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शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय हब बने बिहार

Updated at : 04 Aug 2015 3:38 AM (IST)
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शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय हब बने बिहार

कुंदन अमिताभमुंबंई से छले दस बरस में बिहार में काफी कुछ ऐसे बदलाव जरूर हुए हैं जिन्हें असाधारण कहा जा सकता है. असाधारण इस अर्थ में कि इन बदलावों की वजह से एक बार पुन: एक बिहारी के रूप में हम बिहार के बाहर भी उपहास की जगह सम्मान की दृष्टि से देखे जाने लगे […]

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कुंदन अमिताभ
मुंबंई से

छले दस बरस में बिहार में काफी कुछ ऐसे बदलाव जरूर हुए हैं जिन्हें असाधारण कहा जा सकता है. असाधारण इस अर्थ में कि इन बदलावों की वजह से एक बार पुन: एक बिहारी के रूप में हम बिहार के बाहर भी उपहास की जगह सम्मान की दृष्टि से देखे जाने लगे हैं.

कानून एवं व्यवस्था की सुधरी हुई स्थिति एवं आधारभूत संरचनाओं का व्यापक विकास इनमें महत्वपूर्ण हैं. बिहार की सड़कें महाराष्ट्र की तुलना में कहीं अधिक अच्छी स्थिति में नजर आती है. बिहार में गांव तक में सड़कों, पुलों एवं विद्युतीकरण का विकास ना केवल वहां के जीवन स्तर को उठाने में कारगर सिद्ध हुआ है अपितु कानून एवं व्यवस्था के पालन में भी सहायक रहा है, ऐसा प्रतीत होता है.

आधारभूत संरचनाओं का व्यापक विकास की वजह से बिहार से कुशल मजदूरों के पलायन पर भी कुछ हद तक रोक लगी है, क्योंकि महाराष्ट्र में पिछले दो दशकों से सिविल इंजीनियरिंग प्रोजेक्टस के कार्यान्वयन से जुड़े रहने की वजह से मैंने गौर किया है कि पिछले पांच-छह सालों में बिहार की ओर से पलायन कर महाराष्ट्र आने वाले कुशल मजदूरों की संख्या में काफी गिरावट आई है. मैंने बीते बरस मैने पटना से भागलपुर स्थित अपने गांव खानपुरमाल तक का लंबा सफर सड़क मार्ग से तय किया. इनमें वह सफर भी हैं जो मैंने रात के एक बजे के आसपास तक किये.

यात्रा न केवल सुखद थी, बल्किकानून-व्यवस्था की दृष्टि से अद्धभुत व अविश्वसनीय भी. पुलिस आम आदमी की सुरक्षा के लिए इस तरह गश्त लगा रही थी, मानो कोई विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा में लगी हो.

बिहार में गत वर्षों के दौरान हुए विकास के इन असाधारण बदलावों के बावजूद पिछले आम चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी की हार बिहार से बाहर रह रहे हम बिहारियों के लिए एक सदमा जैसा ही था. लोग जातिगत राजनीति से प्रभावित होते दिखे. पर सर्वाधिक प्रभावित हुआ बिहार का विकास. यह एक कटु सत्य है कि बिहार की राजनीति जाति-धर्म के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. यह बिहारी राजनीति की मजबूरी है.

केवल राजनीतिज्ञों को गलत ठहराकर हम जनता अपने राज्य के विकास को दिशा देने की अहम जिम्मेवारी से नहीं बच सकते. नीतीश की प्रधानमंत्री की मह्त्वाकांक्षा को पिछली हार का बजह बतलाकर विश्लेषण करना सच्चाई से मुख मोड़ने जैसा ही है. अगर हम सचमुच ही जाति-धर्म विहीन राजनीति की बात करें तो इ2222समें कोई बुराई नजर नहीं आती कि बिहार का कोई नेता देश का प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश भी रखता है.

बिहार में शिक्षा और पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं और क्षमता हैं. बावजूद इसके बिहार का विकास इन दोनों ही क्षेत्रों में अपेक्षा के मुताबिक नहीं है. कानून एवं व्यवस्था की सुधरी हुई स्थिति एवं आधारभूत संरचनाओं का व्यापक विकास के साथ-साथ बिहार को इंगलैंड आदि यूरोपीय देशों की तर्ज पर शिक्षा और पर्यटन के विकास पर जोर देकर एक अंतरराष्ट्रीय हब के रूप में विकिसत करने की योजनाओं पर अमल करना चाहिए.

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