. सुगंधा अंतत: टूट जाती है जब स्वयं रितिक भी एक दिन उसे रखैल कह देता है. वह मन में बहुत दुख लिये उससे दूर हो जाती है. बाद में उसके जीवन में और भी कई पुरुष आते हैं.
इस जीवन के आरंभ में उसकी नौकरानी तारा, उसकी सहकर्मी कीर्ति, उसकी कई-कई पड़ोसिनों ने सुगंधा को समझाया था- “लड़का आवारा भी हो तो उसे कोई कुछ नहीं कहता, उसका घर मजे से बस जाता है. लेकिन लड़की का जीवन तो कांच की तरह होता है, एक भी खरोंच आयी तो सबको दिखाई देने लगती है.”
आिखर में यह उपन्यास हमें यह सोचने को बाध्य कर देता है कि विवाह का विकल्प सहजीवन है क्या? लेखिका ने अपनी ओर से कोई निष्कर्ष नहीं दिया है. पाठकों पर इसे छोड़ा है.
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