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करीब दो दर्जन सीटों को प्रभावित करेंगे कोयलाकर्मी

Updated at : 02 Nov 2014 7:26 AM (IST)
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करीब दो दर्जन सीटों को प्रभावित करेंगे कोयलाकर्मी

मनोज सिंह राज्य के मुद्दों से होगा अंतर चार कंपनियां काम कर रही है झारखंड में रांची : राज्य की करीब दो दर्जन सीटों को कोयलाकर्मी प्रभावित करेंगे. यहां राज्य के मुद्दों के अतिरिक्त देश स्तरीय मुद्दे भी होंगे. यहां केंद्र सरकार की योजनाओं को भी मुद्दा बनाया जायेगा. कोयला कर्मियों के बीच संघर्षरत ट्रेड […]

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मनोज सिंह
राज्य के मुद्दों से होगा अंतर
चार कंपनियां काम कर रही है झारखंड में
रांची : राज्य की करीब दो दर्जन सीटों को कोयलाकर्मी प्रभावित करेंगे. यहां राज्य के मुद्दों के अतिरिक्त देश स्तरीय मुद्दे भी होंगे. यहां केंद्र सरकार की योजनाओं को भी मुद्दा बनाया जायेगा. कोयला कर्मियों के बीच संघर्षरत ट्रेड यूनियनें भी अपनी भूमिका तलाश रही हैं.
चुनाव में वह केंद्र सरकार की योजना की अच्छाइयों और बुराइयों को भी इनके बीच ले जायेंगे. राज्य में चार कोयला कंपनियां संचालित हैं. इसमें सीसीएल, बीसीसीएल, सीएमपीडीआइ व इसीएल है. करीब दो लाख से अधिक कर्मी यहां काम करते हैं. एक-एक परिवार से पांच-पांच वोटर भी जुड़े तो करीब 10 लाख वोटर मतदान करेंगे. कई सीटों की स्थिति तो ऐसी है कि जहां 90 फीसदी से अधिक कोयला कामगार रहते हैं.
जीतते रहे हैं ट्रेड यूनियन नेता
कोयलाकर्मियों के हक के लिए लड़नेवाले कई नेता झारखंड में विधानसभा चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं. इस बार भी कई नेता झारखंड विधानसभा के चुनाव में किस्मत अजामायेंगे. राज्य के वर्तमान वित्त मंत्री राजेंद्र सिंह भी ट्रेड यूनियन की राजनीति करते हैं.
पूर्व मंत्री चंद्रशेखर दुबे भी ट्रेड यूनियन की राजनीति करते हैं. बाबूलाल मरांडी भी द झारखंड कोलियरी मजदूर यूनियन के अध्यक्ष हैं. इन लोगों के अतिरिक्त रामगढ़ से विधायक चंद्र प्रकाश चौधरी, पूर्व मंत्री लालचंद महतो, पूर्व विधायक रमेंद्र कुमार, जलेश्वर महतो, जगरनाथ महतो, ढुलू महतो, समरेश सिंह भी कोयलाकर्मियों के हक की लड़ाई लड़ते रहे हैं. संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे भी ट्रेड यूनियन के आंदोलन के ही उपज थे.
जो सीटें होंगी प्रभावित
बेरमो, बड़कागांव, गिरिडीह, राजमहल, महगामा, धनबाद, रांची, रामगढ़, कांके, हजारीबाग, मांडू, निरसा, सिंदरी, डुमरी, झरिया, बोकारो, गोमिया, सिमरिया, विश्रमपुर, टुंडी, बाघमाराजो हैं मुद्दे
विधि व्यवस्था : कोयला कंपनियों और राज्य के सुरक्षाकर्मियों में तालमेल की कमी के कारण कोयला क्षेत्र में विधि व्यवस्था की परेशानी होती है. आपस में संघर्ष की स्थिति भी बनती है. कोयला चोरी रोकने की लड़ाई भी होती है.
पेयजल समस्या : इस क्षेत्र में पेयजल की जबरदस्त समस्या है. कोयला खनन क्षेत्र होने के कारण पीने का स्वच्छ पानी नहीं मिल पाता है. इससे बीमारी की समस्या रहती है.
बिजली की समस्या : अधिसंख्य कोयला क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की स्थिति ठीक नहीं है. कई इलाकों में डीवीसी से आपूर्ति होती है. मेंटेनेंस नहीं होने कारण बिजली की समस्या रहती है.
प्रदूषण : इस क्षेत्र में प्रदूषण बड़ी समस्या है. यहां कोयला खनन से उड़नेवाले डस्ट पर नियंत्रण के उपाय नहीं किये जाते हैं. इससे कई प्रकार की बीमारियां होती है. इस पर राज्य सरकार ध्यान नहीं देती है.
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